संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-1: विश्व के भौतिक भूगोल की प्रमुख विशेषताएँ; महत्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।

संदर्भ: IISER पुणे, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और आईआईटी-रुड़की के शोधकर्ताओं के एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि उत्तर-पश्चिमी हिमालय में तेजी से क्षरित हो रहा हिमाच्छादित ऊपरी सिंधु बेसिन पाइराइट के ऑक्सीकरण के कारण CO₂ के शुद्ध स्रोत के रूप में कार्य करता है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • पाइराइट-जनितCOउत्सर्जन:शोधकर्ताओं ने जुलाई–अगस्त 2021 के दौरान सिंधु नदी के उद्गम क्षेत्र और सहायक नदियों से लिए गए 61 जल नमूनों का विश्लेषण किया। ऊपरी सिंधु बेसिन में लगभग 68% सल्फेट पाइराइट के ऑक्सीकरण से संबंधित पाया गया।
    • पाइराइट, जिसे “मूर्खों का सोना” (Fool’s Gold) कहा जाता है, ऑक्सीजन और जल के साथ अभिक्रिया करके सल्फ्यूरिक अम्ल बनाता है, जो कार्बोनेट चट्टानों के अपक्षय के माध्यम से CO₂ मुक्त कर सकता है।
  • CO का शुद्ध स्रोत: पाइराइट का ऑक्सीकरण लगभग 4.4 × 10⁵ मोल CO₂/किमी²/वर्ष मुक्त करता है, जबकि सिलिकेट अपक्षय लगभग 1.4 × 10⁵ मोल CO₂/किमी²/वर्ष अवशोषित करता है। इस प्रकार, ऊपरी पर्वतीय बेसिन CO₂ का शुद्ध स्रोत बन जाता है।
  • अपरदन और हिमनदों की भूमिका: तीव्र अपरदन और व्यापक हिमनद आवरण लगातार चट्टानों की नई सतहों को उजागर करते हैं, जिससे पाइराइट के ऑक्सीकरण को बढ़ावा मिलता है और संबंधित अपक्षय प्रक्रियाएँ तेज होती हैं।
  • स्थानिक भिन्नता: अध्ययन में पाया गया कि जहाँ ऊपरी पर्वतीय बेसिन CO₂ का शुद्ध स्रोत है, वहीं नीचे की ओर स्थित बाढ़ मैदान क्षेत्र CO₂ का शुद्ध अवशोषण प्रदर्शित करते हैं। यह कार्बन संतुलन में स्पष्ट स्थानिक भिन्नता को दर्शाता है।

कार्बन चक्र और चट्टानों के अपक्षयण को समझना

  • CO के सिंक के रूप में चट्टानों का अपक्षयण: घुलित CO₂ युक्त वर्षाजल सिलिकेट चट्टानों के साथ अभिक्रिया करता है, जिससे वे टूटती हैं और कार्बन नदियों के माध्यम से महासागरों तक पहुँचता है। इस प्रकार, सिलिकेट अपक्षय सामान्यतः भूवैज्ञानिक समयावधि में CO₂ के सिंक के रूप में कार्य करता है।
  • छिपा हुआ मार्ग: हिमालय की चट्टानों में पाइराइट (FeS₂) भी पाया जाता है। ऑक्सीजन और जल के संपर्क में आने पर पाइराइट का ऑक्सीकरण होता है और सल्फ्यूरिक अम्ल बनता है, जो कार्बोनेट चट्टानों के साथ अभिक्रिया करके CO₂ मुक्त कर सकता है।
  • अपरदन क्यों महत्वपूर्ण है: तीव्र अपरदन नई खनिज सतहों को उजागर करता है, जिससे CO₂ का उपभोग करने वाले सिलिकेट अपक्षय और CO₂ उत्सर्जित करने वाले पाइराइट-जनित अपक्षयण, दोनों प्रक्रियाएँ तीव्र हो जाती हैं।
  • शुद्ध कार्बन संतुलन: इसलिए समग्र प्रभाव केवल चट्टानों के अपक्षय की दर पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इन परस्पर प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं के बीच संतुलन पर निर्भर करता है।

निष्कर्षों का महत्व

  • कार्बन सिंक की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करता है: निष्कर्ष दर्शाते हैं कि हिमालयी पर्वतीय अपक्षय का आकलन केवल उसके CO₂ का उपभोग करने वाले सिलिकेट-अपक्षय मार्ग के आधार पर नहीं किया जा सकता।
  • कार्बन चक्र पर प्रभाव: तेजी से क्षरित हो रहे पर्वतीय क्षेत्रों से भूवैज्ञानिक CO₂ प्रवाह का अनुमान लगाते समय पाइराइट ऑक्सीकरण और सल्फ्यूरिक-अम्ल अपक्षय को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
  • स्थानिक भिन्नता का महत्व: ऊपरी पर्वतीय बेसिन और नीचे की ओर स्थित बाढ़ मैदानों के बीच CO₂ संतुलन में अंतर बेसिन-विशिष्ट कार्बन चक्र आकलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • व्यापक हिमालयी प्रासंगिकता: यह अध्ययन यह जाँचने का आधार प्रदान करता है कि क्या इसी प्रकार की प्रक्रियाएँ अन्य हिमालयी नदी प्रणालियों में भी सक्रिय हैं। शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि व्यापक निष्कर्ष निकाले जा सकें।

आगे की राह

  • बेसिन-स्तरीय अध्ययनों का विस्तार: सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में तुलनीय भू-रासायनिक आकलन किए जाएँ, ताकि पाइराइट-जनित CO₂ उत्सर्जन के क्षेत्रीय विस्तार का निर्धारण किया जा सके।
  • पूर्ण कार्बन संतुलन का मापन: भविष्य के आकलनों में केवल सिलिकेट अपक्षय से होने वाले CO₂ अवशोषण का अनुमान लगाने के बजाय सिलिकेट अपक्षय, कार्बोनेट अपक्षय और पाइराइट ऑक्सीकरण का संयुक्त रूप से परिमाणीकरण किया जाना चाहिए।
  • दीर्घकालिक निगरानी को मजबूत करना: अपक्षयण प्रक्रियाओं में होने वाले परिवर्तनों पर नज़र रखने के लिए नदी-जल रसायन, सल्फर और ऑक्सीजन समस्थानिक, तलछट विश्लेषण तथा अपरदन दरों को एकीकृत किया जाए।
  • कार्बन-चक्र मॉडल में सुधार: प्राकृतिक CO₂ स्रोतों और सिंक के अनुमानों को बेहतर बनाने के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक मॉडलों में सल्फर-प्रेरित अपक्षय तथा अपरदन-अपक्षय अंतःक्रियाओं को शामिल किया जाए।
  • बदलती हिमालयी परिस्थितियों का आकलन: समय के साथ हिमनद आवरण, अपरदन और जलविज्ञान में होने वाले परिवर्तनों से खनिजों के अनावरण और पाइराइट ऑक्सीकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाए।
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