कश्मीर में गुच्छी (Morels) की खेती

संदर्भ: हाल ही में, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) ने पहली बार नियंत्रित और खुले खेतों में गुच्छी (Morels) की सफलतापूर्वक खेती की है।

गुच्छी (Morchella / Gucchi / Kangaech) के बारे में

• गुच्छी (Morchella esculenta) एक अत्यंत मूल्यवान जंगली खाद्य मशरूम है, जो ‘मोर्चेला’ वंश (परिवार मोर्चेलेसी) से संबंधित है।

• यह दुनिया के सबसे महंगे मशरूमों में से एक है।

• जम्मू-कश्मीर में इसे स्थानीय स्तर पर ‘गुच्छी’ और ‘कांगेच’ (Kangaech) के नाम से जाना जाता है।

• यह उच्च ऊंचाई वाले वन पारिस्थितिकी तंत्र में प्राकृतिक रूप से उगता है।

• पनपने के लिए जलवायु परिस्थितियाँ: यह उच्च ऊंचाई (2500–3500 मीटर) पर ठंडे और नम वातावरण में, ह्यूमस से भरपूर मिट्टी पर उगता है। इसका फलन (Fruiting) आमतौर पर वर्षा या बर्फ पिघलने के बाद होता है, मुख्य रूप से मार्च से जून के दौरान (या गर्म क्षेत्रों में सर्दियों में)।

• आवास और वितरण: यह मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी हिमालय, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पाया जाता है।

  • यह विशिष्ट पारिस्थितिक परिस्थितियों में चीड़ (Chir Pine), बांज (Oak) और मिश्रित शंकुधारी वनों में उगता है।

• दिखावट और जैविक विशेषताएं: यह मशरूम मिट्टी के नीचे कवकजाल से विकसित होता है और मिट्टी के ऊपर एक दृश्यमान फल देने वाला शरीर उत्पन्न करता है।

  • यह गुच्छों में दिखाई देता है। ‘वंश’  के स्तर पर इसकी पहचान करना आसान है, लेकिन ‘प्रजाति’ के स्तर पर यह कठिन होता है।

• आर्थिक और पोषण मूल्य:

  • गुच्छी विश्व के सबसे महंगे मशरूमों में से एक हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय ‘गॉरमेट’ (Gourmet) बाजारों में इनकी भारी मांग है।
  • ये प्रोटीन, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं।
  • ये अपने विशिष्ट स्वाद और औषधीय गुणों के लिए भी जाने जाते हैं।

इस सफलता का महत्व:

• यह नवाचार एक जंगली प्रजाति की व्यावसायिक खेती को सक्षम बनाता है।

• यह किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए आय के नए अवसर प्रदान करता है।

• यह उच्च मूल्य वाली कृषि में विविधीकरण को बढ़ावा देता है।

• यह जम्मू-कश्मीर में निर्यात-उन्मुख जैव-अर्थव्यवस्था के विकास का समर्थन करता है।

• यह नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले पारिस्थितिक दबाव को कम करता है।

आर्कटिक में लाइकेन के घटने से कैरिबू के अस्तिस्त्व पर खतरा 

संदर्भ: स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क कॉलेज ऑफ एनवायर्नमेंटल साइंस एंड फॉरेस्ट्री के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन से पता चलता है कि आर्कटिक में लाइकेन की घटती उपलब्धता कैरिबू (रेंडियर) के शीतकालीन अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती है।

कैरिबू (रेंडियर) के बारे में

• कैरिबू, जिसका वैज्ञानिक नाम Rangifer tarandus है, मृग परिवार (सर्विडे – Cervidae) से संबंधित है।

• उत्तरी अमेरिका में इसे “कैरिबू” कहा जाता है, जबकि यूरेशिया में और पालतू आबादी के लिए “रेंडियर” शब्द का प्रयोग किया जाता है। ये दोनों एक ही प्रजाति के नाम हैं।

प्रमुख जैविक विशेषताएं:

• नर और मादा दोनों कैरिबू के सींग होते हैं, जो मृग प्रजातियों में एक विशिष्ट विशेषता है।

• प्राकृतिक परिस्थितियों में मादाएं आमतौर पर प्रत्येक वर्ष एक बछड़े को जन्म देती हैं।

• नवजात बछड़ा जन्म के कुछ ही मिनटों में खड़ा हो सकता है और एक दिन के भीतर चलना शुरू कर देता है।

• इनके खुर बड़े होते हैं जो बर्फ पर चलने और कुशलतापूर्वक तैरने में मदद करते हैं।

• इनके खुरों में मौसमी परिवर्तन होते हैं: गर्मियों में बेहतर पकड़ के लिए खुर नरम हो जाते हैं और सर्दियों में बर्फ पर घर्षण के लिए सख्त हो जाते हैं।

• खुरों का निचला हिस्सा खोखला होता है, जो उन्हें भोजन तक पहुँचने के लिए बर्फ खोदने में मदद करता है।

• आहार और पारिस्थितिक भूमिका:

  • लाइकेन, जिसे अक्सर “रेंडियर मॉस” कहा जाता है, कैरिबू के शीतकालीन आहार का मुख्य आधार है।
  • ये उन दुर्लभ जानवरों में से हैं जो लाइकेन को प्रभावी ढंग से पचा सकते हैं।
  • कैरिबू टुंड्रा वनस्पति को नियंत्रित करके और आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक चक्र (Nutrient cycling) में योगदान देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

• आवास और वितरण:

  • ये ग्रीनलैंड, स्कैंडिनेविया, रूस, अलास्का और कनाडा में पाए जाते हैं। ये आर्कटिक टुंड्रा और बोरियल वन पारिस्थितिकी तंत्र में निवास करते हैं।
  • प्रकार: ये दो प्रकार के होते हैं—
  • टुंड्रा कैरिबू: ये बड़े झुंडों में रहते हैं और अत्यधिक प्रवासी (Migratory) होते हैं।
  • वुडलैंड कैरिबू: ये वनों में रहते हैं और तुलनात्मक रूप से कम प्रवास करते हैं।

• संरक्षण स्थिति:

  • IUCN रेड लिस्ट: सुभेद्य ।

• प्रमुख खतरे: जलवायु परिवर्तन, आवास का विखंडन, शिकार, और भेड़ियों, भालू एवं लिनेक्स (Lynx) जैसे शिकारियों का खतरा।

भारतीय नौसेना के द्विवार्षिक कमांडर सम्मेलन 2026 का पहला संस्करण

संदर्भ: भारतीय नौसेना के द्विवार्षिक कमांडर सम्मेलन 2026 का पहला संस्करण 14-16 अप्रैल 2026 तक नौसेना भवन, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।

कमांडर सम्मेलन के बारे में

• यह परिचालन स्थिति, क्षमता विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के साथ रणनीतिक संरेखण की समीक्षा के लिए भारतीय नौसेना का एक शीर्ष-स्तरीय मंच है।

• उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि भारतीय नौसेना एक युद्ध-तैयार, प्रौद्योगिकी-संचालित बल बनी रहे और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) एवं भाहिंदरत-प्रशांत में एक ‘पसंदीदा सुरक्षा भागीदार’ के रूप में उभरे।

• महत्व: पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा के लिए त्वरित नौसैनिक तैनाती और हिंद महासागर क्षेत्र में बहु-राष्ट्रीय बलों (MNFs) की उपस्थिति के कारण यह सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

• यह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद परिचालन सिद्धांत, अंतर-सेवा समन्वय और प्रौद्योगिकी-संचालित प्रतिक्रियाओं की पुष्टि करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

• विमर्श के मुख्य क्षेत्र:

  • वर्तमान भू-रणनीतिक चुनौतियों और विकसित होते समुद्री सुरक्षा वातावरण की समीक्षा करना।
  • यह सम्मेलन परिचालन तत्परता, युद्ध क्षमता, ब्लू-वाटर विस्तार, प्रशिक्षण, मानव संसाधन प्रबंधन, रसद, रखरखाव और मानवरहित प्रणालियों की तैनाती पर बल देता है।
  • नौसैनिक परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा-संचालित प्रौद्योगिकियों के कार्यान्वयन को प्राथमिकता देना।

• रणनीतिक अभिविन्यास (Strategic Orientation):

  • भारतीय समुद्री सिद्धांत (IMD) के अनुरूप तैयारियों का आकलन करना।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समुद्री साझेदारी को सुदृढ़ करना।
  • भारत के ‘महासागर’ (MAHASAGAR) दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना।
  • रक्षा के क्षेत्र में स्वदेशीकरण और नवाचार को बढ़ावा देना।

जलियांवाला बाग हत्याकांड

संदर्भ: जलियाँवाला बाग में 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड के 107वें शहीदी दिवस पर, राष्ट्र उन निर्दोष पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है जिनका बलिदान भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919)

• जलियाँवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था।

• यह रौलट एक्ट द्वारा उत्पन्न तनाव की एक दुखद परिणति थी।

  • रौलट एक्ट, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, 1919’ के रूप में जाना जाता था, ब्रिटिश सरकार द्वारा असंतोष और क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाने के लिए पारित एक कानून था।

• बैसाखी का त्योहार मनाने और स्थानीय नेताओं डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए जलियाँवाला बाग में लगभग 20,000 लोगों की भीड़ जमा हुई थी।

• एकत्र हुई भीड़ मार्शल लॉ के आदेशों (सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध सहित) से अनभिज्ञ थी।

• मार्शल लॉ लागू करने के प्रभारी ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड डायर ने अपने सैनिकों के साथ घटना स्थल पर पहुँचकर सभा को घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया।

• आधिकारिक ब्रिटिश रिकॉर्ड में 379 लोगों की मृत्यु और 1,100 से अधिक के घायल होने का दावा किया गया था, जबकि भारतीय स्रोतों और अन्य अनुमानों के अनुसार हताहतों की संख्या बहुत अधिक थी।

स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव:

• इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ अंकित किया, जिससे ब्रिटिश शासन में भारतीयों का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो गया। इसी घटना ने महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन (1920-22) के माध्यम से जन लामबंदी की ओर प्रेरित किया।

• रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोध स्वरूप अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि त्याग दी। वहीं, क्रांतिकारी भावनाओं ने जोर पकड़ा—जिसने बाद में उधम सिंह जैसे व्यक्तित्वों को प्रभावित किया, जिन्होंने 1940 में माइकल ओ’डायर की हत्या कर दी थी।

• ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त हंटर कमीशन ने डायर की निंदा की और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, हालांकि ब्रिटेन में इस पर प्रतिक्रियाएँ विभाजित थीं और कुछ लोगों ने उनकी प्रशंसा भी की थी।

महत्व:

• इसने उदारवादी राजनीति से जन राष्ट्रवाद की ओर एक निर्णायक बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया।

• स्वतंत्रता संग्राम में गांधीजी के नेतृत्व को सुदृढ़ किया।

• इसने औपनिवेशिक शासन के क्रूर स्वरूप को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया।

• यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बलिदान और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।

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