संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन 2: भारतीय संविधान-ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना ।

संदर्भ: हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। यह इस्तीफा उस महत्वपूर्ण चरण में दिया गया जब उनके विरुद्ध संसदीय निष्कासन की कार्यवाही चल रही थी।

अन्य संबंधित जानकारी:

• स्वतंत्र भारत में यह तीसरा अवसर है जब किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने महाभियोग संबंधी कार्यवाही के निष्कर्ष से बचने के लिए बीच में ही इस्तीफा दे दिया है।

• इस तरह के प्रत्येक इस्तीफे ने एक ही संवैधानिक रिक्ति को उजागर किया है, जिसके लिए अभी तक कोई विधायी समाधान नहीं निकाला गया है।

• यद्यपि संविधान में ‘महाभियोग’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन बोलचाल की भाषा में इसका उपयोग अनुच्छेद 124 (उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के तहत की जाने वाली कार्यवाही के लिए किया जाता है।

• भारत में उल्लेखनीय महाभियोग प्रयास:

  • न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (1993): महाभियोग का सामना करने वाले उच्चतम न्यायालय के पहले न्यायाधीश। जाँच समिति ने धन के दुरुपयोग का दोषी पाया, लेकिन लोकसभा में मतदान से अनुपस्थिति के कारण प्रस्ताव विफल हो गया।
  • न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (2011): धन के गबन का आरोप। राज्यसभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया था, लेकिन लोकसभा में विचार होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

• स्वतंत्रता के बाद से भारत में अब तक किसी भी न्यायाधीश पर सफलतापूर्वक महाभियोग नहीं चलाया जा सका है।

पृष्ठभूमि और कालक्रम:

• घटनाक्रम और आरंभिक विकास: दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक निवास पर आग बुझाने के अभियान के दौरान भारी मात्रा में जले हुए नकदी के बोरे बरामद हुए। यह घटना तब की है जब वे दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे।

  • उन्होंने इन बोरों पर अपने स्वामित्व से इनकार किया और उस स्टोररूम को एक सामान्य ‘डंपिंग एरिया’ (कूड़ा डालने की जगह) बताया। इसके पश्चात, उनका स्थानांतरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कर दिया गया।

• न्यायपालिका द्वारा आंतरिक जाँच: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय आंतरिक समिति का गठन किया। इस समिति में न्यायमूर्ति शील नागू, न्यायमूर्ति जी. एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल थे।

  • समिति की 64 पृष्ठों की रिपोर्ट में स्टोररूम पर उनके ‘मौन या सक्रिय नियंत्रण’ (के पुख्ता आनुमानिक साक्ष्य पाए गए। इसी रिपोर्ट के आधार पर समिति ने उन्हें पद से हटाने की कार्यवाही की सिफारिश की थी।

• न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रिया: न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा (प्रारंभिक चरण में) इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की।

  • न्यायमूर्ति वर्मा ने न्यायपालिका की ‘आंतरिक प्रक्रिया’ को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। उच्चतम न्यायालय ने उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि “भारत का मुख्य न्यायाधीश, जाँच समिति और राष्ट्रपति के बीच केवल एक ‘डाकघर’ की तरह कार्य नहीं करता है।” 
  • न्यायमूर्ति वर्मा ने निष्कासन प्रस्ताव को स्वीकार करने के लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय को भी चुनौती दी थी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया।

• संसदीय जाँच: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया गया था।

  • एक सदस्य की सेवानिवृत्ति के पश्चात, समिति की सदस्यता में परिवर्तन के साथ इसकी कार्यवाही निरंतर जारी रही।

एक कार्यरत न्यायाधीश को पद से कैसे हटाया जा सकता है?

• संविधान के अनुसार, किसी न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही पद से हटाया जा सकता है। यह आदेश संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित एक प्रस्ताव पर आधारित होना चाहिए।

• न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के अनुसार निष्कासन की विस्तृत प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में निर्धारित की गई है:

चरण                                    प्रक्रिया
प्रस्ताव की शुरुआतमहाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। लोकसभा के लिए अध्यक्ष को 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस देना आवश्यक है। राज्यसभा के लिए सभापति को 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस देना आवश्यक है। अध्यक्ष या सभापति सामग्री की जांच कर सकते हैं और प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय ले सकते हैं।
जाँच समिति का गठनयदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष या सभापति द्वारा तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है। इसमें उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के एक मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं। समिति आरोपों को तैयार करती है और जांच करती है। न्यायाधीश को आरोपों की एक प्रति दी जाती है और लिखित बचाव का अवसर प्रदान किया जाता है।
रिपोर्ट प्रस्तुत करनाजांच के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को सौंपती है, जो इसे संसद के सदन के पटल पर रखते हैं।
संसदीय विचारयदि रिपोर्ट में कदाचार या अक्षमता की पुष्टि होती है, तो सदन में प्रस्ताव पर बहस शुरू की जाती है।
मतदान की आवश्यकताप्रस्ताव को प्रत्येक सदन में कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। एक सदन में अनुमोदन के बाद, इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।
अंतिम निष्कासनदोनों सदनों द्वारा अनुमोदन के पश्चात, प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजा जाता है, जो न्यायाधीश को पद से हटाने का अंतिम आदेश जारी करते हैं।

Source:
The Hindu
Scobserver
PRS India

Shares: