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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल ढाँचा; न्यायपालिका की संरचना, गठन और कार्य; विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति, विभिन्न संवैधानिक पदों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

संदर्भ: लोकसभा नेउच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर दिया है, जिसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित उच्चतम न्यायालय में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह विधेयक उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 का स्थान लेता है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 5 मई 2026 को प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद राष्ट्रपति ने मई 2026 में प्रख्यापित किया था।
  • यह उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है, जिसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। इस प्रकार, न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या 38 हो गई है।
  • सरकार ने कहा कि न्यायिक क्षमता में वृद्धि का उद्देश्य मामलों के बढ़ते लंबित भार को कम करना, मामलों के प्रबंधन में सुधार करना तथा मामलों, विशेष रूप से संविधान पीठ से संबंधित मामलों, के त्वरित निपटारे को सक्षम बनाना है।

संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचा

  • संविधान का अनुच्छेद 124 भारत के उच्चतम न्यायालय की स्थापना का प्रावधान करता है।
    • अनुच्छेद 124(1) के अनुसार, उच्चतम न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा संसद द्वारा विधि के माध्यम से निर्धारित की जाने वाली संख्या में अन्य न्यायाधीश होंगे।
    • इसलिए, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में परिवर्तन करने के लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक नहीं है; संसद साधारण बहुमत से पारित सामान्य विधि के माध्यम से ऐसा कर सकती है।
  • संसद ने उच्चतम न्यायालय की अधिकतम स्वीकृत संख्या निर्धारित करने के लिए उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 लागू किया।
    • उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 अधिनियम की धारा 2 में संशोधन करते हुए “33” के स्थान पर “37” करता है, जिससे भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ जाती है।

वृद्धि के पीछे तर्क

  • मामलों का बढ़ता लंबित भार: उच्चतम न्यायालय के समक्ष 92,101 मामले लंबित थे। न्यायालय में नए मामलों के पंजीकरण और उनके निपटारे के बीच अंतर लगातार बना हुआ है।
  • बढ़ता मुकदमा भार: वर्ष 2025 के दौरान उच्चतम न्यायालय में 75,410 नए मामले आए, जबकि केवल 65,615 मामलों का निपटारा किया गया। इसके परिणामस्वरूप लंबित मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई।
  • मामलों के प्रबंधन में सुधार: न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से न्यायालय को अपने बढ़ते मामला भार, विशेषकर लंबे समय से लंबित मामलों, के बेहतर प्रबंधन में मदद मिलने की उम्मीद है।
  • संविधान पीठ की आवश्यकता: कई संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई के लिए पाँच या उससे अधिक न्यायाधीशों वाली पीठों की आवश्यकता होती है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से नियमित न्यायिक कार्य प्रभावित किए बिना अधिक संविधान पीठों का गठन संभव होगा।
  • न्यायिक क्षमता को मजबूत करना: सरकार न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने को न्यायिक दक्षता बढ़ाने और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने के लिए सबसे तात्कालिक एवं व्यावहारिक उपायों में से एक मानती है।

इस कदम का महत्व / निहितार्थ

  • मामलों के लंबित भार में कमी: अतिरिक्त न्यायाधीशों से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आने और न्याय वितरण प्रणाली में देरी कम होने की उम्मीद है।
  • समयबद्ध न्याय तक पहुँच: त्वरित न्यायिक निर्णय नागरिकों की शीघ्र न्याय तक पहुँच को बढ़ाएगा, जो विधि के शासन का एक आवश्यक घटक है।
  • अधिक प्रभावी संविधान पीठें: न्यायाधीशों की बढ़ी हुई संख्या से उच्चतम न्यायालय को नियमित मामलों के निपटारे को बनाए रखते हुए अधिक संविधान पीठों का गठन करने में सक्षम बनाया जा सकेगा।
  • न्यायिक दक्षता में सुधार: अधिक न्यायिक क्षमता से समग्र मामला प्रबंधन में सुधार होने और नए मामलों के दाखिल होने तथा उनके निपटारे के बीच के अंतर को कम करने की संभावना है।
  • न्याय वितरण प्रणाली को बेहतर बनाना: यह संशोधन संवैधानिक बदलाव की आवश्यकता के बिना संस्थागत क्षमता को मजबूत करता है तथा अधिक उत्तरदायी और कुशल न्यायपालिका का समर्थन करता है।
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