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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण; आपदा प्रबंधन।

संदर्भ: हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष रिपोर्ट, “समुद्र-स्तर में वृद्धि से संबंधित चुनौतियाँ और उनसे निपटने के उपाय एवं दृष्टिकोण”, चेतावनी देती है कि समुद्र का बढ़ता स्तर मानवाधिकारों, आजीविका, अर्थव्यवस्थाओं, बुनियादी ढाँचे और राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा है।

तेजी से बढ़ता वैश्विक खतरा

  • तेजी से बढ़ता समुद्र-स्तर: वैश्विक औसत समुद्र-स्तर 2014–2023 के दौरान प्रतिवर्ष 4.7 मिमी बढ़ा, जो 2024 में रिकॉर्ड 5.9 मिमी तक पहुँच गया। इसके प्रमुख कारण महासागरों का गर्म होना तथा ग्लेशियरों और हिमचादरों का पिघलना हैं।
  • बढ़ता जोखिम: लगभग 770 मिलियन लोग, अर्थात वैश्विक स्तर पर लगभग हर दस में से एक व्यक्ति, ऐसे तटीय क्षेत्रों में रहते हैं जो उच्च ज्वार रेखा से 5 मीटर से कम ऊँचाई पर हैं और महत्वपूर्ण जोखिमों का सामना कर रहे हैं।
  • भविष्य में वृद्धि: बहुत कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में भी वैश्विक औसत समुद्र-स्तर में 2050 तक 0.23 मीटर की वृद्धि हो सकती है।
  • विस्थापन: तत्काल अनुकूलन उपाय नहीं किए जाने पर 2050 तक 1.2 अरब लोग विस्थापित हो सकते हैं। कई प्रशांत द्वीपीय समुदायों ने पहले ही पुनर्वास की प्रक्रियाएँ शुरू कर दी हैं।
  • असमान जोखिम: मियामी, न्यूयॉर्क और ग्वांगझोउ जैसे शहरों में तटीय क्षेत्रों की लगभग 2–3.5 ट्रिलियन डॉलर की परिसंपत्तियाँ जोखिम में हैं, जबकि निचले क्षेत्रों में स्थित दक्षिण एशियाई डेल्टा क्षेत्रों में मानव विस्थापन का जोखिम विशेष रूप से गंभीर है।
  • व्यापक प्रभाव: कैरेबियाई क्षेत्र में लगभग 40% समुद्र तट 2050 तक समाप्त हो सकते हैं, जिससे पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरा उत्पन्न होगा। भूमध्यसागरीय और अटलांटिक क्षेत्रों के कई स्थानों पर ऐतिहासिक रूप से सदी में एक बार आने वाली तटीय बाढ़ 2050 से पहले 10 गुना अधिक बार आने का अनुमान है।

असमान मानवीय और क्षेत्रीय परिणाम

  • मानवाधिकार: बढ़ता समुद्र-स्तर पर्याप्त आवास, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता, भोजन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा तक पहुँच के लिए खतरा उत्पन्न करता है। बाढ़ और तटीय कटाव से घरों, विद्यालयों, अस्पतालों और कृषि भूमि को नुकसान पहुँच सकता है।
  • जल और स्वास्थ्य: खारे पानी का अंतःप्रवेश मीठे जल और मिट्टी को दूषित कर सकता है, जिससे पेयजल, कृषि और सिंचाई प्रभावित होती है। वहीं, स्वच्छता प्रणालियों को होने वाली क्षति जल-जनित रोगों के संपर्क में वृद्धि कर सकती है।
  • सुभेद्य समुदाय: लघु द्वीपीय विकासशील राज्य (एसआईडीएस), स्वदेशी लोग और निचले तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय असमान रूप से अधिक जोखिम का सामना करते हैं।
  • संस्कृति और पहचान: पैतृक भूमि के नष्ट होने से स्वदेशी लोगों की सांस्कृतिक पहचान, आध्यात्मिक संबंधों और पारंपरिक ज्ञान के हस्तांतरण में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।
  • दक्षिण एशिया: मुंबई, कोलकाता और ढाका में 1.4 करोड़ से अधिक लोग स्थायी जलमग्नता के कारण अपने घर खोने के तत्काल जोखिम में हैं। भूमि का धँसाव बाढ़ और विस्थापन को और अधिक तीव्र कर सकता है।

आर्थिक और कानूनी दाँव

  • आर्थिक क्षति: तटीय बुनियादी ढाँचे को होने वाली क्षति का अनुमान पहले ही 1.8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक लगाया जा चुका है, जबकि पर्याप्त अनुकूलन के अभाव में 2100 तक वैश्विक वार्षिक क्षति 1.2–4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकती है।
  • वित्तीय अंतराल: विकासशील देशों को अनुकूलन के लिए अनुमानतः प्रति वर्ष 310–365 अरब डॉलर की आवश्यकता है, जबकि 2023 में अनुकूलन के लिए केवल 26 अरब डॉलर का वित्तपोषण उपलब्ध हुआ।
  • आर्थिक व्यवधान: बंदरगाहों, पर्यटन, मत्स्य पालन और अन्य तटीय गतिविधियों के समुद्र-स्तर वृद्धि के संपर्क में आने का जोखिम बढ़ रहा है, जिससे आजीविका और व्यापक आर्थिक गतिविधियों के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा है।
  • राज्य का दर्जा और संप्रभुता: क्षेत्र के स्थायी नुकसान से राज्य का दर्जा, संप्रभुता और राष्ट्रीयता से संबंधित जटिल प्रश्न उत्पन्न होते हैं, विशेषकर द्वीपीय राज्यों के लिए।
  • समुद्री अधिकार: रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत प्रभावित राज्यों की निरंतरता तथा उनके मौजूदा समुद्री क्षेत्रों और महासागरीय संसाधनों पर अधिकारों को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देती है, साथ ही प्रभावित आबादी के लिए कानूनी निश्चितता सुनिश्चित करने की बात करती है।

बढ़ते समुद्र-स्तर के प्रभाव के दायरे में भारत

  • उच्च जोखिम वाले शहर: रिपोर्ट में ढाका के साथ मुंबई और कोलकाता को निम्न-स्थित दक्षिण एशियाई शहरों के रूप में चिन्हित किया गया है, जहाँ विस्थापन का जोखिम बढ़ रहा है; इन क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से अधिक लोग स्थायी जलमग्नता के कारण अपने घर खोने के तत्काल जोखिम में हैं।
  • परस्पर बढ़ते जोखिम: भूमि का धँसाव बाढ़ और विस्थापन को तीव्र कर सकता है, जबकि खारे पानी का अंतःप्रवेश पेयजल, कृषि, सिंचाई और भूजल पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
  • व्यापक जोखिम: तटीय बुनियादी ढाँचा, आवश्यक सेवाएँ, आजीविका और आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ते औसत तथा चरम समुद्र-स्तर के प्रति लगातार अधिक संवेदनशील हो रही हैं।

रिपोर्ट की सिफारिशें

  • रिपोर्ट में एकीकृत प्रतिक्रिया के लिए 18 सिफारिशें प्रस्तुत की गई हैं:
  • शमन: समुद्र-स्तर में आगे होने वाली वृद्धि को सीमित करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी की गति को तेज करना।
  • विज्ञान और पूर्व चेतावनी: समुद्र-स्तर की निगरानी, वैज्ञानिक आँकड़ों, मॉडलिंग, जोखिम आकलन और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करना।
  • अनुकूलन और लचीलापन: समुद्र-स्तर से संबंधित जोखिमों को विकास और तटीय नियोजन में शामिल करना तथा लचीले बुनियादी ढाँचे और आवश्यक सेवाओं को सुदृढ़ करना।
  • वित्त और क्षमता: विशेष रूप से विकासशील देशों और सुभेद्य समुदायों के लिए पूर्वानुमानित अनुकूलन वित्तपोषण, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण संबंधी सहायता में वृद्धि करना।
  • अधिकार और कानूनी संरक्षण: विस्थापन, राज्य की निरंतरता, समुद्री अधिकारों और कानूनी निश्चितता से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करते हुए सुभेद्य आबादी और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना।
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