संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन 2: भारतीय संविधान में संशोधन; शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष।

संदर्भ: संविधान (एक सौ तीसवाँ संशोधन) विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रियों को पद से हटाने के प्रस्तावित ढाँचे पर और अधिक विचार-विमर्श करने के लिए अपनी मसौदा रिपोर्ट को अपनाने का निर्णय स्थगित कर दिया है।

संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 के मुख्य प्रावधान

  • संवैधानिक पदाधिकारियों का दायरा: यह प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्य के मंत्रियों पर लागू होता है।
    • केंद्र शासित प्रदेश सरकार अधिनियम, 1963 और जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 में भी पूरक संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है।
  • पद समाप्ति का प्रावधान: प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले अपराधों के लिए 30 दिनों की निरंतर न्यायिक हिरासत पूरी होने पर पद पर नहीं रह सकेंगे।
  • हटाने की प्रक्रिया का निर्धारण: मंत्रियों को प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा हटाया जाएगा, जबकि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री निर्धारित हिरासत अवधि के बाद स्वतः ही पद छोड़ देंगे।
  • जमानत मांगने का अवसर: प्रस्तावित ढांचा पद समाप्ति के प्रावधान प्रभावी होने से पहले जमानत प्राप्त करने के लिए 30 दिनों की विंडो (अवधि) प्रदान करता है।
  • पुनर्नियुक्ति की अनुमति: न्यायिक हिरासत से रिहाई के बाद, लागू संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अधीन, पद छोड़ने वाले व्यक्ति की पुनर्नियुक्ति की जा सकती है।
  • संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन: प्रस्तावित संवैधानिक ढांचा स्थापित करने के लिए अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन करना।

प्रस्तावित विधेयक का महत्त्व

  • राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश: गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को लंबी न्यायिक हिरासत के दौरान कार्यपालिका के पद पर बने रहने से रोकता है।
  • संवैधानिक नैतिकता को सुदृढ़ करना: संवैधानिक पदाधिकारियों से अपेक्षित जवाबदेही, सत्यनिष्ठा तथा उच्च नैतिक मानकों को सुदृढ़ करता है।

प्रस्तावित विधेयक का महत्त्व

  • विधि के शासन को सुदृढ़ करना: यह सुनिश्चित करता है कि उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति भी अन्य नागरिकों की तरह समान कानूनी मानकों के अधीन हों।
  • जनविश्वास में वृद्धि: पारदर्शिता एवं जवाबदेही को बढ़ावा देकर लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों के विश्वास को मजबूत करता है।

चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

  • निर्दोषता की धारणा: दोषसिद्धि से पहले पद से हटाया जाना इस सिद्धांत के विपरीत माना जा सकता है कि न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक अभियुक्त निर्दोष माना जाता है।
  • राजनीतिक दुरुपयोग का जोखिम: इन प्रावधानों का उपयोग निर्वाचित कार्यपालिका के विरुद्ध राजनीतिक उद्देश्य से की गई गिरफ्तारियों के माध्यम से दुरुपयोग किया जा सकता है।
  • लोकतांत्रिक एवं संघीय चिंताएँ: पद का स्वतः समाप्त होना शासन-प्रशासन में बाधा उत्पन्न कर सकता है तथा विशेषकर राज्यों में जनता द्वारा दिए गए जनादेश को प्रभावित कर सकता है।
  • न्यायिक विलंब: लंबी जाँच एवं न्यायिक प्रक्रिया के कारण दोष सिद्ध होने से पहले ही संवैधानिक पदाधिकारियों पर अनुचित प्रभाव पड़ सकता है।

न्यायिक दृष्टिकोण

  • बी.आर. कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य (2001): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जो व्यक्ति विधायक बनने के लिए अयोग्य है, उसे मुख्यमंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता।
  • मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014): न्यायालय ने आपराधिक आरोपों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनाए जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार किया, किन्तु मंत्रियों की नियुक्ति में संवैधानिक नैतिकता के पालन पर बल दिया।
  • जन हित फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने केवल लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया तथा कहा कि ऐसे सुधार करना संसद का विषय है। साथ ही राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों का अधिक पारदर्शी प्रकटीकरण करने का निर्देश दिया।

संयुक्त संसदीय समिति के सुझावों का मसौदा

  • पद से हटाने के स्थान पर निलंबन: 30 दिनों तक लगातार न्यायिक हिरासत में रहने की स्थिति में स्वतः पद से हटाने के बजाय अस्थायी निलंबन का प्रावधान किया जाए।
  • त्वरित न्यायिक निर्णय: निलंबित संवैधानिक पदाधिकारियों से संबंधित मामलों का, जहाँ तक संभव हो, नामित फास्ट-ट्रैक न्यायालयों द्वारा एक वर्ष के भीतर निस्तारण किया जाए।
  • निलंबन समाप्त करना:न्यायिक हिरासत से रिहा होने पर निलंबन स्वतः समाप्त हो जाए तथा संबंधित व्यक्ति  
  • गंभीर आपराधिक अपराधकी स्पष्ट परिभाषा: प्रस्तावित कानून के समान एवं स्पष्ट अनुप्रयोग के लिए ‘गंभीर आपराधिक अपराध’ को ऐसे अपराधों के रूप में परिभाषित किया जाए, जिनमें पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान हो।
Shares: