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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल ढाँचा।
संदर्भ: दिल्ली उच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय ने मौलिक अधिकारों के ‘क्षैतिज अनुप्रयोग’ (horizontal application) के सिद्धांत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई निजी मीडिया संस्थान सार्वजनिक महत्व के कार्यों का निर्वहन करता है, तो निजता के अधिकार के उल्लंघन के मामले में उसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकारिता के दायरे में लाया जा सकता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य बिंदु
- न्यायालय ने अवलोकन किया कि यदि कोई निजी मीडिया संस्थान ऐसे कार्यों का संपादन करता है जो सार्वजनिक अधिकारों और हितों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं, तो वह अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकारिता के लिए पात्र हो सकता है।
- न्यायालय ने बल देकर कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है और इसे व्यक्ति के निजता के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए, जिसे अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि रिट उपचार केवल राज्य के विरुद्ध उपलब्ध हैं। न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि अनुच्छेद 226 का दायरा अनुच्छेद 32 की तुलना में व्यापक है और यह सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करने वाले निजी निकायों तक विस्तृत हो सकता है।
- अपने निष्कर्ष पर पहुँचते समय, न्यायालय ने ‘कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023)’ में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों का उल्लेख किया, जिसमें मौलिक अधिकारों के क्षैतिज अनुप्रयोग पर चर्चा की गई थी।
मौलिक अधिकारों के ‘क्षैतिज अनुप्रयोग’ को समझना
क्षैतिज अनुप्रयोग का अर्थ
- पारंपरिक रूप से, मौलिक अधिकार ‘लंबवत’ कार्य करते हैं, अर्थात राज्य के विरुद्ध। ‘क्षैतिज अनुप्रयोग’ का तात्पर्य कुछ परिस्थितियों में निजी व्यक्तियों या संस्थाओं के विरुद्ध इनके प्रवर्तन से है।
- यह प्रत्यक्ष (निजी कर्ताओं के विरुद्ध सीधे प्रवर्तनीय अधिकार) या अप्रत्यक्ष (निजी संबंधों में अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनों और संवैधानिक मूल्यों की न्यायिक व्याख्या) हो सकता है।
संवैधानिक आधार
- यद्यपि मौलिक अधिकार सामान्यतः अनुच्छेद 12 और 13 के तहत राज्य के विरुद्ध प्रवर्तनीय हैं, किंतु संविधान स्वयं सीमित क्षैतिज अनुप्रयोग की परिकल्पना करता है।
- इसके उदाहरणों में अनुच्छेद 15(2) (सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच में गैर-भेदभाव), अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन), अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और बलात् श्रम का निषेध), और अनुच्छेद 24 (बाल श्रम का निषेध) शामिल हैं।
न्यायिक विकास
- विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997): सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के विरुद्ध दिशानिर्देश तैयार किए, जो निजी प्रतिष्ठानों पर भी लागू होते हैं। इस प्रकार, न्यायालय ने संवैधानिक सुरक्षा को प्रत्यक्ष राज्य कार्रवाई से परे विस्तारित किया।
- न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017): न्यायालय ने निजता को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी और यह प्रेक्षित किया कि निजता के लिए खतरा न केवल राज्य से, बल्कि निजी कर्ताओं से भी उत्पन्न हो सकता है।
- कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023): संविधान पीठ ने यह मान्यता दी कि कुछ मौलिक अधिकार, उचित परिस्थितियों में, गैर-राज्य कर्ताओं के विरुद्ध क्षैतिज रूप से कार्य कर सकते हैं।
इस सिद्धांत का महत्व
- डिजिटल युग में अधिकारों का संरक्षण: यह डिजिटल प्लेटफॉर्म, मीडिया संगठनों और निगमों जैसे शक्तिशाली निजी कर्ताओं द्वारा अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- निजता और मानवीय गरिमा को सुदृढ़ करना: यह सिद्धांत गैर-राज्य कर्ताओं द्वारा उत्पन्न निजता के उल्लंघन, भेदभाव, शोषण और अन्य हानियों के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- सार्वजनिक कार्य करने वाले निकायों की जवाबदेही: यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने वाले कार्य करने वाले निजी निकाय संवैधानिक मानदंडों और मूल्यों के प्रति जवाबदेह बने रहें।
- मौलिक अधिकारों को अधिक प्रभावी बनाना: क्षैतिज अनुप्रयोग संवैधानिक सुरक्षा को समकालीन सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाने में मदद करता है, जहाँ निजी शक्ति कभी-कभी राज्य की शक्ति के बराबर या उससे अधिक हो सकती है।
चिंताएँ और चुनौतियाँ
- ‘सार्वजनिक कार्य‘ के दायरे को परिभाषित करना: यह निर्धारित करना कि कोई निजी इकाई कब पर्याप्त रूप से सार्वजनिक भूमिका निभाती है, एक जटिल विधिक प्रश्न बना हुआ है और इससे असंगत न्यायिक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
- प्रतिस्पर्धी मौलिक अधिकारों में संतुलन: न्यायालयों को निजता, वाक् स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता जैसे अधिकारों के बीच सावधानीपूर्वक सामंजस्य स्थापित करना होता है, विशेषकर मीडिया से संबंधित विवादों में।
- संवैधानिक अस्पष्टता: अनुच्छेद 19 और 21 जैसे प्रावधानों की परिकल्पना मूलतः राज्य की कार्रवाई के विरुद्ध सुरक्षा के रूप में की गई थी, जिससे इनके क्षैतिज अनुप्रयोग का विस्तार संवैधानिक बहस का एक निरंतर विषय बना हुआ है।
- न्यायिक अतिरेक का जोखिम: क्षैतिज अधिकारों का अत्यधिक विस्तार सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच के अंतर को धुंधला कर सकता है और निजी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को बढ़ा सकता है।
आगे की राह
- स्पष्ट न्यायिक मानक विकसित करना: न्यायालयों को उन निजी संस्थाओं की पहचान करने के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंड विकसित करने चाहिए जो सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन कर रही हैं, और यह निर्धारित करना चाहिए कि उन पर संवैधानिक दायित्व किस सीमा तक लागू होते हैं।
- प्रतिस्पर्धी मौलिक अधिकारों में संतुलन: निजता, गरिमा, वाक् स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए एक संदर्भ-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, ताकि किसी एक अधिकार को दूसरे पर असंगत रूप से प्राथमिकता न दी जाए।
- वैधानिक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना: डेटा संरक्षण, निजता, श्रम और भेदभाव-विरोधी कानूनों को मजबूत करने से संवैधानिक उपचारों को पूरक बल मिलेगा और न्यायिक हस्तक्षेप पर निर्भरता कम होगी।
- कैलिब्रेटेड (तुल्यमान) दृष्टिकोण अपनाना: क्षैतिज अनुप्रयोग का विकास धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होना चाहिए, ताकि संवैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित हो सके और साथ ही निजी कर्ताओं की वैध स्वायत्तता भी संरक्षित रहे।
