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सामान्य अध्ययन-1: भारतीय संस्कृति — प्राचीन से आधुनिक काल तक की कला-रूपों, साहित्य एवं स्थापत्य कला के प्रमुख पहलू।

सामान्य अध्ययन -2: भारतीय संविधान — संशोधन एवं महत्वपूर्ण प्रावधान।

संदर्भ: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी, जिसके फलस्वरूप यह विधेयक अधिनियम का रूप ले चुका है। इसके माध्यम से राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत प्राप्त वैधानिक संरक्षण का विस्तार राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ तक किया गया है।

राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 के बारे में

  •  धारा 3 में संशोधन: यह अधिनियम राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 का विस्तार करते हुए इसके दायरे में राष्ट्रीय गान एवं राष्ट्रीय गीत, दोनों को शामिल करता है।
  •  निषिद्ध आचरण: वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकना अथवा इसके गायन में संलग्न सभा में जानबूझकर व्यवधान उत्पन्न करना अपराध माना गया है।
  •  दंड: इस अपराध के लिए अधिकतम तीन वर्ष का कारावास, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान किया गया है। यह राष्ट्रीय गान के संबंध में धारा 3 के तहत विद्यमान दंड के अनुरूप है।
  •  पुनरावृत्ति पर दोषसिद्धि: धारा 3A के तहत बढ़ा हुआ दंड लागू रहेगा, जिसके अनुसार दूसरी या उसके बाद की दोषसिद्धि पर न्यूनतम एक वर्ष का कारावास निर्धारित है।
  •  वैधानिक समानता: यह संशोधन वंदे मातरम् को इसके गायन के दौरान जानबूझकर बाधा डालने अथवा व्यवधान उत्पन्न करने के संबंध में राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।

वंदे मातरम् के बारे में

  • वंदे मातरम्, जिसका अर्थ हे मातृभूमि, मैं तुम्हें नमन करता हूँ” है, की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह पहली बार 1875 में ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ तथा बाद में 1882 में ‘आनंदमठ’ में सम्मिलित किया गया।
  • यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक शक्तिशाली प्रतीक बना तथा 1905 के स्वदेशी आंदोलन से विशेष रूप से जुड़ा रहा।
  • रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया।
  • 1937 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आधिकारिक कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरों के उपयोग का निर्णय लिया, क्योंकि बाद के अंतरों में ऐसे धार्मिक संदर्भ थे, जिन्हें कुछ समुदायों द्वारा बहिष्कारी माना गया।
  • 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि वंदे मातरम् को जन गण मन के साथ समान रूप से सम्मानित किया जाएगा तथा इसे समान दर्जा प्रदान किया जाएगा।
  • राष्ट्रीय गान के विपरीत, वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 में विशेष रूप से शामिल नहीं किया गया था; 2026 का संशोधन इस वैधानिक अंतर को संबोधित करता है।

चिंताएँ एवं संवैधानिक मुद्दे

  • वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यदि कानून की व्याख्या सक्रिय रूप से बाधा डालने के बजाय शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति या भाग न लेने तक विस्तारित की जाती है, तो यह अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत संवैधानिक चिंताएँ उत्पन्न कर सकती है।
  • धर्म एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता: जहाँ भाग लेने से इनकार वास्तविक धार्मिक विश्वासों पर आधारित हो, वहाँ अनुच्छेद 25 प्रासंगिक हो सकता है।
  • न्यायिक दृष्टांत: बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जो विद्यार्थी राष्ट्रीय गान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे, लेकिन अपने वास्तविक धार्मिक विश्वासों के कारण उसे नहीं गाते थे, उन्हें राष्ट्रीय गान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
  • परिभाषात्मक अस्पष्टता: जानबूझकर रोकना” एवं “व्यवधान” जैसे शब्दों की स्पष्ट एवं सावधानीपूर्वक व्याख्या आवश्यक है, ताकि कानून के मनमाने एवं भेदभावपूर्ण प्रवर्तन को रोका जा सके।
  • संवैधानिक संतुलन: अनुच्छेद 51A(क) नागरिकों का राष्ट्रीय ध्वज एवं राष्ट्रीय गान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है, किंतु इसके प्रवर्तन को मौलिक अधिकारों एवं संवैधानिक स्वतंत्रताओं के अनुरूप होना चाहिए।

आगे की राह

  • कानूनी स्पष्टता: जानबूझकर रोकना” एवं “व्यवधान” जैसे शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए, ताकि व्याख्या संबंधी अस्पष्टता को न्यूनतम किया जा सके।
  • व्यवधान एवं भाग न लेने के बीच स्पष्ट अंतर: कानून के क्रियान्वयन में सक्रिय रूप से बाधा डालने तथा शांतिपूर्ण रूप से भाग लेने से इनकार करने के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। यह संवैधानिक सिद्धांतों एवं न्यायिक दृष्टांतों के अनुरूप होना चाहिए।
  • नागरिक जागरूकता को बढ़ावा: वंदे मातरम् के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व के संबंध में जन-जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए तथा इसके प्रति स्वैच्छिक सम्मान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • संवैधानिक संतुलन: राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा एवं सम्मान की रक्षा कानूनी संरक्षण, संवैधानिक मूल्यों एवं नागरिक शिक्षा के माध्यम से की जानी चाहिए, किंतु इसके नाम पर मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं का हनन नहीं होना चाहिए।
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