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सामान्य अध्ययन-2: भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा करार; महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान , एजेंसियाँ मंच – उनकी संरचना, अधिदेश।
संदर्भ: विश्व व्यापार संगठन में आयोजित भारत की आठवीं व्यापार नीति समीक्षा (Trade Policy Review–TPR) के दौरान भारत ने बहुपक्षीय समझौतों को सर्वसम्मति के बिना विश्व स्वास्थ्य संगठन के ढाँचे में शामिल किए जाने का विरोध दोहराया। इस मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन सुधारों की भविष्य की दिशा को लेकर भारत और कई सदस्य देशों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए।
मुद्दे की प्रमुख विशेषताएँ
- विश्व स्वास्थ्य संगठन सदस्य देशों द्वारा उठाई गई चिंताएँ
- यूरोपीय संघ (EU), कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (UK), कंबोडिया, गाम्बिया तथा कोस्टा रिका सहित कई विश्व स्वास्थ्य संगठन सदस्य देशों ने भारत से बहुपक्षीय पहलों के प्रति अधिक रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया।
- इन देशों का तर्क था कि ऐसे समझौते विश्व स्वास्थ्य संगठन की वार्ता प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने तथा उभरते व्यापारिक मुद्दों का समाधान करने में सहायक हो सकते हैं।
- सदस्य देशों ने यह भी चिंता व्यक्त की कि भारत का विरोध विश्व स्वास्थ्य संगठन सुधारों की जारी प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
- भारत का दृष्टिकोण
- भारत ने स्पष्ट किया कि बहुपक्षीय समझौते विश्व स्वास्थ्य संगठन की सर्वसम्मति-आधारित निर्णय प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकते और न ही उनमें भाग न लेने वाले सदस्य देशों के अधिकारों एवं दायित्वों में कोई परिवर्तन कर सकते हैं।
- भारत का तर्क है कि सभी सदस्य देशों की सर्वसम्मति के बिना ऐसे समझौतों को विश्व स्वास्थ्य संगठन के कानूनी ढाँचे में शामिल करना बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को कमजोर करेगा।
- भारत ने ई-कॉमर्स समझौते (ECA) के अंतर्गत प्रस्तावित अंतरिम व्यवस्थाओं के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक द्वारा जमा-अभिरक्षक की भूमिका निभाने के कानूनी आधार पर भी प्रश्न उठाया।
बहुपक्षीय समझौतों की समझ
- अर्थ: बहुपक्षीय समझौते वे समझौते होते हैं, जिन पर विश्व व्यापार संगठन (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के इच्छुक सदस्य देशों के एक समूह द्वारा वार्ता की जाती है। इनसे उत्पन्न अधिकार एवं दायित्व सामान्यतः केवल भाग लेने वाले सदस्य देशों पर ही लागू होते हैं।
- संयुक्त वक्तव्य पहल (Joint Statement Initiatives–JSIs): हाल के अधिकांश बहुपक्षीय समझौतों पर वार्ता संयुक्त वक्तव्य पहल (JSIs) के माध्यम से की जाती है, जिसके अंतर्गत समान विचारधारा वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन सदस्य देश पारंपरिक बहुपक्षीय वार्ता ढाँचे से बाहर रहकर समझौतों पर बातचीत करते हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन में कानूनी स्थिति: बहुपक्षीय समझौतों के विपरीत, बहुपक्षीय समझौते विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी सदस्य देशों पर बाध्यकारी नहीं होते। केवल वे समझौते, जिन्हें सर्वसम्मति प्राप्त हो, मराकेश समझौते के परिशिष्ट-4 में शामिल किए जा सकते हैं, जिससे वे विश्व स्वास्थ्य संगठन के कानूनी ढाँचे का हिस्सा बन जाते हैं।
- प्रकार:
- खुले बहुपक्षीय समझौते: इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के अन्य सदस्य देश बाद में भी शामिल हो सकते हैं।
- बंद बहुपक्षीय समझौते: इनमें भागीदारी केवल मूल हस्ताक्षरकर्ता देशों तक सीमित रहती है।
- उद्देश्य: ऐसे क्षेत्रों में, जहाँ विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी सदस्य देशों के बीच सर्वसम्मति प्राप्त करना कठिन होता है, वहाँ इच्छुक सदस्य देशों को वार्ता आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करना।
- उदाहरण:
- वर्तमान में लागू: सरकारी खरीद समझौता (GPA) तथा सूचना प्रौद्योगिकी समझौता (ITA)।
- वार्ता के अधीन: विकास हेतु निवेश सुविधा समझौता (IFD) तथा ई-कॉमर्स समझौता (ECA)।

बहुपक्षीय समझौतों का महत्त्व क्यों बढ़ रहा है?
- वार्ता में गतिरोध को समाप्त करना: जब विश्व व्यापार संगठन (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की सर्वसम्मति-आधारित निर्णय प्रक्रिया के कारण बहुपक्षीय वार्ताएँ ठप पड़ जाती हैं, तब इच्छुक सदस्य देशों को आगे बढ़कर समझौते करने का अवसर मिलता है।
- उभरते व्यापारिक मुद्दों का समाधान: ये डिजिटल व्यापार, निवेश सुविधा, पर्यावरणीय सततता तथा सेवा क्षेत्र जैसे उन क्षेत्रों में नियम निर्माण को बढ़ावा देते हैं, जिनका वर्तमान विश्व स्वास्थ्य संगठन समझौतों में पर्याप्त रूप से समावेश नहीं है।
- लचीली भागीदारी: देश अपनी रुचि और तैयारी के स्तर के अनुसार स्वेच्छा से इसमें शामिल हो सकते हैं। इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी सदस्य देशों की भागीदारी आवश्यक नहीं होती।
- वैश्विक व्यापार प्रणाली का आधुनिकीकरण: ये तकनीकी प्रगति तथा बदलते व्यावसायिक मॉडलों के अनुरूप वैश्विक व्यापार नियमों को अद्यतन करने में सहायता करते हैं।
- व्यापक सहमति के निर्माण का आधार: सफल बहुपक्षीय पहलें भविष्य में अधिक व्यापक बहुपक्षीय समझौतों के निर्माण के लिए आधारशिला का कार्य कर सकती हैं।
बहुपक्षीय समझौतों को लेकर भारत की चिंताएँ
- बहुपक्षवाद का कमजोर होना: भारत का मानना है कि बहुपक्षीय समझौते विश्व स्वास्थ्य संगठन की सर्वसम्मति-आधारित निर्णय प्रक्रिया तथा सभी सदस्य देशों की समान भागीदारी के सिद्धांत को कमजोर करते हैं।
- विकास संबंधी आयाम का कमजोर पड़ना: सीमित भागीदारी के कारण विकासशील एवं अल्पविकसित देशों के हित हाशिए पर जा सकते हैं तथा विशेष एवं विभेदक व्यवहार (S&DT) के सिद्धांत का महत्व कम हो सकता है।
- प्रक्रियात्मक एवं कानूनी चिंताएँ: भारत का मत है कि मराकेश समझौते के प्रावधानों के अनुसार सर्वसम्मति के बिना बहुपक्षीय समझौतों को विश्व स्वास्थ्य संगठन के कानूनी ढाँचे में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के वार्ता-क्षेत्र का विस्तार: भारत का तर्क है कि निवेश सुविधा तथा ई-कॉमर्स जैसे विषयों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के सभी सदस्य देशों के बीच बहुपक्षीय स्तर पर वार्ता करने की सहमति नहीं बनी है, इसलिए इन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन की औपचारिक वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।
- बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का विखंडन: भारत का मानना है कि बहुपक्षीय समझौतों की बढ़ती संख्या से विश्व स्वास्थ्य संगठन सदस्य देशों के बीच व्यापारिक दायित्वों की अनेक परतें बन सकती हैं, जिससे व्यापार नियमों का विखंडन, एक-दूसरे से ओवरलैप करने वाली प्रतिबद्धताएँ तथा एक समान, नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का सिद्धांत कमजोर हो सकता है।
