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सामान्य अध्ययन–2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

सामान्य अध्ययन–3: आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया एवं सोशल नेटवर्किंग साइटों की भूमिका।

संदर्भ: इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उपलब्ध सेफ हार्बर (Safe Harbour) संरक्षण में बदलाव करने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है।

मौजूदा कानूनी एवं नियामक ढाँचे को समझना

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79: यह मध्यस्थों को उनके प्लेटफॉर्म के माध्यम से होस्ट या प्रसारित की जाने वाली तृतीय-पक्ष की सूचनाओं के लिए सशर्त दायित्व-मुक्ति प्रदान करती है। यह छूट निर्धारित समुचित सावधानी संबंधी आवश्यकताओं के पालन के अधीन होती है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021: इनमें समुचित सावधानी संबंधी दायित्वों, शिकायत निवारण तंत्र और उपयोगकर्ता सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं का प्रावधान किया गया है। महत्त्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यस्थों (SSMIs) के लिए नामित अनुपालन अधिकारियों की नियुक्ति करना तथा समय-समय पर अनुपालन रिपोर्ट प्रकाशित करना अनिवार्य है।
  • वर्ष 2025 का संशोधन: इसने वरिष्ठ स्तर पर प्राधिकरण, तर्कसंगत सूचना और सरकारी निर्देशों की आवधिक समीक्षा के माध्यम से गैर-कानूनी ऑनलाइन सामग्री को हटाने संबंधी सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ किया।
  • वर्ष 2026 का संशोधन: इसने यथार्थपरक डीपफेक सहित कृत्रिम रूप से सृजित सूचना (SGI) को विनियमित करने के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत की। इसमें उपयोगकर्ताओं द्वारा घोषणा, तकनीकी सत्यापन, सामग्री पर लेबल लगाना और अनुरेखण योग्य मेटाडेटा शामिल हैं।
  • संशोधित अनुपालन समय-सीमा: संशोधित फ्रेमवर्क में निर्दिष्ट कानूनी निर्देशों के 3 घंटे के भीतर, निर्दिष्ट अंतरंग या प्रतिरूपण-संबंधी सामग्री की शिकायतों के लिए 2 घंटे के भीतर, कुछ सामग्री हटाने संबंधी शिकायतों के लिए 36 घंटे के भीतर तथा सामान्य शिकायतों के लिए 7 दिनों के भीतर सामग्री हटाने/शिकायतों के निवारण का प्रावधान किया गया है।

संवैधानिक एवं कानूनी आयाम

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: ऑनलाइन सामग्री का विनियमन संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) तथा अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अनुरूप होना चाहिए।
  • न्यायिक सुरक्षा उपाय: श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 79(3)(b) की सीमित व्याख्या करते हुए गैर-कानूनी सामग्री को हटाने के दायित्व को न्यायालय के आदेश अथवा उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी द्वारा जारी अधिसूचना से जोड़ा, न कि केवल निजी शिकायतों से।
  • प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश (15 अक्टूबर 2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पॉक्सो (POCSO) रूपरेखा के अंतर्गत बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री (CSEAM) को हटाने और उसकी रिपोर्ट करने के लिए मध्यस्थों के दायित्वों पर बल दिया।
    • न्यायालय ने पेवॉल (Paywall) के पीछे उपलब्ध बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री से अर्जित लाभ की वसूली सहित अनुकरणीय मौद्रिक दंड पर विचार करने का भी आह्वान किया तथा गंभीर उल्लंघनों के मामलों में सेफ हार्बर संरक्षण वापस लेने को अंतिम उपाय माना।

सरकार मौजूदा रूपरेखा पर पुनर्विचार क्यों कर रही है?

  • प्लेटफॉर्म की बदलती प्रकृति: सोशल मीडिया कंपनियाँ सामग्री को रैंक करने, उसकी अनुशंसा करने और उसका प्रसार बढ़ाने के लिए एल्गोरिदम का तेजी से उपयोग कर रही हैं। इस प्रकार उनकी भूमिका निष्क्रिय मध्यस्थों से आगे बढ़ गई है।
  • सामग्री मॉडरेशन संबंधी चिंताएँ: प्लेटफॉर्म अपने स्वयं के सामुदायिक दिशानिर्देश लागू करते हैं, जो हमेशा भारतीय कानूनों के अनुरूप नहीं हो सकते। इससे उनके द्वारा सक्रिय रूप से प्रचारित की जाने वाली सामग्री के प्रति उनकी जिम्मेदारी को लेकर प्रश्न उठते हैं।
  • बढ़ते ऑनलाइन जोखिम: गलत सूचना, डीपफेक, प्रतिरूपण, ऑनलाइन दुर्व्यवहार और बाल यौन शोषण ने प्लेटफॉर्म की अधिक जवाबदेही की माँग को बढ़ा दिया है।
  • प्रस्तावित पुनर्गठन: सरकार इस बात की जाँच कर रही है कि क्या सेफ हार्बर संरक्षण मुख्य रूप से उन सेवाओं तक सीमित होना चाहिए, जो केवल सूचनाओं का प्रसारण करती हैं, जैसे इंटरनेट और दूरसंचार सेवा प्रदाता, न कि उन प्लेटफॉर्म तक जो सक्रिय रूप से सामग्री का चयन, क्यूरेशन और अनुशंसा करते हैं।

चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

  • निवारक प्रभाव: कानूनी दायित्व का भय वैध सामग्री को भी अत्यधिक मात्रा में हटाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
  • नियामक अतिक्रमण: सामग्री हटाने संबंधी व्यापक या अस्पष्ट निर्देश मनमाने प्रतिबंधों को बढ़ावा दे सकते हैं तथा प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकते हैं।
  • अनुपालन का बोझ: बढ़े हुए दायित्व से परिचालन लागत में वृद्धि हो सकती है, जिसका असमान रूप से अधिक प्रभाव छोटे प्लेटफॉर्म और डिजिटल सेवा प्रदाताओं पर पड़ सकता है।
  • दायित्व का निर्धारण: निष्क्रिय मध्यस्थों और सामग्री पर एल्गोरिदम के माध्यम से नियंत्रण रखने वाले प्लेटफॉर्म के बीच अंतर करना कानूनी एवं तकनीकी रूप से जटिल हो सकता है।

आगे की राह

  • भूमिका-आधारित विनियमन: मध्यस्थ की प्रकृति और सामग्री पर उसके नियंत्रण की सीमा के अनुसार उसके दायित्व का निर्धारण किया जाना चाहिए।
  • कानूनी स्पष्टता: मनमाने ढंग से कानून लागू किए जाने से रोकने के लिए सेफ हार्बर संरक्षण समाप्त होने के आधारों एवं परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय: सामग्री हटाने संबंधी तर्कसंगत निर्देश, पारदर्शिता, प्रभावी शिकायत निवारण तथा स्वतंत्र समीक्षा तंत्र सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
  • संतुलित दृष्टिकोण: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता और डिजिटल नवाचार की रक्षा करते हुए हानिकारक सामग्री के विरुद्ध जवाबदेही को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
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