संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन -3: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के क्षेत्र में जागरूकता।
संदर्भ: हाल ही में, भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के माध्यम से, ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000’ के तहत 2021 के आईटी नियमों में संशोधन करते हुए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 अधिसूचित किए।
अन्य संबंधित जानकारी
- 20 फरवरी 2026 से प्रभावी होने वाले ये संशोधन, भारत में पहली बार एआई-जनित और डीपफेक कंटेंट को औपचारिक रूप से एक संरचित नियामक निगरानी के दायरे में लाते हैं।
- यह कदम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में तीव्र प्रगति की प्रतिक्रिया में उठाया गया है, जिसने अति-यथार्थवादी डीपफेक, वॉइस क्लोनिंग धोखाधड़ी, कृत्रिम अंतरंग इमेज, फर्जी राजनीतिक भाषण और जाली इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बनाने की सुलभता प्रदान की है।
- ऐसी सामग्री के दुरुपयोग से पहचान की धोखाधड़ी, प्रतिरूपण, गैर-सहमति वाली अंतरंग सामग्री (NCII), चुनावी भ्रामक सूचना, प्रतिष्ठा को नुकसान, ब्लैकमेल और कृत्रिम बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार बढ़ा है।
- यह संशोधन एक स्पष्ट रूप से परिभाषित सिंथेटिक जनरेटेड इंफॉर्मेशन (SGI) ढांचा पेश करके ‘प्रतिक्रियात्मक मॉडरेशन’ से ‘सक्रिय रोकथाम’ की ओर एक निर्णायक बदलाव का प्रतीक है।
- इसका लक्ष्य पूर्व के 36 घंटे की अनुपालन विंडो को कम करके कंटेंट हटाने के समय को न्यूनतम 2-3 घंटे करने के साथ ही शिक्षा, सुलभता और नवाचार के लिए वैध एआई उपयोग को संरक्षित करना है।
प्रमुख संशोधन
- “सिंथेटिक जनरेटेड इंफॉर्मेशन” (SGI) की कानूनी परिभाषा: पहली बार, नियम औपचारिक रूप से SGI को ऐसी ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल सामग्री के रूप में परिभाषित करते हैं जो कृत्रिम या एल्गोरिथम तरीके से बनाई या बदली गई है परन्तु वास्तविक प्रतीत होती है और व्यक्तियों या घटनाओं को प्रामाणिक रूप में चित्रित करती है।
- इसमें डीपफेक वीडियो, वॉइस क्लोनिंग, एआई-जनित प्रतिरूपण और फर्जी प्रमाणपत्र या डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं।
- हालांकि, रंग को बदलना, शोर में कमी, उपशीर्षक, संकुचित करना, शैक्षिक एवं अनुसंधान कंटेंट और सुलभता सुधार जैसी सामग्री को SGI नहीं माना जाएगा बशर्ते कि वे भ्रामक न हों।
- अनिवार्य लेबलिंग और मेटाडेटा आवश्यकताएं: सभी एआई-जनित सामग्री को स्पष्ट रूप से “सिंथेटिक जनरेटेड” के रूप में लेबल किया जाना चाहिए।
- दृश्य सामग्री पर स्पष्ट प्रकटीकरण होना चाहिए, कृत्रिम आवाज में ऑडियो प्रकटीकरण शामिल होना चाहिए, और स्थायी मेटाडेटा या अद्वितीय पहचानकर्ता शामिल किए जाने चाहिए।
- प्लेटफार्मों को ऐसे लेबल हटाने या दबाने को रोकना होगा।
- गैर-कानूनी सिंथेटिक कंटेंट का निषेध: गैर-कानूनी कृत्यों से जुड़ी SGI के विरुद्ध ‘भारतीय न्याय संहिता, 2023’ और ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012’ सहित मौजूदा आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
- प्रतिबंधित श्रेणियों में बाल यौन शोषण सामग्री, गैर-सहमति वाली अंतरंग इमेज, अश्लीलता, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, प्रतिरूपण और धोखाधड़ी, तथा विस्फोटक या हथियारों से संबंधित सामग्री शामिल है।
- कंटेंट हटाने की समय सीमा में भारी कटौती: न्यायालय या सरकारी आदेशों के अनुपालन की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर 3 घंटे कर दी गई है।
- नग्नता और गैर-सहमति वाली अंतरंग छवियों के लिए, समय सीमा 24 घंटे से घटाकर 2 घंटे कर दी गई है।
- प्रतिरूपण के अत्यावश्यक मामलों के लिए समय सीमा 72 घंटे से घटाकर 36 घंटे कर दी गई है।
- सामान्य शिकायतों के लिए प्रतिक्रिया अवधि 15 दिन से घटाकर 7 दिन कर दी गई है।
- महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (SSMIs) का बढ़ता दायित्व: मेटा, गूगल और X जैसे बड़े प्लेटफार्मों को एआई-जनित कंटेंट के संबंध में उपयोगकर्ता घोषणाएं प्राप्त करनी होंगी, सत्यापन के लिए स्वचालित उपकरण तैनात करने होंगे, प्रकाशन से पहले लेबल लगाने होंगे, साक्ष्य सुरक्षित रखने होंगे और कानूनी रूप से आवश्यक होने पर अधिकारियों के साथ उपयोगकर्ता जानकारी साझा करनी होगी।
- उचित तत्परता का पालन न करने पर आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत प्राप्त ‘सेफ हार्बर‘ (Safe Harbour) संरक्षण खोना पड़ सकता है।
- हालांकि, कृत्रिम सामग्री को हटाने के लिए ‘सद्भाव’ से कार्य करने वाले प्लेटफार्मों का ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण बरकरार रहेगा।
- त्रैमासिक उपयोगकर्ता चेतावनी: प्लेटफार्मों को हर तीन महीने में उपयोगकर्ताओं को निषिद्ध सिंथेटिक सामग्री के बारे में सूचित करना आवश्यक है।
- उन्हें उपयोगकर्ताओं को खाता निलंबन और संभावित कानूनी दंड के बारे में चेतावनी देनी होगी।
- एआई (AI) टूल के साइन-अप (पंजीकरण) के दौरान भी चेतावनियाँ प्रदर्शित की जानी चाहिए।
- यह पूर्व की ‘वार्षिक सूचना’ (Annual notice) की आवश्यकता को प्रतिस्थापित करता है।
- नियम 3(3) के तहत निवारक दायित्व: एआई उपकरण प्रदान करने वाले प्लेटफार्मों को डीपफेक प्रतिरूपण, बाल यौन शोषण सामग्री और फर्जी सरकारी दस्तावेजों को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय करने होंगे।
- यह ‘प्रतिक्रियात्मक निष्कासन’ से ‘सक्रिय रोकथाम’ की ओर स्थानांतरण का प्रतीक है।
चिंताएं और चुनौतियां
- वाक् स्वतंत्रता और अत्यधिक सेंसरशिप: 3 घंटे की ‘टेकडाउन’ विंडो से “पहले हटाओ, बाद में जांचो” की स्थिति बन सकती है, जो वैध अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकती है और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत चिंताएं उत्पन्न कर सकती है।
- तकनीकी व्यवहार्यता: मेटाडेटा स्क्रीनशॉट या पुन: अपलोड करने पर नष्ट हो सकता है, और स्वचालित प्रणालियां अक्सर व्यंग्य और दुर्भावनापूर्ण धोखाधडी बीच विश्वसनीय रूप से अंतर नहीं कर पाती हैं।
- छोटे प्लेटफार्मों पर अनुपालन बोझ: स्टार्टअप और क्षेत्रीय प्लेटफार्मों को परिचालन और वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ सकता है।
- मध्यवर्तियों की भूमिका में बदलाव: प्रकाशन से पहले सत्यापन की आवश्यकता प्लेटफार्मों को तटस्थ मध्यस्थों से सक्रिय ‘गेटकीपर’ में बदल देती है जिससे आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत पारंपरिक ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour) संतुलन बदल जाता है।
- प्रवर्तन जटिलता: चूंकि नियम “तत्समय लागू किसी भी कानून” पर लागू होते हैं, इसलिए व्यापक कानूनी दायरे में स्वचालित अनुपालन सुनिश्चित करना एक गंभीर चुनौती है।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के बारे में
- यह साइबर अपराध, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, डिजिटल हस्ताक्षर, ई-कॉमर्स और इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस को नियंत्रित करने वाला भारत का प्राथमिक कानून है।
- यह इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों को कानूनी मान्यता प्रदान करता है और साइबर अपराधों के लिए दंड निर्धारित करता है।
- यह अधिनियम UNCITRAL (संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग) द्वारा अपनाए गए ‘इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स पर मॉडल लॉ’ पर आधारित है।
- यह भारत के भीतर या बाहर किए गए अपराधों पर लागू होता है यदि भारत में स्थित कंप्यूटर सिस्टम या नेटवर्क इसमें शामिल है।
- उद्देश्य:
- सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना।
- सरकारी सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी की सुविधा प्रदान करना।
- डेटा चोरी, हैकिंग और पहचान की चोरी जैसे साइबर अपराधों के लिए दंड देना।
- भारतीय आईटी क्षेत्र में नवाचार और विकास को प्रोत्साहित करना।
