भारत में हीटवेव से सतही स्तर की ओज़ोन में वृद्धि
संदर्भ: आईआईटी खड़गपुर और केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज के शोधकर्ताओं द्वारा ‘npj क्लीन एयर’ जर्नल में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि भारत में हीटवेव (लू) के कारण सतही स्तर पर ओजोन प्रदूषण काफी बढ़ जाता है, जिससे श्वसन और हृदय संबंधी स्वास्थ्य जोखिम और अधिक गंभीर हो जाते हैं।
मुख्य निष्कर्ष:
- यह अध्ययन 2004-2024 के दौरान भारत भर में हीटवेव और सतह ओजोन स्तर के बीच संबंधों का विश्लेषण करता है। यह हीटवेव से प्रेरित ओजोन प्रदूषण का पहला व्यापक राष्ट्रव्यापी आकलन है।
- जमीनी स्तर की ओजोन एक हानिकारक प्रदूषक है, जो सूर्य के प्रकाश में नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs), कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन की प्रतिक्रिया से बनती है। उच्च तापमान इस रासायनिक प्रतिक्रिया की गति को और तेज कर देता है।
- हीटवेव के दौरान, सतह पर ओजोन सांद्रता अक्सर 85–110 μg/m³ तक पहुंच जाती है, जो सभी क्षेत्रों में WHO के 70 μg/m³ के दिशानिर्देश से काफी अधिक है।
- उत्तर-पश्चिम भारत, सिंधु-गंगा का मैदान, उत्तर-मध्य भारत, पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी हिमालय प्रमुख हॉटस्पॉट के रूप में उभरे हैं। पश्चिमी हिमालय में ओजोन का स्तर WHO की सीमा से 115% तक अधिक पाया गया।
- शोधकर्ताओं ने 2004 और 2024 के बीच 188 हीटवेव घटनाओं की पहचान की, जिनमें 2010, 2016, 2019 और 2024 के एपिसोड विशेष रूप से गंभीर थे, जो अक्सर शक्तिशाली अल नीनो वर्षों के बाद आए।
- 2024 में, हीटवेव अवधि के दौरान ओजोन के संपर्क में रहने को इस्केमिक हृदय रोग (IHD) और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) से होने वाली लगभग 26,500 मौतों से जोड़ा गया।
- हालाँकि, हीटवेव-जनित ओजोन वृद्धि के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार अतिरिक्त मृत्युदर का अनुमान लगभग 830 मौतों का लगाया गया था।
- 2024 में उत्तर-पश्चिम और उत्तर-मध्य भारत में हीटवेव विशेष रूप से गंभीर थी, जहाँ तापमान 44°C से अधिक हो गया और चुरू, राजस्थान में 50.5°C के शिखर पर पहुँच गया।
- अध्ययन जलवायु परिवर्तन के तहत हीट-वायु प्रदूषण की संयुक्त घटनाओं के बढ़ते खतरे पर प्रकाश डालता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा के लिए ओजोन पूर्वानुमान, वायु-गुणवत्ता सलाह और हीट एक्शन प्लान को एकीकृत करने की सिफारिश करता है।
ओडिशा के मयूरभंज में 1.5 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवाश्मों की खोज
संदर्भ: शोधकर्ताओं नेओडिशा के मयूरभंज जिले में मायोसीन-युग (लगभग 1.5 करोड़ वर्ष पुराने) के जीवाश्मों की खोज की है। यह खोज क्षेत्र के प्रागैतिहासिक समुद्री अतीत के विषय में महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करती है और दर्शाती है कि वर्तमान बारीपदा और उसके आसपास के इलाके कभी उथले समुद्र के नीचे डूबे हुए थे।
प्रमुख निष्कर्ष:
- प्राप्त अवशेषों में शार्क के दांत, शार्क की कशेरुकाएं, मछलियों की हड्डियां, मोलस्क के खोल और सूक्ष्म समुद्री जीव शामिल हैं।
- प्रारंभिक अध्ययनों से पता चलता है कि साइट से प्राप्त मछली के जीवाश्मों में लगभग आधी संख्या शार्क के अवशेषों की है। यह मायोसीन युग (2.3 करोड़ से 53 लाख वर्ष पूर्व) के दौरान एक समृद्ध समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व की पुष्टि करता है।
- यह खोज बताती है कि जो क्षेत्र आज वर्तमान तटरेखा से लगभग 60 किमी अंदर स्थित हैं, वे कभी एक तटीय समुद्री बेसिन का हिस्सा थे।
- ये निष्कर्ष समुद्री अतिक्रमण और प्रतिगमन का प्रमाण देते हैं। इससे प्राचीन तटरेखाओं के पुनर्निर्माण, समुद्र-स्तर में उतार-चढ़ाव को समझने और पूर्वी भारत पर जलवायु तथा भूवैज्ञानिक परिवर्तनों के प्रभाव का अध्ययन करने में मदद मिलेगी।
- शोधकर्ताओं ने जीवाश्म-युक्त संरचनाओं का दस्तावेजीकरण करने के लिए रिमोट सेंसिंग और जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS) आधारित मैपिंग के साथ-साथ क्षेत्र जांच का उपयोग किया।
- आगे के अध्ययन क्षेत्र से समुद्र के पीछे हटने की प्रक्रिया को समझने और भारत में इसी तरह की अन्य जीवाश्म-युक्त संरचनाओं के साथ भूवैज्ञानिक सहसंबंध स्थापित करने में सहायक होंगे।
- विशेषज्ञों ने इस स्थान को ‘भू-विरासत स्थल’ का दर्जा देने और संरक्षण, अनुसंधान, शिक्षा व भू-पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक जीवाश्म पार्क या संग्रहालय स्थापित करने की सिफारिश की है।
बारीपदा जीवाश्म बेड के बारे में
- बारीपदा जीवाश्म बेड, जिसे स्थानीय रूप से “असुर हड्डा” (दानव की हड्डियाँ) के नाम से जाना जाता है, ओडिशा के मयूरभंज जिले में डेरा (कुलियाना ब्लॉक) से लेकर प्रतापपुर (बड़साही ब्लॉक) तक फैला हुआ है।
- बूढ़ाबलंग नदी क्षेत्र के किनारे स्थित यह ओडिशा का एकमात्र ज्ञात स्थल है जहाँ मायोसीन-युग के समुद्री जीवाश्म खोजे गए हैं।
- जीवाश्म युक्त अवसादी निक्षेप एक प्राचीन समुद्री वातावरण का प्रमाण सुरक्षित रखते हैं और अतीत की पारिस्थितिक व भूवैज्ञानिक स्थितियों का मूल्यवान रिकॉर्ड प्रदान करते हैं।
- यह स्थल जीवाश्म विज्ञान, स्तरिकी, तलछट विज्ञान, पुरा-पारिस्थितिकी, पुरा-जलवायु और पुरा-भूगोल में अनुसंधान के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है।
- अपने वैज्ञानिक महत्व के कारण, इस स्थल में भू-विरासत और भू-पर्यटन (Geo-Tourism) गंतव्य के रूप में विकसित होने की प्रबल संभावना है।
विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस 2026
संदर्भ: विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस प्रतिवर्ष 17 जून को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। साथ ही, यह दिवस स्थायी भूमि प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर देता है।
विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस के बारे में

- संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1994 में एक प्रस्ताव के माध्यम से 17 जून को ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’ के रूप में घोषित किया था। यह घोषणा ‘संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन’ (UNCCD) को अपनाने के बाद की गई थी।
- यह दिवस मरुस्थलीकरण और सूखे की वैश्विक चुनौती पर प्रकाश डालता है, जो दुनिया के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है और जिसके लिए समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता है।
- वर्ष 2026 का विषय: “रेंजलैंड्स: पहचानें। सम्मान करें। बहाल करें।” (Rangelands: Recognize. Respect. Restore.) है। यह रेंजलैंड्स (विशाल घास के मैदानों) के महत्व पर केंद्रित है, जो पृथ्वी की सतह के आधे से अधिक हिस्से को कवर करते हैं और लगभग दो अरब लोगों, जिनमें चरवाहे और स्वदेशी समुदाय शामिल हैं, का समर्थन करते हैं।
- रेंजलैंड्स खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, जल विनियमन और जलवायु लचीलापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- यह विषय ‘रेंजलैंड्स और चरवाहों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष (2026)’ के समान है और इन पारिस्थितिकी प्रणालियों के पारिस्थितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मूल्य को अधिक मान्यता देने का आह्वान करता है।
- वर्तमान में, वैश्विक रेंजलैंड्स का 50% तक हिस्सा या तो क्षरित हो चुका है या खतरे में है, जिससे आजीविका, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं खतरे में पड़ गई हैं।
सरकार ने अद्यतन SHe-Box 2.0 पोर्टल के साथ महिला सुरक्षा ढाँचे को सुदृढ़ किया
संदर्भ: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) ने कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए ‘SHe-Box’ पोर्टल को नया रूप दिया किया है। यह कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों को दर्ज करने और उनकी निगरानी करने के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है।
अन्य संबंधित जानकारी
- SHe-Box पोर्टल का नया रूप 29 अगस्त 2024 को लॉन्च किया गया था, जबकि मूल SHe-Box ऑनलाइन शिकायत प्रणाली पहली बार जुलाई 2017 में शुरू की गई थी।
- इसे ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ (POSH अधिनियम) के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए विकसित किया गया है।
- यह पोर्टल सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कार्यस्थलों पर शिकायतों को दर्ज करने, ट्रैक करने और उनकी निगरानी करने के लिए एक ‘सिंगल-विंडो’ प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करता है।
- यह POSH अधिनियम के तहत गठित आंतरिक समितियों (ICs) और स्थानीय समितियों (LCs) के एक राष्ट्रीय भंडार के रूप में कार्य करता है।
- यह पोर्टल केंद्र, राज्य, जिला और कार्यस्थल-स्तरीय नोडल अधिकारियों के लिए डैशबोर्ड के साथ एक एकीकृत शिकायत-निगरानी प्रणाली प्रदान करता है।
- यह पोर्टल ‘मिशन शक्ति’ मोबाइल एप्लिकेशन के साथ एकीकृत है और 23 भाषाओं में सेवा प्रदान करता है।
- मार्च 2026 तक 1.61 लाख से अधिक कार्यस्थल, 68,460 आंतरिक समितियाँ (ICs) और 777 स्थानीय समितियाँ (LCs) इस पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं।
मिशन शक्ति के बारे में
- ‘मिशन शक्ति’ महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक व्यापक (छत्र) योजना है, जिसका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना है।
- इसकी दो उप-योजनाएं हैं:
- संबल (Sambal): यह वन स्टॉप सेंटर (सखी), महिला हेल्पलाइन (181), बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP) और नारी अदालत जैसी पहलों के माध्यम से महिला सुरक्षा और संरक्षा पर ध्यान केन्द्रित करती है।
- सामर्थ्य (Samarthya): यह प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY), शक्ति सदन, सखी निवास (वर्किंग वुमन हॉस्टल), पालना (राष्ट्रीय क्रेच योजना) और हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ विमेन जैसी पहलों के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण पर ध्यान केन्द्रित करती है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC)में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति
संदर्भ: मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) ने डॉ. सैबल चट्टोपाध्याय को राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है।
अन्य संबंधित जानकारी:
- ACC ने प्रो. शुभाब्रत दास, श्री सत्येंद्र बहादुर सिंह और डॉ. माधवन मुकुंद को भी आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त किया है।
- डॉ. सैबल चट्टोपाध्याय भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) कलकत्ता के पूर्व निदेशक हैं और सर्वेक्षण प्रतिदर्श, अनुमान तकनीकों तथा सांख्यिकीय अनुमान में विशेषज्ञता रखने वाले एक प्रख्यात सांख्यिकीविद् हैं।
- इन नियुक्तियों का उद्देश्य भारत की आधिकारिक सांख्यिकीय प्रणाली और कामकाज का नेतृत्व करना है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) के बारे में
- NSC की स्थापना 2005 में भारतीय सांख्यिकीय प्रणाली पर सी. रंगराजन आयोग (2001) की सिफारिशों पर की गई थी।
- NSC एक गैर-संवैधानिक और गैर-सांविधिक निकाय है, जिसे 2005 में एक सरकारी संकल्प के माध्यम से स्थापित किया गया था।
- यह आधिकारिक सांख्यिकी के लिए सर्वोच्च सलाहकार निकाय के रूप में कार्य करता है और देश में मुख्य सांख्यिकीय गतिविधियों के लिए नोडल निकाय की भूमिका निभाता है।
संरचना:
- अंशकालिक अध्यक्ष।
- चार अंशकालिक सदस्य।
- नीति आयोग के सीईओ, पदेन सदस्य के रूप में।
- सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के सचिव, आयोग के सचिव के रूप में।
प्रमुख कार्य:
- सांख्यिकीय प्राथमिकताओं, मानकों और कार्यप्रणालियों का विकास और निगरानी करना।
- राष्ट्रीय सांख्यिकीय प्रणाली में समन्वय सुनिश्चित करना।
- सांख्यिकीय एजेंसियों के कामकाज की समीक्षा करना और आधिकारिक आंकड़ों की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता में सुधार के लिए उपाय सुझाना।
अभ्यास खान क्वेस्ट
- भारतीय सेना का एक दल ‘अभ्यास खान क्वेस्ट 2026’ के लिए रवाना हो गया है। ‘अभ्यास खान क्वेस्ट एक बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है, जो 20 जून से 3 जुलाई 2026 तक उलानबटार, मंगोलिया के ‘फाइव हिल्स ट्रेनिंग एरिया’ में आयोजित किया जाएगा।
अन्य संबंधित जानकारी:
- इस अभ्यास का मुख्य लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय VII के तहत शांति सहायता अभियानों में भाग लेने वाली सेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता और सहयोग को बढ़ाना है।
- प्रशिक्षण में निम्नलिखित शामिल हैं:
- स्थिर और मोबाइल चेकपोस्ट की स्थापना।
- कोर्डन और सर्च (घेराबंदी और तलाशी) अभियान।
- गश्त करना और शत्रुतापूर्ण क्षेत्रों से नागरिकों को बाहर निकालना।
- काउंटर-IED ड्रिल, कॉम्बैट फर्स्ट एड (युद्ध के दौरान प्राथमिक चिकित्सा) और हताहतों को निकालने का अभ्यास।
- यह अभ्यास भाग लेने वाले देशों को अपनी युद्ध कौशल, तकनीक और प्रक्रियाओं (TTPs) का आदान-प्रदान करने और परिचालन तैयारी तथा सैन्य सहयोग को मजबूत करने के लिए मंच प्रदान करता है।
अभ्यास खान क्वेस्ट के बारे में
- ‘खान क्वेस्ट’ मंगोलियाई सशस्त्र बलों द्वारा आयोजित एक बहुराष्ट्रीय शांति स्थापना अभ्यास है।
- इसकी शुरुआत 2003 में संयुक्त राज्य अमेरिका और मंगोलिया के बीच एक द्विपक्षीय अभ्यास के रूप में हुई थी, जो 2006 में एक बहुराष्ट्रीय शांति स्थापना अभ्यास के रूप में विकसित हुआ।
- यह ‘अभ्यास नोमैडिक एलीफेंट’ से अलग है, जो भारत और मंगोलिया के बीच एक द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है।
- 2026 का संस्करण इस अभ्यास का 23वां आयोजन है।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य सहभागी सशस्त्र बलों को बहुराष्ट्रीय वातावरण में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशनों के लिए तैयार करना और भागीदार देशों के बीच अंतर-संचालनीयता में सुधार करना है।
