• शंघाई सहयोग संगठन (SCO):

  • चर्चा में: वर्ष 2026 का SCO शिखर सम्मेलन (26वीं Council of Heads of State बैठक) बिश्केक, किर्गिस्तान में आयोजित हुआ।

o ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 

  • शंघाई फाइव का उदय 1996 में 4 पूर्व USSR गणराज्यों और चीन के बीच सीमा निर्धारण और विसैन्यीकरण वार्ता की एक श्रृंखला से हुआ था।
  • कजाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान शंघाई फाइव के सदस्य थे। 
  • 2001 में समूह में उज्बेकिस्तान के प्रवेश के साथ, शंघाई फाइव का नाम बदलकर SCO कर दिया गया। 

सदस्य: चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस और चार मध्य एशियाई देश कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान। 

  • इस समूह का विस्तार 2017 में किया गया जब भारत एवं पाकिस्तान इसके सदस्य बने।
  • ईरान 2023 में शामिल हुआ तथा वर्ष 2024 में बेलारूस 10वाँ एवं सबसे नया सदस्य बना। 
  • पर्यवेक्षक का दर्जा: अफगानिस्तान और मंगोलिया। 

उद्देश्य: मध्य एशियाई क्षेत्र में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद को रोकने के प्रयासों के लिए क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना।  

भाषा: SCO की आधिकारिक भाषाएँ रूसी और चीनी हैं।

संरचना: SCO का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय राष्ट्राध्यक्षों की परिषद (CHS) है, जो वर्ष में एक बार मिलती है। संगठन के दो स्थायी निकाय हैं – बीजिंग में सचिवालय और ताशकंद में क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी संरचना (RATS) की कार्यकारी समिति।

o शिखर सम्मेलन:

  • शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का प्रथम शिखर सम्मेलन वर्ष 2002 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित हुआ था।
  • राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की 25वीं बैठक वर्ष 2025 में तियानजिन, चीन में आयोजित हुई।
  • 2026 का SCO शिखर सम्मेलन (26वीं Council of Heads of State बैठक) बिश्केक, किर्गिस्तान में हुआ।
  • अध्यक्षता: किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव
  • 2026–27 की 27वीं SCO अध्यक्षता: पाकिस्तान को सौंपी गई।

o भारत के लिए महत्व:

  • मध्य एशिया से संबंध – SCO भारत को मध्य एशियाई देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध मजबूत करने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
  • आतंकवाद एवं सुरक्षा – आतंकवाद, उग्रवाद, अलगाववाद, मादक पदार्थों की तस्करी और साइबर अपराध के विरुद्ध सहयोग बढ़ाने में सहायक।
  • ऊर्जा सुरक्षा – रूस तथा मध्य एशियाई देशों के तेल, गैस और अन्य ऊर्जा संसाधनों तक भारत की पहुँच बढ़ाने में उपयोगी।
  • व्यापार एवं संपर्क – मध्य एशिया के साथ व्यापारिक संपर्क बढ़ाने में सहायक। भारत के लिए चाबहार बंदरगाह एवं अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने का अवसर।
  • रूस के साथ संबंध – SCO भारत को रूस के साथ बहुपक्षीय स्तर पर रणनीतिक एवं आर्थिक सहयोग बनाए रखने का मंच देता है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता – भारत SCO के माध्यम से विभिन्न शक्ति-केंद्रों के साथ संबंध रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर सकता है।
  • बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था – SCO में सक्रिय भूमिका भारत के बहुध्रुवीय एवं संतुलित वैश्विक व्यवस्था के दृष्टिकोण को मजबूत करती है।
  • आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग – डिजिटल अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कृषि, स्वास्थ्य और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ बढ़ती हैं।

o भारत के लिए चुनौतियाँ: 

  • चीन का बढ़ता प्रभाव – SCO में चीन का आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव काफी अधिक है, जिससे भारत के लिए संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।
  • चीन-पाकिस्तान निकटता – चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी SCO में भारत के हितों के लिए चुनौती उत्पन्न करती है।
  • आतंकवाद का मुद्दा – सीमा-पार आतंकवाद को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच गंभीर मतभेद हैं।
  • भारत-चीन सीमा विवाद – वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव दोनों देशों के बीच सहयोग को प्रभावित करता है।
  • कनेक्टिविटी की समस्या – पाकिस्तान के माध्यम से भूमि संपर्क की बाधा तथा अफगानिस्तान की अस्थिरता के कारण भारत की मध्य एशिया तक सीधी पहुँच सीमित है।
  • रूस-पश्चिम तनाव – रूस और पश्चिमी देशों के बीच संघर्ष की स्थिति भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौती पैदा करती है।
  • सदस्य देशों के अलग-अलग हित – SCO के सदस्य देशों के राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित अलग-अलग हैं, जिससे संगठन में सर्वसम्मति से प्रभावी निर्णय लेना कठिन होता है।

निष्कर्षतः SCO भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुँच, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण मंच है। हालांकि चीन का प्रभाव, चीन-पाकिस्तान निकटता और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ इसकी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं। अतः भारत को सक्रिय भागीदारी, बहुपक्षीय सहयोग और रणनीतिक संतुलन की नीति अपनानी चाहिए।

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