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सामान्य अध्ययन-3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा; विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।
संदर्भ: भारत ने हाल ही में लद्दाख की पुगा घाटी में अपने पहले तथा सबसे गहरे 1,000 मीटर भू-तापीय कुओं को चालू कर दिया है। इसके साथ ही देश की पहली 1 मेगावाट प्रदर्शन-स्तरीय भू-तापीय विद्युत परियोजना का मार्ग प्रशस्त हुआ है, जो भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
पुगा भू-तापीय परियोजना के बारे में
- यह परियोजना लद्दाख की पुगा घाटी में स्थित है, जो भारत के सबसे संभावनाशील भू-तापीय क्षेत्रों में से एक है।
- इस परियोजना का कार्यान्वयन ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र द्वारा लद्दाख प्रशासन तथा लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (लेह) के सहयोग से किया जा रहा है।
- इस परियोजना का उद्देश्य भारत की पहली 1 मेगावाट प्रदर्शन-स्तरीय भू-तापीय विद्युत परियोजना की स्थापना करना है।
- दो भू-तापीय कुएँ (जीटी-02 एवं जीटी-03) को 14,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर 1,000 मीटर की गहराई तक सफलतापूर्वक खोदा गया है, जिससे ये भारत के सबसे गहरे भू-तापीय कुएँ बन गए हैं।
- ये कुएँ भू-तापीय जलाशय के मूल्यांकन, विद्युत संयंत्र की योजना-निर्माण तथा लद्दाख में भू-तापीय संसाधनों के भविष्य के वाणिज्यिक विकास में सहायक होंगे।
- जून 2026 में लद्दाख प्रशासन, लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (लेह) तथा ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र के बीच पाँच वर्षीय त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन के नवीनीकरण के बाद इस परियोजना को पुनः प्रारंभ किया गया।
भू-तापीय ऊर्जा के बारे में
- भू-तापीय कुएँ भूमिगत भू-तापीय जलाशयों तक खोदे जाते हैं, ताकि भाप एवं गर्म जल का उपयोग विद्युत उत्पादन तथा प्रत्यक्ष तापीय अनुप्रयोगों के लिए किया जा सके।
- भू-तापीय ऊर्जा एक स्वच्छ, विश्वसनीय, मौसम से अप्रभावित तथा चौबीसों घंटे उपलब्ध (आधार-भार) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।

- भू-तापीय प्रणालियों को सामान्यतः भूगत जलाशय के तापमान के आधार पर उच्च, मध्यम तथा निम्न एन्थैल्पी प्रणालियों में वर्गीकृत किया जाता है।
- यह स्थान-विशिष्ट नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जो विशेष रूप से दूरस्थ एवं दुर्गम क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयुक्त है।
- भू-तापीय विद्युत संयंत्रों के प्रकार
- शुष्क भाप संयंत्र (Dry Steam Plant): इसमें भूमिगत जलाशयों से प्राप्त प्राकृतिक भाप का सीधे टर्बाइनों को चलाने के लिए उपयोग किया जाता है।
- फ्लैश भाप संयंत्र (Flash Steam Plant): इसमें उच्च दाब वाले गर्म जल को भाप में परिवर्तित कर टर्बाइनों को चलाया जाता है।
- द्विआधारी चक्र संयंत्र (Binary Cycle Plant): इसमें भू-तापीय जल की ऊष्मा को कम क्वथनांक वाले द्वितीयक द्रव में स्थानांतरित किया जाता है, जो वाष्पित होकर टर्बाइन को चलाता है।
भारत में स्थिति एवं संभावनाएँ

- भारत में भू-तापीय ऊर्जा की अनुमानित क्षमता लगभग 10,600 मेगावाट है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देश में 381 गर्म जलस्रोतों तथा 42 संभावनाशील भू-तापीय स्थलों की पहचान की है, जो विद्युत उत्पादन एवं प्रत्यक्ष उपयोग के लिए उपयुक्त हैं।
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भारत में 10 भू-तापीय प्रांतों की पहचान की है— हिमालयी भू-तापीय प्रांत, नागा–लुशाई भू-तापीय प्रांत, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, सोन–नर्मदा–ताप्ती (सोनाटा) भू-तापीय प्रांत, पश्चिमी तटीय भू-तापीय प्रांत, कैंबे गर्त,अरावली भू-तापीय प्रांत, महानदी भू-तापीय प्रांत, गोदावरी भू-तापीय प्रांत, दक्षिण भारतीय क्रेटोनिक भू-तापीय प्रांत अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावित क्षमता 2035 तक 4.2 गीगावाट तथा 2045 तक लगभग 100 गीगावाट होसकती है ।
- वैश्विक स्तर पर वर्तमान में 17 गीगावाट से कम भू-तापीय विद्युत क्षमता संचालित है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनेशिया तथा फिलीपींस अग्रणी हैं।
- राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति, 2025 का उद्देश्य भू-तापीय ऊर्जा को भारत के नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण का एक प्रमुख स्तंभ बनाना है। यह नीति ऊर्जा सुरक्षा, वर्ष 2070 के शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं संयुक्त अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देती है।
परियोजना का महत्त्व
- विश्वसनीय आधार-भार नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में भू-तापीय ऊर्जा के उपयोग की भारत की क्षमता को प्रदर्शित करती है।
- लद्दाख जैसे दूरस्थ एवं उच्च हिमालयी क्षेत्रों में निर्बाध विद्युत उपलब्ध कराकर ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ बनाती है।
- लद्दाख की कार्बन-तटस्थ परिकल्पना तथा भारत के वर्ष 2070 के शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य को समर्थन प्रदान करती है।
- भू-तापीय जलाशयों के मूल्यांकन तथा प्रौद्योगिकी प्रदर्शन के माध्यम से भू-तापीय संसाधनों के भविष्य के वाणिज्यिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
- हरितगृह कृषि, जलीय कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन तथा अन्य प्रत्यक्ष उपयोगों के अवसर सृजित कर क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है।
- सौर एवं पवन ऊर्जा जैसे रुक-रुक कर उपलब्ध होने वाले नवीकरणीय स्रोतों के पूरक के रूप में 24×7 विश्वसनीय आधार-भार नवीकरणीय विद्युत उपलब्ध कराती है।
चुनौतियाँ
- प्रारंभिक पूंजीगत लागत तथा ड्रिलिंग व्यय अधिक होने के कारण भू-तापीय परियोजनाएँ अत्यधिक पूंजी-प्रधान होती हैं।
- अन्वेषण संबंधी जोखिम तथा भूमिगत जटिल भू-वैज्ञानिक परिस्थितियाँ तकनीकी अनिश्चितता बढ़ाती हैं।
- उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक प्रतिकूल मौसम, दुर्गम भू-भाग तथा सीमित वार्षिक कार्य अवधि परियोजनाओं के क्रियान्वयन को कठिन बनाती है।
- भू-तापीय द्रवों के प्रबंधन सहित पर्यावरणीय एवं स्थानीय समुदायों से जुड़े मुद्दों के समाधान हेतु सावधानीपूर्वक योजना एवं सतत कार्यान्वयन आवश्यक है।
- उच्च अन्वेषण जोखिम तथा पूंजी-प्रधान परियोजनाओं के कारण निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित रहती है।
आगे की राह
- राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति, 2025 का प्रभावी क्रियान्वयन कर अन्वेषण तथा वाणिज्यिक उपयोग में तेजी लाई जाए।
- भू-तापीय अन्वेषण एवं ड्रिलिंग के लिए अनुसंधान, स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा क्षमता निर्माण को सुदृढ़ किया जाए।
- 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण तथा परित्यक्त तेल एवं गैस कुओं के उपयोग सहित सार्वजनिक-निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जाए।
- पुगा प्रदर्शन परियोजना के अनुभव के आधार पर अन्य चिन्हित भू-तापीय प्रांतों में भी भू-तापीय संसाधनों का विकास किया जाए, साथ ही पर्यावरणीय सततता एवं स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
