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सामान्य अध्ययन-1: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ; महिलाओं और महिला संगठनों की भूमिका।
संदर्भ: भारत के प्रधानमंत्री ने सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
सावित्रीबाई फुले के बारे में

- सावित्रीबाई फुले माली समुदाय की एक दलित महिला थीं। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था।
- नौ वर्ष की आयु में उनका विवाह समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से हुआ, जिन्होंने न केवल उन्हें शिक्षित किया बल्कि पुणे में एक शिक्षिका के रूप में प्रशिक्षित भी किया। इस प्रकार महिला शिक्षा के क्षेत्र में उनकी अग्रणी भूमिका का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- ज्योतिराव फुले को महात्मा ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है। यह उपाधि उन्हें विट्ठलराव कृष्णजी वांडेकर द्वारा दी गई थी। वे भारत के प्रमुख समाज सुधारकों और जाति-विरोधी कार्यकर्ताओं में से एक थे।
- सावित्रीबाई फुले एक अग्रणी दलित सुधारक थीं और भारत में महिला शिक्षा तथा सशक्तिकरण आंदोलन की प्रणेता थीं।
- उनके सम्मान में भारत सरकार द्वारा 1998 में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था।
महिलाओं के उत्थान में सावित्रीबाई फुले का योगदान
- पितृसत्तात्मक और जातिगत बाधाओं को पार करते हुए उन्होंने भारत की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त किया। उन्होंने प्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना कर महिला शिक्षा की नींव रखी और अपना सम्पूर्ण जीवन महिलाओं की गरिमा की रक्षा और सशक्तिकरण के लिए समर्पित कर दिया।
- उस दौर में जब महिलाओं और निचली जातियों के लिए शिक्षा वर्जित थी, सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने कड़े विरोध का सामना करते हुए 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया।
- प्रधानाध्यापिका के रूप में, सावित्रीबाई को निरंतर तिरस्कार का सामना करना पड़ा। उच्च जाति के पुरुषों द्वारा उन पर पत्थरबाजी की जाती और कीचड़ फेंका जाता था।
- उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार और सामाजिक बहिष्कार जैसी सामाजिक बुराइयों से लड़ने के लिए ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर काम किया।
- उन्होंने 1852 में ‘महिला सेवा मंडल‘ की स्थापना की और विधवाओं के सिर मुंडवाने की अपमानजनक प्रथा के खिलाफ नाइयों द्वारा की गई हड़ताल का समर्थन किया। 1863 में उन्होंने विधवा माताओं और उनके बच्चों के लिए एक आश्रय स्थल की स्थापना की।
- फुले दंपत्ति ने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंत को गोद लिया और 1873 में, उन्होंने जातिगत समानता और महिला अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए ‘सत्यशोधक समाज‘ की सह-स्थापना की। उन्होंने दहेज के बहिष्कार और अंतरजातीय विवाह जैसी सुधारवादी प्रथाओं का समर्थन किया।
- 1890 में ज्योतिराव फुले के निधन के बाद, सावित्रीबाई ने सामाजिक मानदंडों को चुनौती देते हुए अपने पति की चिता को मुखाग्नि दी। ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं।
- उन्होंने अपना सेवा कार्य निरंतर जारी रखा; 1896 के भीषण अकाल के दौरान उन्होंने प्रभावित लोगों को राहत सामग्री पहुँचाई और 1897 में प्लेग महामारी के पीड़ितों की निस्वार्थ सेवा की।
- एक बीमार बच्चे की सहायता करते समय वे स्वयं इस संक्रमण की चपेट में आ गईं और 10 मार्च, 1897 कोउनका निधन हो गया।
सावित्रीबाई फुले की साहित्यिक कृतियाँ
- सावित्रीबाई फुले एक प्रतिभाशाली लेखिका और कवयित्री थीं। उन्होंने 1854 में ‘काव्य फुले’ (कविताओं के फूल) और 1892 में ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ (शुद्ध रत्नों का सागर) प्रकाशित किया। उन्होंने ज्योतिराव फुले के भाषणों का भी संकलन किया।
- उन्होंने कई गीतों और लेखों की रचना की, जिन्हें कालांतर में ‘मातुश्री सावित्रीबाई फुलेची भाषणे व गाणी’ (मातुश्री सावित्रीबाई फुले के भाषण और गीत) के रूप में संकलित किया गया।
