संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: पर्यावरण प्रभाव आकलन।
संदर्भ: हाल ही में, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य मूल्यांकन निकायों के निष्क्रिय होने पर पर्यावरणीय मंजूरी में होने वाले विलंब को रोकने के लिए EIA अधिसूचना, 2006 में संशोधन प्रस्तावित किया है।
अन्य संबंधित जानकारी:
- इस प्रस्ताव का उद्देश्य पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के प्रावधानों में संशोधन करना है। ध्यातव्य है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय अनुमोदन को विनियमित करती है।
- संशोधन के तहत प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के लिए दो नए निकायों पर्यावरण प्रभाव आकलन पर स्थायी प्राधिकरण (SAEIA) और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन पर स्थायी समिति (SCEIA) के गठन का प्रस्ताव है। इन निकायों का उद्देश्य पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में निरंतरता सुनिश्चित करना है।
- मंत्रालय का कहना है कि राज्य मूल्यांकन निकायों के कामकाज में अंतराल के कारण बार-बार पर्यावरणीय मंजूरी रोक दी जाती है और परियोजना प्रस्तावों का एक बड़ा बैकलॉग (लंबित मामले) बन जाता है।
संशोधित मसौदे के प्रमुख प्रावधान
- नए निकायों के कार्य: ये दो नए निकाय राज्य स्तर पर ‘श्रेणी B’ के रूप में वर्गीकृत विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन करेंगे और समयबद्ध तरीके से पर्यावरणीय मंजूरी प्रदान करेंगे।
- श्रेणी B परियोजनाओं में निर्माण, भवन निर्माण, खनन और उद्योग शामिल हैं।
- निष्क्रिय राज्य निकायों का प्रतिस्थापन: जब राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) और राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) पुनर्गठन में देरी के कारण निष्क्रिय हो जाते हैं, तब ये नए निकाय उनका कार्यभार संभालेंगे।
- मंजूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक निरंतरता: इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पर्यावरणीय मंजूरी के निर्णय तब भी दिए जाएं जब राज्य-स्तरीय विशेषज्ञ निकाय समाप्त हो जाएं या नियमित रूप से बैठक करने में विफल रहें।
- विलंबित प्रस्तावों का स्वतः स्थानांतरण: संशोधन एक ऐसी प्रणाली पेश करता है जिसमें यदि राज्य विशेषज्ञ समिति 120 दिनों के भीतर मूल्यांकन पूरा करने में विफल रहती है तो परियोजना प्रस्तावों को नए ‘स्थायी निकायों’ को स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
- स्थायी प्राधिकरण द्वारा निर्णय: यदि राज्य पर्यावरण प्राधिकरण निर्धारित समय के भीतर निर्णय नहीं देता है, तो प्रस्ताव को स्थायी प्राधिकरण को स्थानांतरित कर दिया जाएगा, जो तीस दिनों के भीतर मामले पर निर्णय लेगा।
मौजूदा EIA संस्थागत फ्रेमवर्क

- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना 2006 ने भारत में पर्यावरणीय निर्णयन हेतु एक वैज्ञानिक मूल्यांकन प्रणाली की शुरुआत की।
- इस प्रणाली के अंतर्गत यह अनिवार्य है कि परियोजना प्रस्तावों का मूल्यांकन ऐसी विशेषज्ञ समितियों द्वारा किया जाए, जिनमें पर्यावरण विज्ञान, इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, कानून और लोक प्रशासन के पेशेवर शामिल हों।
- इन विशेषज्ञ समितियों को यह सुनिश्चित करने के लिए अभिकल्पित किया गया है कि पर्यावरणीय निर्णय विशुद्ध प्रशासनिक विचारों के स्थान पर बहुविषयक वैज्ञानिक मूल्यांकन पर आधारित हों।
- EIA के अंतर्गत परियोजनाओं को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
- श्रेणी ‘A’ की परियोजनाएँ: श्रेणी ‘A’ के अंतर्गत आने वाली परियोजनाएँ अनुमोदन हेतु पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के पास जाती हैं।
- श्रेणी ‘B’ की परियोजनाएँ: इस श्रेणी के अंतर्गत आने वाली परियोजनाएँ अनुमोदन हेतु राज्य सरकार के पास जाती हैं, जिन्हें आगे B1 और B2 परियोजनाओं में वर्गीकृत किया गया है।
चिंताएँ और संस्थागत निहितार्थ
- विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यह संशोधन ‘विशेषज्ञ मूल्यांकन संस्थानों’ को सुदृढ़ करने के बजाय परियोजना अनुमोदनों की प्रक्रियात्मक निरंतरता पर अधिक बल देता है।
- मसौदा केंद्र सरकार को नए स्थायी प्राधिकरणों में पदेन सदस्यों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। इससे पर्यावरणीय निर्णय लेने की प्रक्रिया में वैज्ञानिक विशेषज्ञता का महत्व कम होने की संभावना है।
- आलोचकों का तर्क है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन निकायों की उपेक्षा करने से विकास परियोजनाओं की पर्यावरणीय जांच कमजोर हो सकती है।
- यह प्रस्ताव पर्यावरण शासन में एक व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहाँ विनियामक ढांचे में प्रशासनिक दक्षता और त्वरित अनुमोदनों को निरंतर प्राथमिकता दी जा रही है।
