संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए एवं हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और क्रियान्वयन से संबंधित विषय|
सामान्य अध्ययन -3: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सब्सिडी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से संबंधित विषय।
संदर्भ: सरकार ने वर्ष 2026–27 के लिए पीएम-आशा के तहत ₹7,200 करोड़ आवंटित किए हैं, जो वर्ष 2025–26 के ₹6,941.36 करोड़ से अधिक है। इसका उद्देश्य मूल्य-समर्थन उपायों को बढ़ावा देना और किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना है।
पीएम-आशा के बारे में
- प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) को सितंबर 2018 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के क्रियान्वयन को मजबूत करना और किसानों द्वारा मजबूरी में कम कीमत पर उपज बिक्री को कम करना है। साथ ही, यह उपभोक्ताओं के लिए मूल्य स्थिरता बनाए रखने में भी मदद करता है।
- पीएम-आशा के अंतर्गत चार तंत्र शामिल हैं: मूल्य समर्थन योजना (PSS), मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF), मूल्य कमी भुगतान योजना (PDPS), बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) किसानों की संकटपूर्ण बिक्री। इनका उपयोग फसल और बाजार की परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
- वर्ष 2024–25 में वास्तविक व्यय ₹5,437.99 करोड़ रहा, जबकि आवंटन वर्ष 2025–26 में ₹6,941.36 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2026–27 में ₹7,200 करोड़ हो गया।
पीएम-आशा के प्रमुख घटक
- मूल्य समर्थन योजना (PSS): मूल्य समर्थन योजना के तहत, जब फसल की अधिकतम कटाई अवधि के दौरान बाजार मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम हो जाता है, तो संबंधित राज्य/केंद्रशासित प्रदेश सरकार के अनुरोध पर सरकार दालों, तिलहनों और कोपरा की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद करती है।
- खरीद का कार्य भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ (NAFED) और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ (NCCF) द्वारा राज्य एजेंसियों के माध्यम से किया जाता है। यह खरीद पूर्व-पंजीकृत किसानों, वैध भूमि अभिलेखों और निर्धारित उचित औसत गुणवत्ता (FAQ) मानकों के आधार पर सीधे किसानों से की जाती है।
- 2024–25 से, राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के उत्पादन के 25% तक खरीद की प्रारंभिक अनुमति है। इसके अतिरिक्त, सचिवों की समिति की मंजूरी से राष्ट्रीय उत्पादन के 25% तक अतिरिक्त खरीद की जा सकती है।
- तूर, उड़द और मसूर के मामले में, घरेलू दाल उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए राज्य के उत्पादन के 100% तक खरीद की अनुमति है।
- मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF)
- मूल्य स्थिरीकरण कोषउपभोक्ताओं को कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाता है। इसके तहत तूर, उड़द, चना, मूंग, मसूर और प्याज जैसी कृषि उपज की कटाई के दौरान खरीद कर बफर स्टॉक बनाया जाता है।
- कम आपूर्ति या बढ़ती कीमतों के दौरान इन भंडारों को सुनियोजित एवं चरणबद्ध तरीके से बाजार में जारी किया जाता है, ताकि कीमतों में अत्यधिक वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके।
- मूल्य स्थिरीकरण कोषको पीएम-आशा में विलय कर दिया गया है, लेकिन इसका प्रबंधन उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा किया जाता है।
- मूल्य कमी भुगतान योजना (PDPS)
- मूल्य कमी भुगतान योजनाके तहत किसान अपनी उपज को किसी सरकारी एजेंसी को भौतिक रूप से नहीं बेचते हैं। इसके बजाय, उन्हें अधिसूचित बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान किया जाता है, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य के मूल्य के अधिकतम 15% तक हो सकता है।
- भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया जाता है।
- यह योजना मुख्य रूप से तिलहनों के लिए उपयोग की जाती है। इससे बड़े पैमाने पर भौतिक खरीद और भंडारण की आवश्यकता कम होती है।
- बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS)
- बाजार हस्तक्षेप योजनाऐसी शीघ्र खराब होने वाली कृषि एवं बागवानी उपज को कवर करती है, जिनके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित नहीं है, जैसे टमाटर, प्याज और आलू।
- जब इनकी कीमतें पिछले सामान्य मौसम की कीमतों की तुलना में कम-से-कम 10% गिर जाती हैं, तब योजना को सक्रिय किया जाता है।
- इसके तहत NAFED/NCCF के माध्यम से बाजार हस्तक्षेप किया जाता है और लागत का वहन केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा साझा किया जाता है, विशेषकर अधिक उत्पादन की स्थिति में।
PM-AASHA की आवश्यकता एवं महत्त्व
- किसानों द्वारा मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचने की समस्या में कमी: बाजार मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम होने पर मूल्य समर्थन योजना के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की जाती है, जबकि मूल्य कमी भुगतान योजनाके तहत बिना भौतिक खरीद के मूल्य-अंतर का भुगतान किया जाता है।
- दालों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: तूर, उड़द और मसूर की राज्य उत्पादन के 100% तक खरीद घरेलू स्तर पर दालों की खेती को प्रोत्साहित करती है और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद करती है।
- किसानों और उपभोक्ताओं के हितों में संतुलन: मूल्य समर्थन योजना और मूल्य कमी भुगतान योजनाकिसानों को मूल्य समर्थन प्रदान करते हैं, जबकि मूल्य स्थिरीकरण कोषऔर बाजार हस्तक्षेप योजनाकीमतों में अत्यधिक वृद्धि या गिरावट को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों की रक्षा होती है।
- पारदर्शिता एवं बाजार तक पहुंच में सुधार: आधार/बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, ई-समृद्धि, ई-सम्युक्ति और ई-नाम डिजिटल खरीद व्यवस्था को मजबूत करते हैं। ई-नाम के अंतर्गत 1,656 मंडियाँ, ₹4,94,847 करोड़ का व्यापार, 4,776 किसान उत्पादक संगठन तथा ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) पर 7,334 किसान उत्पादक संगठन शामिल हैं।
- बुनियादी ढाँचे एवं जमीनी स्तर पर खरीद को मजबूती: कृषि अवसंरचना कोष (AIF), 50,249 गोदाम (992.6 लाख मीट्रिक टन क्षमता) और 25,081 विपणन परियोजनाएँ, साथ ही बिहार और छत्तीसगढ़ में प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ / किसान उत्पादक संगठन आधारित खरीद, किसानों को बाजार से जोड़ने वाली फार्म-टू-मार्केट कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करती हैं।
चुनौतियाँ / बाधाएँ
- सीमित खरीद कवरेज: खरीद कुछ चुनिंदा फसलों और क्षेत्रों तक अधिक केंद्रित है, जिससे अनेक किसानों को MSP का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
- बुनियादी ढाँचे एवं बाजार तक पहुँच की कमी: विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों के किसानों को खरीद केंद्रों, गोदामों और संगठित बाजारों तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
- क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ: पूर्व-पंजीकरण, भूमि अभिलेखों का सत्यापन, उचित औसत गुणवत्ता (FAQ) मानकों की पूर्ति, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण तथा विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय से संबंधित प्रक्रियाएँ परिचालन संबंधी बाधाएँ उत्पन्न कर सकती हैं।
- वित्तीय एवं लॉजिस्टिक बोझ: भौतिक खरीद, भंडारण और बाजार हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त वित्तीय एवं लॉजिस्टिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। साथ ही, किसानों को मूल्य सुरक्षा प्रदान करने और उपभोक्ताओं के लिए वस्तुओं को किफायती बनाए रखने के बीच संतुलन बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण है।
