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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में कोयला गैसीकरण को गति देने के लिए ₹37,500 करोड़ के वित्तीय परिव्यय के साथ सतही कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं के संवर्धन हेतु योजना को मंजूरी दी।
अन्य संबंधित जानकारी
• यह योजना भारत के कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण कार्यक्रम में तेजी लाने और 2030 तक 100 मिलियन टन (MT) कोयले के गैसीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

• इसका उद्देश्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और महत्वपूर्ण उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करना है, जैसे: एलएनजी (LNG) (50% से अधिक आयातित), यूरिया (लगभग 20% आयातित), अमोनिया (लगभग 100% आयातित), और मेथनॉल (लगभग 80-90% आयातित)।
• यह पहल सिनगैस और उससे जुड़े उत्पादों जैसे कि उर्वरक, रसायन और सिंथेटिक ईंधन के उत्पादन को प्रोत्साहित करके कोयले के स्वच्छ और अधिक कुशल उपयोग को बढ़ावा देती है।
• एक महत्वपूर्ण सहवर्ती सुधार के रूप में, सरकार ने कोयला गैसीकरण परियोजनाओं के लिए गैर-विनियमित क्षेत्र (NRS) लिंकेज नीलामी ढांचे के तहत कोयला लिंकेज की अवधि को बढ़ाकर 30 वर्ष तक कर दिया है। इससे दीर्घकालिक नीतिगत निश्चितता सुनिश्चित होगी और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
योजना की आवश्यकता
• भारत के पास विश्व के सबसे बड़े कोयला भंडारों (लगभग 401 बिलियन टन) और लिग्नाइट भंडारों (लगभग 47 बिलियन टन) में से एक है, जबकि देश के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी अभी भी 55% से अधिक है। यह घरेलू कोयला संसाधनों के अधिक कुशल और मूल्यवर्धित उपयोग को आवश्यक बनाता है।
• कोयला गैसीकरण के माध्यम से कोयला/लिग्नाइट को सिनगैस में परिवर्तित किया जा सकता है। इसका उपयोग ईंधन, उर्वरक, रसायन, मेथनॉल, अमोनिया और अन्य औद्योगिक उत्पादों के घरेलू उत्पादन के लिए किया जा सकता है, जिससे उच्च-मूल्य वाले आयात पर निर्भरता कम होगी।
• वित्तीय वर्ष 2025 में एलएनजी (LNG), यूरिया, अमोनिया, अमोनियम नाइट्रेट, मेथनॉल, डीएमई (DME) और कोकिंग कोल जैसे उत्पादों का भारत का आयात बिल लगभग ₹2.77 लाख करोड़ था। यह वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक व्यवधानों से उत्पन्न होने वाली संवेदनशीलताओं को रेखांकित करता है।
• यह नई योजना राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन (2021) और जनवरी 2024 में अनुमोदित पूर्ववर्ती ₹8,500 करोड़ की कोयला गैसीकरण योजना पर आधारित है, जिसके तहत ₹6,233 करोड़ की लागत वाली आठ परियोजनाएं पहले से ही कार्यान्वित की जा रही हैं।
योजना की मुख्य विशेषताएँ
वित्तीय और संस्थागत ढाँचा
• इस योजना का कुल वित्तीय परिव्यय ₹37,500 करोड़ है, जिसका उद्देश्य सिनगैस और उससे जुड़े उत्पादों के उत्पादन के लिए नई सतह कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना है। इसके तहत लगभग 75 मिलियन टन कोयला/लिग्नाइट के गैसीकरण का लक्ष्य रखा गया है।
• पात्र परियोजनाओं के लिए संयंत्र और मशीनरी की लागत के अधिकतम 20% तक वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
• योजना में वित्तीय सहायता की अधिकतम सीमाएं निर्धारित की गई हैं:
- एकल परियोजना के लिए अधिकतम ₹5,000 करोड़।
- एकल उत्पाद श्रेणी के लिए अधिकतम ₹9,000 करोड़ (संश्लेषित प्राकृतिक गैस और यूरिया को छोड़कर)।
- सभी परियोजनाओं में एकल इकाई समूह के लिए अधिकतम ₹12,000 करोड़।
• परियोजनाओं का चयन पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा, जो परियोजना की लागत, कोयला इनपुट दक्षता और सिनगैस आउटपुट जैसे मानदंडों पर आधारित होगी।
• इस योजना के तहत मिलने वाले प्रोत्साहन, वाणिज्यिक कोयला खनन व्यवस्था तथा अन्य केंद्र या राज्य सरकार की योजनाओं के तहत उपलब्ध लाभों के अतिरिक्त होंगे।
प्रौद्योगिकी और औद्योगिक विकास
• यह योजना प्रौद्योगिकी-तटस्थ दृष्टिकोण के अनुरूप है, साथ ही स्वदेशी कोयला गैसीकरण प्रौद्योगिकियों को अपनाने और उनके विकास को प्रोत्साहित करती है।
• इसका उद्देश्य भारत के घरेलू कोयला गैसीकरण इकोसिस्टम को मजबूत करना और विदेशी इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) ठेकेदारों पर निर्भरता को कम करना है।
योजना का महत्व
• ऊर्जा सुरक्षा में वृद्धि और आयात प्रतिस्थापन: यह योजना घरेलू कोयला संसाधनों के विविधीकृत उपयोग को बढ़ावा देती है और उच्च-मूल्य वाले आयात पर निर्भरता कम करती है। इससे भारत वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक आपूर्ति-श्रृंखला व्यवधानों से सुरक्षित होगा।
• आत्मनिर्भर भारत और औद्योगिक विकास को समर्थन: सिनगैस और उससे जुड़े उत्पादों के बढ़ते घरेलू उत्पादन से रणनीतिक उद्योगों को मजबूती मिलेगी और ‘आत्मनिर्भर भारत’ तथा ‘मेक इन इंडिया’ के उद्देश्यों को गति प्राप्त होगी।
• निवेश और रोजगार सृजन: इस योजना से ₹2.5–3 लाख करोड़ का निवेश जुटने और कोयला उत्पादक क्षेत्रों में लगभग 25 परियोजनाओं के माध्यम से लगभग 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन होने की उम्मीद है।
• राजस्व सृजन और क्षेत्रीय विकास: लगभग 75 मिलियन टन कोयला/लिग्नाइट के गैसीकरण से सालाना करीब ₹6,300 करोड़ का राजस्व प्राप्त होने की संभावना है। इसके साथ ही, जीएसटी (GST) और संबंधित आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होगा।
• स्वदेशी प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम का विकास: स्वदेशी कोयला गैसीकरण प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करके और विदेशी इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) ठेकेदारों पर निर्भरता कम करके, इस योजना का लक्ष्य ऊर्जा क्षेत्र में भारत की घरेलू तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं को मजबूत करना है।
