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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

संदर्भ: केंद्रीय बजट 2026-27 में, केंद्रीय वित्त मंत्री ने कार्बन कैप्चर, स्टोरेज और यूटिलाइजेशन (CCUS) के लिए एक समर्पित योजना के माध्यम से अगले पांच वर्षों में ₹20,000 करोड़ के परिव्यय की घोषणा की है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • इस योजना का उद्देश्य CCUS प्रौद्योगिकियों का पायलट परियोजनाओं से व्यावसायिक स्तर पर परिनियोजन करना है।
  • यह पांच उत्सर्जन-गहन “प्रदूषण कम करने में कठिन” (hard-to-abate) क्षेत्रों जैसे-बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायनों में डीकार्बोनाइजेशन के प्रयासों में सहायता करेगी।
  • इससे पहले, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की एक विशेषज्ञ समिति ने दिसंबर 2025 में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें 2070 तक ‘नेट-जीरो’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता हेतु भारत में CCUS के लिए रणनीतिक, तकनीकी और नियामक रोडमैप को रेखांकित किया गया था।

कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) के बारे में

  • CCUS में आमतौर पर बिजली उत्पादन या औद्योगिक केंद्रों जैसे बड़े ‘पॉइंट स्रोतों’ से CO2 को कैप्चर (अवशोषण) करना शामिल है क्योंकि ये ईंधन के रूप में जीवाश्म ईंधन या बायोमास का उपयोग करते हैं।
  • यदि इसका उपयोग उसी स्थान पर नहीं किया जा रहा है, तो कैप्चर की गई CO2 को संपीडित किया जाता है और पाइपलाइन, जहाज, रेल या ट्रक द्वारा विभिन्न अनुप्रयोगों में उपयोग करने के लिए ले जाया जाता है, या इसे गहरी भूगर्भीय संरचनाओं जैसे कि समाप्त हो चुके तेल और गैस भंडारों या खारे जलभृतों में प्रविष्ट करा दिया जाता है।
  • इसका उद्देश्य वैश्विक तापन को कम करने के उद्देश्य से कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में प्रवेश करने से रोकना है।

जलवायु रणनीति में CCUS की भूमिका

  • CCUS को नवीकरणीय ऊर्जा के विकल्प के बजाय डीकार्बोनाइजेशन के लिए एक पूरक उपकरण के रूप में देखा जाता है।
  • CCUS ‘हार्ड-टू-अबेट’ क्षेत्रों से होने वाले अवशिष्ट उत्सर्जन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और कम कार्बन वाले हाइड्रोजन (ब्लू हाइड्रोजन) तथा अन्य संश्लेषित ईंधनों के उत्पादन में सहायता करता है।
  • COP26 और COP28 जैसे हालिया वैश्विक जलवायु सम्मेलनों ने CCUS की संभावित भूमिका को महत्व दिया गया है, साथ ही जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता के प्रति चेतावनी भी दी है, और इस बात पर जोर दिया है कि CCUS को स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में विलंब नहीं करनी चाहिए।

भारत के लिए CCUS का महत्व

  • नेट-जीरो और औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन को सक्षम बनाना: यह इस्पात, सीमेंट, बिजली, रिफाइनरी और रसायनों जैसे क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशनके लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उत्सर्जन, प्रक्रिया से जुड़ा होता है। यह 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने की भारत की प्रतिबद्धता का प्रत्यक्ष तौर पर समर्थन करता है।
    • जब इसे बायोमास (BECCS) या डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) के साथ जोड़ा जाता है, तो यह सक्रिय रूप से वायुमंडल से CO2को हटा सकता है, जिससे नकारात्मक उत्सर्जन की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता और स्वदेशी क्षमता: घरेलू अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करके, CCUS आयातित प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता कम करता है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्यों के अनुरूप भारत के क्लीन-टेक इकोसिस्टम को मजबूती प्रदान करता है।
  • चक्रीय कार्बन अर्थव्यवस्था: CCUS कैप्चर की गई CO₂ को सिंथेटिक ईंधन, उर्वरक, निर्माण सामग्री और औद्योगिक गैसों में पुन: उपयोग करने में सक्षम बनाता है, जिससे उत्सर्जन को आर्थिक मूल्य में बदला जा सकता है।
  • व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता: यूरोपीय संघ द्वारा अपने घरेलू निर्माताओं की तुलना में अधिक कार्बन का उपयोग करने वाले देशों से आयात पर अप्रत्यक्ष शुल्क (CBAM) लगाने के उपायों की दृष्टि से भी CCUS महत्वपूर्ण है।

भारत में CCUS पायलट परियोजनाएं

  • एनटीपीसी ने विंध्याचल थर्मल पावर स्टेशन पर कार्बन कैप्चर शुरू किया है, जो प्रतिदिन लगभग 20 टन CO₂ कैप्चर करता है। कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग ग्रीन हाइड्रोजन के साथ मेथनॉल उत्पादन के लिए किया जाता है।
  • एनटीपीसी ने 2025 में झारखंड में भारत का पहला भूगर्भीय CO₂ स्टोरेज बोरवेल भी कमीशन किया है।
  • ओएनजीसी ने गुजरात के गांधार तेल क्षेत्र में अपना पहला CCS पायलट शुरू किया है, जहाँ क्षरित कुओं में CO₂ प्रविष्ट कराई जा रही है।
  • टाटा स्टील और JSW स्टील ने क्रमशः जमशेदपुर और डोलवी में CCUS पायलट संयंत्र कमीशन किए हैं।
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