संबंधित जानकारी
सामान्य अध्ययन-2: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली।
संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) को यौन अपराधों और संवेदनशील पीड़ितों से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों में संवेदनशीलता और करुणा का भाव जागृत करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है।
अन्य संबंधित जानकारी
• यह निर्देश इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2025 के एक विवादास्पद आदेश को रद्द करते हुए दिया गया है, जिसमें एक नाबालिग से बलात्कार के प्रयास के मामले में आरोपों में कमी कर दी गई थी।
• न्यायालय ने इस विषय को न्यायिक असंवेदनशीलता और पीड़ित-केंद्रित न्याय वितरण की आवश्यकता के लिए संस्थागत चिंता के उजागर किया।

• यह मामला 2022 में दर्ज की गई एक शिकायत से शुरू हुआ जिसमें 11 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न होने का आरोप लगाया गया था।
• निचली अदालत ने POCSO अधिनियम की धारा 18 के साथ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत आरोपी को समन जारी किया।
• इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन आरोपों को IPC की धारा 354B और POCSO के तहत गंभीर यौन हमला न मानकर यह तर्क देते हुए कि कृत्य केवल ‘तैयारी’ थे, ‘बलात्कार का प्रयास’ नहीं, आरोपों में कमी कर दी।
• इस निर्णय से देशव्यापी आक्रोश उत्पन्न किया, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य अंश
• उच्च न्यायालय का आदेश रद्द: सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को “स्पष्टतः त्रुटिपूर्ण” करार दिया और बलात्कार के प्रयास के प्रावधानों के तहत निचली अदालत के आरोपों को बहाल कर दिया।
- न्यायालय ने शारीरिक हमले, कपड़ों को फाड़ने, पूर्व-निर्धारित मंशा और केवल तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के कारण बाधा उत्पन्न होने पर गौर किया। न्यायालय ने दोहराया कि ‘प्रयास’ तब शुरू होता है जब तैयारी के बाद ‘दुराशय’ को क्रियान्वित किया जाता है।
• न्यायिक संवेदनशीलता पर चिंता: न्यायालय ने यौन अपराध के मामलों में न्यायिक तर्क में व्याप्त प्रणालीगत असंवेदनशीलता को रेखांकित किया, जिसमें पितृसत्तात्मक रूढ़ियाँ, सहानुभूति का अभाव और उत्तरजीवियों की वास्तविकताओं को पहचानने में विफलता शामिल है।
- इसने जोर दिया कि न्याय में कानूनी शुद्धता के साथ करुणा और मानवता का समावेश होना चाहिए।
• राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के माध्यम से दिशा-निर्देश: न्यायालय ने स्वयं दिशा-निर्देश बनाने के बजाय राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अनिरुद्ध बोस के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया।
- संरचना: अध्यक्ष (न्यायमूर्ति बोस) और चार विशेषज्ञ (प्रैक्टिसकर्ता, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता)।
- समयसीमा: रिपोर्ट तीन महीने के भीतर प्रस्तुत की जानी है।
• समिति का अधिदेश: समिति यौन अपराधों और संवेदनशील पीड़ितों के मामलों पर सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों और न्यायिक प्रणालियों के लिए दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार करेगी।
- इसे सिफारिशें करने से पहले पिछले संवेदीकरण प्रयासों की समीक्षा करनी होगी और उनके वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन करना होगा।
• भारतीय सामाजिक लोकाचार पर बल: न्यायालय ने विदेशी तत्वों को लेने के प्रति आगाह किया और कहा कि दिशा-निर्देशों में भारत की सामाजिक वास्तविकताओं की झलक होनी चाहिए।
- उन्हें विदेशी शब्दावली से बचना चाहिए और स्थानीय अनुभवों पर आधारित होना चाहिए।
• सरल भाषा और सुलभता: न्यायालय ने निर्देश दिया कि दिशा-निर्देश सरल, गैर-तकनीकी भाषा में लिखे जाएं और क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवादित किए जाएं।
- यह सार्वजनिक समझ और सुलभता सुनिश्चित करने के लिए है।
• अपमानजनक सामाजिक भाषा का मुद्दा: न्यायालय ने पाया कि स्थानीय बोलियों में अपमानजनक अभिव्यक्तियाँ कानूनी निहितार्थों के बावजूद अक्सर सामाजिक रूप से सामान्य मान ली जाती हैं।
- इसने समिति से ऐसी अभिव्यक्तियों की पहचान करने, जागरूकता बढ़ाने और पीड़ितों को अपने दुःख को बेहतर ढंग से व्यक्त करने में मदद करने के लिए कहा।
• निचली अदालत की कार्यवाही की बहाली: सर्वोच्च न्यायालय ने मूल आरोपों को बहाल कर दिया और स्पष्ट किया कि मुकदमा बिना किसी पूर्वाग्रह के आगे बढ़ना चाहिए।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियाँ कानूनी वर्गीकरण तक सीमित हैं, न कि दोष निर्धारण तक।
निर्णय का महत्व
• कानूनी महत्व: यह बलात्कार के मामलों में ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ के बीच की सीमा को स्पष्ट करता है और POCSO के प्रावधानों की व्याख्या को बल प्रदान करता है।
• संस्थागत महत्व: यह असंवेदनशील न्यायिक तर्क के प्रति शून्य सहिष्णुता का संकेत देता है और राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के माध्यम से संरचनात्मक न्यायिक सुधार को बढ़ावा देता है।
• सामाजिक महत्व: यह पीड़ितों की वास्तविकताओं को स्वीकारता है और भाषा, सहानुभूति एवं न्याय वितरण को जोड़कर पीड़ित-केंद्रित न्याय को बढ़ावा देता है।
