जंगलीसिक्किम केला

संदर्भ:  हाल ही में नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पूर्वी हिमालय की स्थानिक जंगली केले की प्रजाति ‘मूसा सिक्किमेन्सिस’ (Musa sikkimensis) में जलवायु अनुकूलन गुणों की पहचान की है, जो जलवायु-सहिष्णु कृषि के लिए इसके महत्व को रेखांकित करता है।

अध्ययन के मुख्य बिंदु

  • अध्ययन में पाया गया कि सिक्किम केला एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक भंडार के रूप में कार्य करता है, जिसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता, तनाव सहिष्णुता और जलवायु अनुकूलन के गुण विद्यमान हैं।
  • निष्कर्षों ने विभिन्न पर्यावरणीय स्थितियों और जलवायु संबंधी तनावों के प्रति अनुकूलित होने की इस प्रजाति की क्षमता पर प्रकाश डाला।
  • अनुसंधान के परिणाम अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका ‘फ्लोरा एंड फॉना’ में प्रकाशित हुए थे।
  • अध्ययन में इस बात पर बल दिया गया है कि फसल लचीलेपन को बढ़ाने और टिकाऊ कृषि उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए जंगली केले की प्रजातियों का संरक्षण महत्वपूर्ण है।
  • अनुसंधान ने नागालैंड के स्वदेशी समुदायों के बीच जंगली केले की प्रजातियों के नृजातीय वनस्पति विज्ञान संबंधी महत्व को भी रेखांकित किया है।
    • नृजातीय वनस्पति विज्ञान (Ethnobotanical) का तात्पर्य किसी समुदाय के लोगों के पौधों और उनके औषधीय, धार्मिक एवं अन्य उपयोगों से संबंधित पारंपरिक ज्ञान और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक अध्ययन से है।

जंगली सिक्किम केला के बारे में

  • मूसा सिक्किमेन्सिस प्रजाति को सामान्यतः ‘सिक्किम केला’ या ‘दार्जिलिंग केला’ कहा जाता है। यह प्रजाति पूर्वी हिमालयी क्षेत्र की स्थानीय है।
  • इस प्रजाति में रोग प्रतिरोधक क्षमता और पर्यावरणीय तनाव (जैसे अत्यधिक ठंड) के प्रति सहिष्णुता के प्राकृतिक गुण विद्यमान हैं।
  • इस पौधे की खाद्य फल फसल के रूप में खेती नहीं की जाती है, लेकिन यह केले के प्रजनन और फसल सुधार कार्यक्रमों के लिए एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधन के रूप में कार्य करता है।
  • इसके औषधीय गुणों के प्रमाण मिले हैं और इसका उपयोग पेचिश, अल्सर, मधुमेह और सूक्ष्मजीवी संक्रमणों के पारंपरिक उपचार में किया जाता है।
  • यह पौधा मूसा (Musa) वंश (genus) से संबंधित है और भारत तथा भूटान में पाई जाने वाली सबसे अधिक ऊंचाई पर उगने वाली केले की प्रजातियों में से एक है।
  • यह पौधा कठोर होता है और इसकी ऊंचाई लगभग चार मीटर तक होती है। इसकी पत्तियां पीली-हरी होती हैं और इसका कूटस्तंभ (pseudostem) लाल रंग की आभा लिए होता है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955

संदर्भ: हाल ही में, केंद्र सरकार ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण उत्पन्न ऊर्जा सुरक्षा चिंताओं के बीच प्राकृतिक गैस आपूर्ति और एलपीजी (LPG) उत्पादन को विनियमित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू किया।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह निर्णय इजरायल, संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान से जुड़े सैन्य हमलों के कारण उत्पन्न पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ती ऊर्जा सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर लिया गया था।
  • यह आदेश पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा जारी किया गया था और तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।
  • सरकार ने तेल शोधन कंपनियों को तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) का उत्पादन अधिकतम करने और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

प्राकृतिक गैस आपूर्ति को विनियमित करने हेतु सरकारी उपाय

  • सरकार ने निर्देश दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति स्थिरता बनाए रखने के लिए अनिवार्य क्षेत्रों हेतु प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में घरेलू पाइपयुक्त प्राकृतिक गैस (PNG) की आपूर्ति और परिवहन क्षेत्र में उपयोग की जाने वाली संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) शामिल हैं।
  • प्राथमिकता सूची में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) का उत्पादन और प्राकृतिक गैस पाइपलाइनों की परिचालन आवश्यकताएं भी शामिल हैं।
  • परिचालन उपलब्धता के आधार पर, इन प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को उनकी पिछली छह महीने की औसत गैस खपत का शत-प्रतिशत (100%) आपूर्ति बनाए रखी जाएगी।
  • नए आदेश के तहत उर्वरक संयंत्रों को उनकी पिछली छह महीने की औसत गैस खपत का सत्तर प्रतिशत (70%) प्राप्त होगा।
  • सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को घरेलू उपभोग के लिए एलपीजी उत्पादन को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है।
  • आदेश में पहचानी गई कंपनियों में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड शामिल हैं।
  • ये कंपनियां भारत में लगभग 99% घरों को रसोई गैस की आपूर्ति करती हैं।

आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के बारे में

  • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 सरकार को राष्ट्रीय हित में आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को विनियमित करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • इस अधिनियम का उपयोग जमाखोरी को रोकने, कीमतों को नियंत्रित करने और उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।
  • वर्ष 2020 में, इस अधिनियम में संशोधन किया गया ताकि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर कुछ कृषि वस्तुओं को विनियमित करने की सरकारी शक्तियों को सीमित किया जा सके।
  • इन परिस्थितियों में युद्ध, अकाल, कीमतों में असाधारण वृद्धि और गंभीर प्रकृति की प्राकृतिक आपदाएँ शामिल हैं।

हो मोबाइल डिक्शनरी एप्लीकेशन

संदर्भ: हाल ही में, हो (Ho) आदिवासी समुदाय के एक स्व-शिक्षित डेवलपर, कृष्णा दिग्गी ने हो भाषा के संरक्षण के समर्थन में 10,000 से अधिक शब्दों के साथ ‘हो मोबाइल डिक्शनरी ऐप’ का नया संस्करण लॉन्च किया।

अन्य संबंधित जानकारी

  • कृष्णा दिग्गी झारखंड के कोल्हान क्षेत्र से हैं। उन्होंने स्वदेशी भाषाई विरासत की रक्षा के उद्देश्य से 2017 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी।
  • इस एप्लिकेशन को ‘इपिल इनोवेशन’ (Ipil Innovation) नामक एक छोटे आईटी सेवा स्टार्टअप के तहत विकसित किया गया है।
  • इस पहल का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि तेजी से बढ़ती डिजिटल दुनिया में हो भाषा की प्रासंगिकता बनी रहे।

भाषा संरक्षण के लिए डिजिटल शब्दकोश

  • स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग के कारण, डिजिटल शब्दकोश को शुरू में डेस्कटॉप सॉफ्टवेयर के रूप में विकसित करने के बाद मोबाइल एप्लिकेशन में परिवर्तित कर दिया गया था।
  • इस एप्लिकेशन का पहला मोबाइल संस्करण 2021 में गूगल प्ले स्टोर पर जारी किया गया था।
  • यह एप्लिकेशन एक त्रिभाषी शब्दकोश के रूप में कार्य करता है जिसमें उपयोगकर्ता अंग्रेजी, हिंदी और हो भाषाओं में शब्द खोज सकते हैं।
  • ऐप में अनुवाद, उदाहरण वाक्य और ‘वारंग चित्ती’ लिपि में लिखे गए शब्द उपलब्ध हैं।

हो भाषा के बारे में

  • हो भाषा ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है और मुंडा शाखा का हिस्सा है, जिसमें संथाली भाषा भी शामिल है।
  • यह भाषा मुंडारी भाषा से निकटता से संबंधित है और मुख्य रूप से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में भी इसे बोलने वाले निवासी हैं।
  • हो या कोलहा लोग भारत के एक ऑस्ट्रो-एशियाटिक मुंडा नृजातीय समूह हैं। वे स्वयं को ‘हो’, ‘होदोको’ और ‘होरो’ कहते हैं, जिसका उनकी अपनी भाषा में अर्थ ‘मनुष्य’ होता है।
  • भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, हो भाषा बोलने वालों की संख्या 14.2 लाख से अधिक है, जिनमें से अधिकांश झारखंड में रहते हैं।

वारंग चित्ती लिपि

  • हो भाषा को लिखने के लिए वारंग चित्ती लिपि का उपयोग किया जाता है, जिसे विशेष रूप से इसी भाषा के लिए विकसित किया गया था।
  • इस लिपि को वर्ष 2014 में यूनिकोड कंसोर्टियम द्वारा ‘यूनिकोड मानक संस्करण 7.0’ में शामिल किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय डिजिटल मान्यता प्राप्त हुई।
  • यूनिकोड मानक में शामिल होने से इस लिपि का उपयोग कंप्यूटर, स्मार्टफोन और अन्य डिजिटल प्लेटफार्मों पर संभव हो गया है, जिससे हो भाषा के डिजिटल संरक्षण को बल मिला है।

लुक आउट सर्कुलर्स पर संशोधित दिशानिर्देश

संदर्भ: हाल ही में गृह मंत्रालय ने ‘लुक आउट सर्कुलर’ जारी करने के दिशा-निर्देशों में संशोधन किया है। इसका मुख्य उद्देश्य इसके दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि केवल आपराधिक क्षेत्राधिकार वाली अधिकृत एजेंसियां ही इसे जारी कर सकें।

दिशानिर्देशों में महत्वपूर्ण संशोधन

  • गृह मंत्रालय ने भारत में लुक आउट सर्कुलर जारी करने की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
  • दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि आपराधिक जांच शक्तियों के बिना सांविधिक निकाय सीधे ‘आप्रवासन ब्यूरो’ से लुक आउट सर्कुलर जारी करने का अनुरोध नहीं कर सकते।
  • इस निर्णय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि LOC केवल उचित कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से जारी किए जाएं और वैध दस्तावेजों द्वारा समर्थित हों।
  • इन निकायों को अपने अनुरोध एक अधिकृत कानून प्रवर्तन एजेंसी को भेजने होंगे, जो मामले की जांच करेगी और उसके बाद आप्रवासन ब्यूरो को अनुरोध प्रस्तुत करेगी।
  • यदि आप्रवासन ब्यूरो को अनधिकृत निकायों से सीधे ऐसे अनुरोध प्राप्त होते हैं, तो उसे अनुरोध वापस करना होगा और उन्हें संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसी से संपर्क करने की सलाह देनी होगी।
  • दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से उन संस्थाओं के नाम दिए गए हैं जिन्हें आप्रवासन ब्यूरो को सीधे LOC अनुरोध भेजने से प्रतिबंधित किया गया है।
    • राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW)
    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)
    • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR)
    • राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT)
    • ऐसा कोई भी अन्य अधिकरण जिसका आपराधिक क्षेत्राधिकार न हो

लुक आउट सर्कुलर (LOC) श्रेणियों का मानकीकरण

  • संशोधित दिशा-निर्देशों में लुक आउट सर्कुलर (LOC) के प्रारूप में तीन मानकीकृत कार्रवाई श्रेणियां शामिल की गई हैं।
  • यह श्रेणी अधिकारियों को संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लेने और मूल एजेंसी को सूचित करने का निर्देश देती है।
  • इस श्रेणी के अंतर्गत आव्रजन अधिकारियों के लिए व्यक्ति के प्रस्थान को रोकना और मूल एजेंसी को सूचित करना आवश्यक है।
  • यह श्रेणी अधिकारियों को परिस्थितियों के आधार पर आगे की कार्रवाई के लिए टिप्पणी का संदर्भ लेने का निर्देश देती है।

राष्ट्रीय राजमार्ग ग्रीन कवर इंडेक्स वार्षिक रिपोर्ट 2025–26

संदर्भ: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण और हरित आवरण का मात्रात्मक मूल्यांकन करने के लिए प्रथम ‘राष्ट्रीय राजमार्ग हरित आवरण सूचकांक वार्षिक रिपोर्ट 2025–26’ जारी की है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह रिपोर्ट भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र  (NRSC) के सहयोग से तैयार की गई थी।
  • यह पहल राष्ट्रीय राजमार्गों के ‘राइट ऑफ वे’ (Right of Way – RoW) के भीतर वनस्पति का वैज्ञानिक और मात्रात्मक मूल्यांकन प्रदान करने के लिए अंतरिक्ष-आधारित प्रौद्योगिकियों (Space-based technologies) का उपयोग करती है।
  • प्रथम मूल्यांकन के अंतर्गत जुलाई से दिसंबर 2024 की अवधि के दौरान 24 राज्यों में लगभग 30,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों को कवर किया गया।
  • यह पहल भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के बीच जनवरी 2024 में हस्ताक्षरित तीन वर्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) का हिस्सा है।
  • भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की स्थापना संसद के एक अधिनियम, NHAI अधिनियम, 1988 द्वारा की गई थी। यह “राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास, रखरखाव और प्रबंधन तथा उससे संबंधित या आनुषंगिक मामलों के लिए एक प्राधिकरण के गठन हेतु प्रावधान करने वाला अधिनियम” है।
  • राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण और हरित आवरण में सुधार की निगरानी के लिए इस सूचकांक को प्रतिवर्ष अपडेट किया जाएगा।

हरित आवरण सूचकांक (GCI)

  • हरित आवरण सूचकांक एक ऐसी माप है जो राष्ट्रीय राजमार्गों के ‘राइट ऑफ वे’ के भीतर वनस्पति द्वारा कवर की गई भूमि के प्रतिशत को मापता है।
  • यह सूचकांक क्लोरोफिल की मात्रा और वनस्पति के परावर्तन पैटर्न का पता लगाकर वनस्पति के उपग्रह-आधारित विश्लेषण से प्राप्त किया जाता है।
  • स्वस्थ वनस्पति निकट-अवरक्त विकिरण को बंजर या तनावग्रस्त भूमि की तुलना में भिन्न रूप से परावर्तित करती है, जिससे हरित आवरण की सटीक पहचान संभव हो पाती है।
  • वृक्षारोपण कवरेज का विस्तृत आकलन प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के प्रत्येक एक किलोमीटर के खंड के लिए सूचकांक की गणना की जाती है।
  • यह तकनीक-संचालित पद्धति पेड़ों की मैन्युअल गणना का स्थान लेती है और राजमार्ग हरित आवरण का अधिक वस्तुनिष्ठ और मापने योग्य मूल्यांकन प्रदान करती है।
  • ‘राष्ट्रीय राजमार्ग – हरित आवरण सूचकांक’ के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे असम (53.16%) में सबसे अधिक हरित आवरण है, जिसके बाद गुजरात (46.91%), तेलंगाना (43.57%), बिहार (42.77%) और तमिलनाडु (42.38%) का स्थान है।

NH-GCI फ्रेमवर्क के मुख्य स्तंभ

  • उपग्रह-आधारित NDVI मूल्यांकन: उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजरी पर नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (NDVI) को लागू करना, ताकि हरित आवरण को अन्य भूमि प्रकारों से अलग पहचाना जा सके।
  • 1 किमी खंडवार रिपोर्टिंग : विस्तृत स्थानिक निगरानी के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क के प्रत्येक किलोमीटर को चार श्रेणियों— खराब, मध्यम, अच्छा, और बहुत अच्छा में वर्गीकृत करना।
  • मोबाइल-आधारित फील्ड सत्यापन: ‘ग्राउंड-ट्रुथ’ सत्यापन के लिए एक समर्पित ऐप का उपयोग करना, जिसके माध्यम से राजमार्ग के दोनों ओर 4-5 स्थानों पर क्षेत्र की तस्वीरें ली जाती हैं ताकि उपग्रह डेटा का मिलान किया जा सके।
  • वेब जीआईएस एकीकरण (Bhuvan): डेटा विज़ुअलाइज़ेशन, रिपोर्टिंग और वृक्षारोपण प्रदर्शन की वास्तविक समय में निगरानी के लिए भुवनपोर्टल के माध्यम से एक केंद्रीकृत मंच प्रदान करना।
  • द्विवार्षिक परिवर्तन का पता लगाना: विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में पौधों के जीवित रहने की दर और परिपक्व कैनोपी की वृद्धि को ट्रैक करने के लिए वर्ष में दो बार वनस्पति की निगरानी करना।
  • राज्य-वार बेंचमार्किंग: क्षेत्रीय राजमार्ग इकाइयों के बीच प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए संचयी GCI मान (जैसे, उत्तराखंड 39.78, पश्चिम बंगाल 41.32) निर्धारित करना।

गोलेस्टन पैलेस

संदर्भ: हाल ही में तेहरान में स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ‘गोलेस्तान पैलेस’ की ऐतिहासिक संरचनाओं को मध्य तेहरान के निकटवर्ती आराग स्क्वायर पर हुए हालिया हवाई हमलों के कारण क्षति पहुंची।

अन्य संबंधित जानकारी

  • हवाई हमला धरोहर परिसर के यूनेस्को द्वारा नामित बफर ज़ोन के भीतर हुआ। इस क्षेत्र का निर्धारण स्थल को संभावित खतरों से बचाने और उसकी ऐतिहासिक अखंडता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से किया जाता है।
  • विस्फोटों के कारण सजावटी वास्तुशिल्प विशेषताओं, जैसे लकड़ी के दरवाजों, खिड़कियों और पारंपरिक ओरोसी (Orosi) जालीदार काम को गंभीर नुकसान पहुँचा।
    • ओरोसी (Orosi): यह एक पारंपरिक फारसी ‘सैश’ खिड़की है, जिसकी विशेषता जटिल लकड़ी की नक्काशीदार जाली और जीवंत अभिरंजित कांच का उपयोग है।
  • यूनेस्को ने औपचारिक बयान जारी कर सभी पक्षों को 1954 के हेग कन्वेंशन और 1972 के विश्व धरोहर कन्वेंशन के तहत उनके दायित्वों का स्मरण कराया। ये अंतरराष्ट्रीय संधियाँ सशस्त्र संघर्ष के दौरान सांस्कृतिक संपत्ति के संरक्षण को अनिवार्य बनाती हैं।

गोलेस्तान पैलेस के बारे में

  • गोलेस्तान पैलेस ईरान की राजधानी तेहरान में स्थित एक ऐतिहासिक शाही परिसर है।
  • इस महल परिसर को सफाविद राजवंश के दौरान बनाया गया था और काज़ार राजवंश (Qajar Dynasty) के शासनकाल में इसका उल्लेखनीय रूप से विस्तार किया गया था।
  • यह परिसर कई फारसी सम्राटों (जिसमें काज़ार काल के अंतिम शासक भी शामिल थे) के आधिकारिक निवास और औपचारिक केंद्र के रूप में उपयोग किया गया था।
  • यह महल पारंपरिक फारसी वास्तुकला और उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय कलात्मक प्रभावों के अनूठे मिश्रण को प्रदर्शित करता है।
  • इसके सांस्कृतिक महत्व के कारण, यूनेस्को द्वारा इसे वर्ष 2013 में विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।

भारत के लिए गोलेस्तान पैलेस का महत्त्व

  • इस महल में ऐतिहासिक ‘मुरक्का-ए-गुलशन’ संरक्षित है, जिसे ‘गुलशन एल्बम’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें मुगल काल के दुर्लभ चित्र, सुलेखन और चित्रकारी शामिल हैं।
  • इस एल्बम को मूल रूप से सत्रहवीं शताब्दी में मुगल सम्राट शाहजहाँ के लिए संकलित किया गया था।
  • इस संग्रह में मुगल सम्राट जहाँगीर के शासनकाल के दौरान निर्मित कलाकृतियाँ शामिल हैं और इसमें प्रसिद्ध मुगल दरबारी कलाकारों की रचनाएँ भी संकलित हैं।
  • यह एल्बम फारसी, मुगल, दक्कनी, तुर्की और यूरोपीय कला परंपराओं के मिश्रण को दर्शाती है।
  • इसलिए, इस महल और इसके संग्रह का संरक्षण भारत और फारस की सांस्कृतिक परंपराओं के बीच ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अभ्यास लामितिये 2026

संदर्भ: भारतीय सशस्त्र बलों की एक टुकड़ी संयुक्त सैन्य अभ्यास लामितिये 2026 के 11वें संस्करण में भाग लेने के लिए सेशेल्स पहुंच गई है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह अभ्यास 9 मार्च से 20 मार्च 2026 तक सेशेल्स डिफेंस एकेडमी में आयोजित किया जा रहा है।
  • भारतीय टुकड़ी में असम रेजिमेंट के कर्मियों के साथ-साथ भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना की भागीदारी शामिल है।
  • वर्तमान संस्करण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों सेनाएं (थल, वायु और जल) इस अभ्यास में एक साथ भाग ले रही हैं।

अभ्यास लामितिये के विषय में

  • अभ्यास लामितिये भारत और सेशेल्स के बीच एक द्विपक्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास है।
  • यह अभ्यास पहली बार 2001 में आयोजित किया गया था और सेशेल्स में प्रत्येक दो वर्ष में आयोजित किया जाता है।
  • यह अभ्यास भारत और सेशेल्स के बीच रक्षा संबंधों को मजबूत करने में योगदान देता है और पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री और क्षेत्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देता है।
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