संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
संदर्भ: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने ग्रीन इंडिया मिशन (GIM) के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण कमियों को उजागर किया है। विशेष रूप से, वन एवं वृक्ष आवरण बढ़ाने तथा मौजूदा वनों की गुणवत्ता में सुधार के मिशन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में गंभीर कमियां पाई गईं हैं।
CAG ऑडिट के प्रमुख निष्कर्ष
CAG ने 2015–16 से 2024–25 के दौरान 16 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में GIM के तहत किए गए हस्तक्षेपों की योजना, क्रियान्वयन और निगरानी का परीक्षण किया और निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त किए:
- वनों की गुणवत्ता में सुधार में भारी कमी: 1.4 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र की गुणवत्ता में सुधार के लक्ष्य के मुकाबले केवल 0.11384 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में सुधार देखा गया। यह लक्ष्य की तुलना में 91.87% की कमी दर्शाता है।
- वन आवरण बढ़ाने में भारी कमी: 1.4 मिलियन हेक्टेयर वन आवरण बढ़ाने के लक्ष्य की तुलना में केवल 0.03409 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई, जिसके परिणामस्वरूप 97.57% की कमी रही।
- कमजोर अभिसरण और वित्तपोषण: CAMPA और मनरेगा के साथ प्रस्तावित अभिसरण को प्रभावी ढंग से हासिल नहीं किया जा सका, जबकि नगर वन योजना और स्कूल नर्सरी योजना मुख्यतः अलग-अलग, स्वतंत्र रूप से संचालित होती रहीं। मिशन ₹10,600 करोड़ की प्रस्तावित वित्तीय सहायता प्राप्त करने में भी विफल रहा।
- कम बजटीय सहायता: प्रारंभिक चार वर्षों के लिए CCEA द्वारा अनुमोदित ₹2,000 करोड़ तथा राज्यों के हिस्से के लिए 13वें वित्त आयोग से प्राप्त ₹400 करोड़ के मुकाबले, ऑडिट अवधि के दौरान बजटीय सहायता के रूप में केवल ₹1,149.14 करोड़ (47.88%) प्राप्त हुए।
- कमजोर वित्तीय नियंत्रण: 8 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने वार्षिक लेखे तैयार ही नहीं किए। अन्य मामलों में तैयार किए गए लेखे या तो लेखापरीक्षित नहीं थे अथवा उनमें सहायक अभिलेखों के साथ विसंगतियाँ पाई गईं।
- योजना एवं निगरानी में कमियाँ: ऑडिट ने क्रियान्वयन में पाई गई कमियों के लिए अपर्याप्त अभिसरण, अपर्याप्त वित्तपोषण, योजना-निर्माण में कमियाँ तथा कमजोर निगरानी तंत्र को जिम्मेदार ठहराया। इन कमियों ने मिशन के निर्धारित परिणामों को प्राप्त करने की क्षमता को सीमित कर दिया।
ग्रीन इंडिया मिशन (GIM) के बारे में
- NAPCC का हिस्सा: राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन, जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत आने वाले मिशनों में से एक है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ-साथ भारत के वन एवं वृक्ष आवरण का संरक्षण, पुनर्स्थापन और संवर्धन करना है। GIM की गतिविधियाँ वित्तीय वर्ष 2015–16 में शुरू हुईं।
- दोहरी मुख्य लक्ष्य: मिशन का उद्देश्य 5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में वन/वृक्ष आवरण बढ़ाना तथा अतिरिक्त 5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में वन आवरण की गुणवत्ता में सुधार करना है। इस प्रकार, कुल 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को इसके दायरे में शामिल किया गया है।
- परिदृश्य-आधारित दृष्टिकोण: यह मिशन वन एवं गैर-वन क्षेत्रों में पारिस्थितिकी-पुनर्स्थापन पर केंद्रित है। इसमें क्षरित परिदृश्यों का पुनर्स्थापन तथा वनीकरण गतिविधियाँ शामिल हैं। इसके क्रियान्वयन में संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ (JFMCs) भी शामिल हैं।
- बहुआयामी परिणाम: ग्रीन इंडिया मिशन का उद्देश्य कार्बन पृथक्करण, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ाना तथा वन संसाधनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका में सुधार करना है। इसके मूल ढाँचे में मनरेगा और CAMPA जैसी योजनाओं के साथ अभिसरण की भी परिकल्पना की गई थी।
ग्रीन इंडिया मिशन क्यों महत्वपूर्ण है?

- जलवायु शमन: वन और वृक्ष आवरण महत्वपूर्ण कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। इसलिए, कार्बन अवशोषण बढ़ाने और अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के भारत के प्रयासों में ग्रीन इंडिया मिशन का महत्वपूर्ण योगदान है।
- पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन: क्षरित वनों और परिदृश्यों का पुनर्स्थापन जैव विविधता, मृदा संरक्षण, जल विनियमन तथा अन्य पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में सुधार कर सकता है।
- जलवायु अनुकूलनशीलता: स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र सूखा, बाढ़, भूमि क्षरण तथा जलवायु से संबंधित अन्य दबावों के प्रति परिदृश्यों और समुदायों की अनुकूलनशीलता को मजबूत कर सकते हैं।
- आजीविका सुरक्षा: वन-निर्भर समुदाय गैर-इमारती वन उत्पादों (NTFPs) तथा अन्य पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित आजीविकाओं के लिए वनों पर निर्भर रहते हैं। इस कारण ग्रीन इंडिया मिशन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक आयाम भी है।
प्रमुख क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ
- परिणाम बनाम वृक्षारोपण दृष्टिकोण: सफलता का आकलन केवल लगाए गए या उपचारित क्षेत्रफल के आधार पर करने के बजाय पौधों की जीवित रहने की दर, वन की गुणवत्ता, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन के आधार पर किया जाना चाहिए।
- वित्तपोषण और क्रियान्वयन क्षमता: अपर्याप्त वित्तपोषण, धनराशि की उपलब्धता/उपयोग में देरी तथा राज्यों की असमान क्रियान्वयन क्षमता हस्तक्षेपों के पैमाने और निरंतरता को सीमित कर सकती है।
- निगरानी और जवाबदेही: कमजोर परिणाम-आधारित निगरानी के कारण पौधों की जीवित रहने की दर, वन की गुणवत्ता में सुधार तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक लाभों का आकलन करना कठिन हो जाता है।
- खंडित क्रियान्वयन: ग्रीन इंडिया मिशन, CAMPA, मनरेगा और अन्य संबंधित कार्यक्रमों के बीच सीमित अभिसरण तथा विभिन्न पहलों का अलग-अलग संचालित होना खंडित हस्तक्षेपों और संसाधनों के अकुशल उपयोग को जन्म दे सकता है।
आगे की राह
- परिदृश्य पुनर्स्थापन की ओर बदलाव: केवल वृक्षारोपण के लक्ष्यों से आगे बढ़कर देशज एवं स्थल-विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिसमें वन की गुणवत्ता, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को अधिक महत्व दिया जाए।
- परिणाम-आधारित निगरानी को मजबूत करना: जीवित रहने की दर, वन घनत्व में सुधार, जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और कार्बन अवशोषण के लिए मापनीय संकेतक निर्धारित किए जाएँ तथा GIS, रिमोट सेंसिंग और जमीनी सत्यापन का उपयोग किया जाए।
- सामुदायिक भागीदारी और अभिसरण को मजबूत करना: ग्राम सभाओं, संयुक्त वन प्रबंधन संस्थाओं (JFMCs) और स्थानीय समुदायों की भूमिका को मजबूत किया जाए तथा CAMPA और मनरेगा जैसी योजनाओं के साथ अभिसरण में सुधार किया जाए।
- वित्तीय एवं संस्थागत क्षमता में सुधार: धनराशि का समय पर जारी होना और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाए तथा राज्य-स्तरीय योजना निर्माण, क्रियान्वयन और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत किया जाए।
