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सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
संदर्भ: भारत ने मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के पक्षकारों के सम्मेलन के 17वें सत्र में भारत के घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के लिए अपनी पहली मार्गदर्शिका जारी की।
मार्गदर्शिका की प्रमुख विशेषताएँ
- यह मार्गदर्शिका भारत के प्रमुख खुले प्राकृतिक पारितंत्रों से संबंधित जानकारी को एक साथ प्रस्तुत करती है, जिसमें उनके भौगोलिक परिवेश, पारिस्थितिक विशेषताओं, जैव विविधता तथा उनसे जुड़े समुदायों और जनजातियों को शामिल किया गया है।
- इसमें भारत के घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्रों की विविधता एवं वितरण के साथ-साथ उनके प्रमुख परिदृश्यों और पारिस्थितिक विशेषताओं का विवरण दिया गया है।

- इसमें पशुपालन, अग्नि पारिस्थितिकी और कार्बन पृथक्करण पर विशेष विषयगत खंड शामिल किए गए हैं।
- यह मार्गदर्शिका भारत के खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के संरक्षण, पुनर्स्थापन और सतत प्रबंधन को सुदृढ़ करने का प्रयास करती है।
- यह संरक्षण के पारंपरिक वृक्ष-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ने की आवश्यकता पर बल देती है तथा घास के मैदानों, झाड़ीभूमियों, अवनालिकाओं और अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्रों को वनों के साथ-साथ विज्ञान-आधारित संरक्षण की आवश्यकता वाले विशिष्ट पारितंत्रों के रूप में मान्यता देती है।
- यह मार्गदर्शिका नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, संरक्षण कार्यकर्ताओं, विकास एजेंसियों और स्थानीय समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में उपयोगी हो सकती है।
भारत के खुले प्राकृतिक पारितंत्रों के बारे में
- भारत के खुले प्राकृतिक पारितंत्रों में विभिन्न प्रकार के वनरहित भू-दृश्य शामिल हैं, जैसे हिमालयी और तराई घासस्थल, थार और बन्नी के भू-दृश्य, दक्कन के सवाना क्षेत्र, चट्टानी पठार, अवनालिकाएँ, झाड़ीभूमियाँ, तटीय पारितंत्र और मरुस्थलीय भू-दृश्य।
- वर्ष 2022 के उच्च-रिज़ॉल्यूशन मानचित्रण अध्ययन के अनुसार, अर्द्ध-शुष्क खुले प्राकृतिक पारितंत्र लगभग 3.2 लाख वर्ग किलोमीटर, अर्थात भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 10 प्रतिशत में फैले हुए हैं। इनका प्रमुख विस्तार राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात में है।
- ये पारितंत्र समृद्ध जैव विविधता का समर्थन करते हैं, जिसमें महान भारतीय तिलोर और कृष्णमृग जैसी प्रजातियाँ शामिल हैं। साथ ही, ये मृदा एवं जल संबंधी प्रक्रियाओं तथा पर्याप्त मात्रा में भूमिगत कार्बन भंडारण में योगदान देते हैं।
- ये पारितंत्र पशुपालन, पशुधन-आधारित और कृषि-आधारित आजीविकाओं को भी बनाए रखते हैं तथा पशुधन पर निर्भर समुदायों के लिए महत्वपूर्ण चारे के संसाधन उपलब्ध कराते हैं।
- ऐतिहासिक रूप से, घास के मैदानों, झाड़ीभूमियों और अवनालिकाओं को अक्सर केवल इसलिए “बंजर भूमि” या “क्षीण क्षेत्र” माना जाता रहा है क्योंकि इनमें घना वृक्षावरण नहीं होता। इसके कारण संरक्षण और भूमि-उपयोग नियोजन में इन्हें पर्याप्त मान्यता नहीं मिल पाई।
- स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित और प्रबंधित पारंपरिक ओरण और गौचर भू-दृश्य यह दर्शाते हैं कि पारितंत्र, पशुधन, जैव विविधता और आजीविका एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।
महत्व
- जैव विविधता संरक्षण: खुले पारितंत्रों के पारिस्थितिक महत्व तथा उनमें पाई जाने वाली स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण की आवश्यकता को मान्यता देता है।
- जलवायु अनुकूलन क्षमता: स्वस्थ घासस्थल जैव विविधता, आजीविका और जलवायु अनुकूलन क्षमता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इनकी मृदा में पर्याप्त मात्रा में कार्बन का भंडारण होता है।
- आजीविका: ये पारितंत्र पशुपालन, पशुधन-आधारित और कृषि-आधारित आजीविकाओं को बनाए रखते हैं।
- भूमि क्षरण तटस्थता: घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारितंत्रों का पुनर्स्थापन भारत के भूमि क्षरण तटस्थता संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त करने में योगदान दे सकता है।
- विज्ञान-आधारित संरक्षण: इसके शुभारंभ ने वैज्ञानिक ज्ञान को सुदृढ़ करने, भूमि क्षरण के बेहतर आकलन तथा परिदृश्य-स्तरीय नियोजन की आवश्यकता को रेखांकित किया।
- समुदाय की भागीदारी: इसमें जन-केंद्रित चरागाह प्रबंधन तथा सतत प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया।
- वैश्विक मान्यता: संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण अभिसमय के पक्षकारों के सम्मेलन के 17वें सत्र में इसका शुभारंभ भारत को अपने विविध खुले पारितंत्रों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने तथा भूमि पुनर्स्थापन, चरागाहों और भूमि क्षरण तटस्थता से संबंधित वैश्विक विमर्श में उनकी भूमिका को बढ़ाने का मंच प्रदान करता है।
