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सामान्य अध्ययन-2: शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएं, सीमाएं और संभावनाएं; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।
सामान्य अध्ययन -3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर उनका प्रभाव।
संदर्भ: हाल ही में, महाराष्ट्र के 1800 लोगों से अधिक की आबादी वाले गाँव सतनावरी को राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा शुरू की गई एक पायलट परियोजना के तहत भारत का पहला “स्मार्ट इंटेलिजेंट विलेज” घोषित किया गया।
अन्य संबंधित जानकारी
- स्मार्ट और इंटेलिजेंट विलेज परियोजना का प्रस्ताव वॉयस ऑफ इंडियन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी एंटरप्राइजेज (VoICE) द्वारा दिया गया था, जो दूरसंचार क्षेत्र की प्रमुख भारतीय कंपनियों का एक संघ है।
- एक “स्मार्ट इंटेलिजेंट विलेज” के निर्माण की औसत लागत लगभग 50 लाख रुपये होगी।
- नागपुर जिले के सतनावरी गाँव को तालाब, कृषि भूमि, स्कूल, आँगनवाड़ी और अन्य सामुदायिक स्थानों जैसे क्षेत्रों में कई स्मार्ट समाधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की इसकी क्षमता के कारण चुना गया था।
स्मार्ट इंटेलिजेंट विलेज के बारे में
- स्मार्ट इंटेलिजेंट विलेज की परिकल्पना ग्रामीण विकास के एक ऐसे मॉडल के रूप में की गई है जो भारत के गांवों में रोजमर्रा के जीवन को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और निर्बाध कनेक्टिविटी का उपयोग करता है।
- एक स्मार्ट इंटेलिजेंट विलेज वह गाँव है जहाँ तकनीक ग्रामीण जीवन को आसान बनाती है, और फार्मिंग, खेती तथा अन्य दैनिक गतिविधियों के लिए डिजिटल और एआई समाधानों का उपयोग किया जाता है।
- ग्राम पंचायतों और ग्रामीणों की भागीदारी के साथ नागपुर जिला परिषद इसके कार्यान्वयन की देखरेख कर रही है।
सतनावरी में स्मार्ट हस्तक्षेप
- कृषि: स्मार्ट कृषि में रियल टाइम निगरानी के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर और एआई उपकरणों का उपयोग किया जाता है, जिससे 25-40% तक पानी की बचत होती है, उर्वरक की लागत 30% तक कम होती है, उपज में 25% तक की वृद्धि होती है, और कीटों का शीघ्र पता लगाना संभव होता है।
- मत्स्य पालन: सेंसर रियल टाइम में तालाब के पानी की गुणवत्ता की निगरानी करते हैं और किसानों को परिवर्तनों के बारे में सचेत करते हैं। इससे मछलियों की मृत्यु दर कम होती है, लागत में कमी आती है और उपज में 20-30% की वृद्धि होती है।
- खेती में ड्रोन का उपयोग: जीपीएस-आधारित ड्रोन मृदा मानचित्रण के आधार पर उर्वरकों का छिड़काव करते हैं, जिससे रसायनों का उपयोग कम होता है, श्रम की बचत होती है और प्रशिक्षित स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार का सृजन होता है।
- सुरक्षा और सुविधा: IoT-सक्षम एलईडी युक्त स्मार्ट स्ट्रीट लाइटें दूर से ही चमक समायोजित करती हैं, जिससे ऊर्जा की खपत में 50-70% की कमी आती है, सुरक्षा बढ़ती है और रखरखाव की लागत में कमी आती है।
- पेयजल: एक एआई-संचालित प्रणाली वास्तविक समय में पेयजल आपूर्ति और गुणवत्ता की निगरानी करती है, जिससे प्रति व्यक्ति प्रति दिन 55 लीटर की अनिवार्य आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- स्वास्थ्य सेवा: गाँव में 120 से अधिक स्वास्थ्य मापदंडों के लिए त्वरित परीक्षण की सुविधा उपलब्ध है। शीघ्र पहचान, किफायती उपचार और शहरी स्तर की देखभाल सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल रिकॉर्ड के साथ टेलीमेडिसिन का उपयोग किया जाता है, जिससे आशा कार्यकर्ताओं को अनुवर्ती कार्रवाई के लिए तुरंत परिणाम प्राप्त होते हैं।
- शिक्षा: गाँवव में ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म और स्मार्ट कक्षाओं के माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा प्रदान की जाती है, जिसमें ग्राम पंचायत के हॉटस्पॉट से मुफ्त 100 एमबीपीएस भारतनेट वाई-फाई की सुविधा उपलब्ध है।
- सुरक्षा: गाँव की सुरक्षा प्रणाली रियल टाइम में सुरक्षा कर्मचारियों पर नज़र रखती है जबकि ग्रामीण, ऐप या फ़ोन के जरिए मदद मांग सकते हैं, और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए पुलिस, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) को तुरंत अलर्ट भेज दिए जाते हैं।
- अपशिष्ट प्रबंधन: स्मार्ट अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में सुरक्षित निपटान, प्रदूषण की रोकथाम और डेटा-आधारित योजना को सक्षम बनाने के लिए IoT-सक्षम कूड़ेदानों और ट्रैकिंग उपकरणों का उपयोग किया जाता है।
- अग्नि नियंत्रण: स्कूलों और सार्वजनिक क्षेत्रों में UL-अनुमोदित मोनोअमोनियम फॉस्फेट से भरे स्वचालित गेंद के आकार के अग्निशामक यंत्र लगाए गए हैं। ये आग लगने के 10-15 सेकंड के भीतर सक्रिय हो जाते हैं और दूरदराज के इलाकों में ड्रोन द्वारा तैनात किए जा सकते हैं।
चुनौतियाँ
- इंटरनेट कनेक्टिविटी: कई गाँवों में स्मार्ट पहलों के लिए आवश्यक विश्वसनीय इंटरनेट की कमी है। इसका मुख्य कारण फाइबर ऑप्टिक केबल और तकनीकी बुनियादी ढाँचे के दीर्घकालिक रखरखाव की चुनौतियाँ हैं, जिसके परिणामस्वरूप बैंडविड्थ सीमित हो जाती है।”
- फंड की कमी: कई पायलट परियोजनाएँ सरकारों के लिए निःशुल्क हैं, जिससे दीर्घकालिक फंडिंग, सामुदायिक स्वामित्व और रखरखाव को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। क्षेत्र-विशिष्ट निधियों को एकीकृत करना सतत विकास के लिए एक चुनौती बना हुआ है।
- डिजिटल डिवाइड और मानव पूँजी: नई तकनीकों के उपयोग के लिए ग्रामीणों को डिजिटली साक्षर बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सामुदायिक स्वामित्व और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक, लेकिन चुनौतीपूर्ण कार्य है।