संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय; स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

संदर्भ: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक, 2025 की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने चिंता व्यक्त की है कि प्रस्तावित एकल उच्च शिक्षा नियामक के गठन से शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण हो सकता है तथा संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक, 2025 के बारे में

  • उद्देश्य: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 को लागू करने के लिए उच्च शिक्षा हेतु एकीकृत, पारदर्शी एवं परिणामोन्मुखी नियामक ढाँचे की स्थापना करना।
  • सर्वोच्च नियामक निकाय: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के स्थान पर विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) को सर्वोच्च नियामक संस्था के रूप में स्थापित किया जाएगा।
    • आयोग तीन विशिष्ट परिषदों अर्थात् नियामक परिषद, प्रत्यायन परिषद एवं मानक परिषद के माध्यम से कार्य करेगा।
  • संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष तथा अधिकतम 12 सदस्य होंगे, जिनमें तीनों परिषदों के अध्यक्ष, उच्च शिक्षा सचिव, प्रतिष्ठित विशेषज्ञ तथा राज्य उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
  • परिषदों के कार्य: नियामक परिषद उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) का विनियमन करेगी तथा संस्थागत स्वायत्तता को बढ़ावा देगी।  मानक परिषद अधिगम परिणाम (Learning Outcomes) तथा न्यूनतम शैक्षणिक मानकों का निर्धारण करेगी। प्रत्यायन परिषद उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए प्रत्यायन का ढाँचा विकसित करेगी।
  • कार्यक्षेत्र: यह विधेयक उच्च शिक्षा, जिसमें तकनीकी शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण तथा वास्तुकला शिक्षा शामिल है, को कवर करता है; जबकि चिकित्सा, विधि तथा कुछ अन्य व्यावसायिक संस्थानों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
    • यह राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों (INIs), केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों तथा डीम्ड विश्वविद्यालयों पर भी लागू होगा।
  • डिग्री प्रदान करने की शक्ति: डिग्री केवल विधि द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय, केंद्रीय अधिनियम द्वारा अधिकृत संस्थान, अथवा केंद्रीय सरकार की पूर्व स्वीकृति के साथ नियामक परिषद द्वारा अधिकृत अन्य उच्च शिक्षा संस्थान (HEIs) ही प्रदान कर सकेंगे।

विधेयक का महत्त्व

  • एकीकृत नियामक ढाँचा: अनेक नियामक संस्थाओं के स्थान पर एकल नियामक व्यवस्था स्थापित कर नियामकीय ओवरलैप को कम करता है तथा समन्वय में सुधार लाता है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप: सरल शासन व्यवस्था, बहुविषयक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार संबंधी NEP-2020 के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है।
  • कार्यात्मक विशेषज्ञता: अलग-अलग नियामक, प्रत्यायन एवं मानक परिषदों की स्थापना से एक ही संस्थागत ढाँचे के भीतर विशेषज्ञतापूर्ण निगरानी सुनिश्चित होती है।
  • हितों के टकराव में कमी: विनियमन और वित्तपोषण को अलग करने से उच्च शिक्षा संस्थानों की निगरानी में अधिक पारदर्शिता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।

संसदीय समिति द्वारा व्यक्त की गई प्रमुख चिंताएँ

  • शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण: विनियमन, प्रत्यायन, मानक निर्धारण तथा प्रवर्तन जैसी सभी शक्तियाँ एक ही संस्था में निहित होने से संस्थागत नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था कमजोर हो सकती है।
  • राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों (INIs) के लिए अधिक सशक्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता: समिति ने IIT, IIM तथा अन्य राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों को प्रस्तावित ढाँचे में बनाए रखते हुए उनकी स्वायत्तता की रक्षा के लिए अधिक मजबूत वैधानिक सुरक्षा प्रदान करने की अनुशंसा की।
  • निर्णय-निर्माण का केंद्रीकरण: नियुक्तियों एवं नीतिगत निर्णयों पर केंद्र सरकार का बढ़ा हुआ नियंत्रण उच्च शिक्षा शासन व्यवस्था के संघीय स्वरूप को कमजोर कर सकता है।
  • व्यापक दंडात्मक शक्तियाँ: दंड लगाने एवं नियामकीय कार्रवाई करने की व्यापक शक्तियाँ संस्थानों के कार्यों में मनमाने अथवा अत्यधिक हस्तक्षेप का कारण बन सकती हैं।
  • स्वतंत्र अपीलीय तंत्र का अभाव: परिषदों के निर्णयों के विरुद्ध अपील का अधिकार केंद्र सरकार के पास होने से स्वतंत्र अपीलीय प्राधिकरण के अभाव को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।

समिति की सिफारिशें

  • संस्थागत स्वायत्तता की रक्षा: VBSA ढाँचे के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों की स्वायत्तता बनाए रखने हेतु अधिक सशक्त वैधानिक सुरक्षा उपाय शामिल किए जाएँ।
  • संघीय प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करना: आयोग की शासन संरचना में राज्यों एवं राज्य विश्वविद्यालयों का अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
  • मनमाने दंड को रोकना: चरणबद्ध दंड व्यवस्था के दायरे एवं उसके अनुप्रयोग को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए तथा दंड लगाने से पूर्व पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए।
  • समयबद्ध नियुक्तियाँ सुनिश्चित करना: पूर्वानुमानित रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया कम-से-कम छह माह पहले प्रारंभ करने तथा 90 दिनों के भीतर नियुक्तियाँ पूर्ण करने के लिए नियम बनाए जाएँ।
  • जवाबदेही को सुदृढ़ करना: आयोग के निष्पक्ष, पारदर्शी एवं परामर्शात्मक ढंग से कार्य करने के लिए पर्याप्त संस्थागत नियंत्रण एवं निगरानी तंत्र स्थापित किए जाएँ।
Shares: