चंद्रयान-4 लैंडिंग स्थल की पहचान
संदर्भ: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-4 मिशन के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में एक उपयुक्त लैंडिंग स्थल की पहचान की है।
अन्य संबंधित जानकारी

- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चंद्रयान-4 को भारत के पहले लूनर सैंपल रिटर्न मिशन (चंद्रमा से नमूने वापस लाने का मिशन) के रूप में मंजूरी दी है।
- इस मिशन को 2028 के आसपास प्रक्षेपित करने का लक्ष्य रखा गया है और यह भारत का अब तक का सबसे जटिल चंद्र मिशन हो सकता है।
- लैंडिंग स्थल चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में मॉन्स माउंटन के निकट स्थित है।
- प्रारंभ में पाँच संभावित स्थानों का परीक्षण किया गया था, जिनमें से चार को शॉर्टलिस्ट किया गया: MM 1, MM 3, MM 4 और MM 5।
- इनमें से, MM 4 को सबसे उपयुक्त लैंडिंग स्थल के रूप में चुना गया है।
- दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ जल-बर्फ और वाष्पशील पदार्थों की उपस्थिति की संभावना है।
लैंडिंग स्थल का चयन
- शॉर्टलिस्ट किए गए स्थलों की विशेषताओं का अवलोकन चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के ‘ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा’ (OHRC) से प्राप्त बहु-दृश्य छवि डेटासेट का उपयोग करके किया गया था।
- यह विश्लेषण इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था।
- मूल्यांकन में स्थलाकृतिक विशेषताओं, प्रवणता, ऊंचाई, चट्टानों के वितरण और लैंडिंग खतरों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- चयनित MM 4 स्थल के अंतर्गत 1 किमी. X 1 किमी. का क्षेत्र है जिसमें खतरे की संभावना सबसे कम है।
- इस स्थल का माध्य प्रवणता लगभग 5 डिग्री है, जो सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग के लिए उपयुक्त है।
- इस स्थल की माध्य ऊंचाई लगभग 5334 मीटर है।
- इस स्थल पर 24 मीटर X 24 मीटर के माप वाले ‘खतरा-मुक्त ग्रिडों’ की संख्या सर्वाधिक है।
- इस स्थान पर मिशन के उपकरणों को शक्ति प्रदान करने के लिए लगभग 11-12 दिनों तक पर्याप्त सूर्य का प्रकाश रहता है।
- यह स्थल पृथ्वी के साथ प्रत्यक्ष रेडियो संचार को सक्षम बनाता है और यहाँ बड़े क्रेटर (गर्त) और पत्थरों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है।
- सावधानीपूर्वक किया गया यह चयन लैंडर प्रणाली की सभी तकनीकी और सुरक्षा बाधाओं का अनुपालन सुनिश्चित करता है।
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD)
संदर्भ: हाल ही में, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) में कारगर एक उन्नत टीके के प्रथम चरण के मानव नैदानिक परीक्षण शुरू किए हैं।
अन्य संबंधित जानकारी
- क्षेत्र में बार-बार होने वाले प्रकोपों के कारण कर्नाटक सरकार के अनुरोध पर यह पहल की गई है।
- इस टीके को ‘इंडियन इम्युनोलॉजिकल लिमिटेड’ और ‘ICMR–नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। यह एक पूर्णतः स्वदेशी, दो खुराक वाला, एडजुवेंटेड इनएक्टिवेटेड (निष्क्रिय वायरस और सहायक पदार्थ से युक्त) टीका है जिसे 28 दिनों के अंतराल पर दिया जाना है।
- व्यापक प्रयोगशाला अनुसंधान के बाद टीके को सफलतापूर्वक विकसित कर लिया गया है।
- केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने प्रथम चरण के नैदानिक परीक्षणों को शुरू करने की मंजूरी दे दी है और यदि यह सुरक्षा और प्रतिरक्षा सुनिश्चित करता है, तो आगे के चरणों के क्लिनिकल ट्रायल भी किए जाएंगे।
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) के बारे में

- क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD), जिसे “मंकी फीवर” के नाम से जाना जाता है, एक टिक-जनित जूनोटिक वायरल रक्तस्रावी ज्वर है। यह ‘फ्लैविबिरिडे’ (Flaviviridae) परिवार में ‘फ्लैविवायरस’ प्रजाति के सदस्य क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज वायरस (KFDV) के कारण होता है।
- इसकी पहचान पहली बार 1957 में भारत के कर्नाटक के क्यासानूर वन क्षेत्र में की गई थी।
- यह रोग पश्चिमी घाट क्षेत्र के लिए स्थानिक है और मुख्य रूप से जनवरी और जून के बीच मौसमी प्रकोप का कारण बनता है।
- मनुष्य मुख्य रूप से संक्रमित ‘हार्ड टिक्स’, विशेष रूप से हेमाफिसलिस स्पिनिगेरा (Haemaphysalis spinigera) के काटने से संक्रमित होते हैं।
- संक्रमण संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क में आने या संक्रमित शवों के प्रबंधन से भी हो सकता है।
- बंदर, विशेष रूप से सेमनोपिथेकस एंटेलस (हनुमान लंगूर) और मकाका रेडिएटा (बोनट मकाक), संचरण चक्र में महत्वपूर्ण (amplifying hosts) के रूप में कार्य करते हैं।

राष्ट्रीय कोच प्रत्यायन बोर्ड
संदर्भ: राष्ट्रीय बैडमिंटन प्रधान कोच श्री पुलेला गोपीचंद के नेतृत्व में “भारत में कोचिंग इकोसिस्टम के विकास के लिए एकीकृत ढांचे” पर गठित टास्क फोर्स ने जनवरी 2026 में युवा मामले और खेल मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
अन्य संबंधित जानकारी
- टास्क फोर्स ने अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम अभ्यासों के अनुरूप कोच शिक्षा, प्रत्यायन और व्यावसायिक विकास को मानकीकृत करने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय कोचिंग ढांचे की सिफारिश की है।
प्रमुख सिफारिशें
- कोच शिक्षा और प्रत्यायन के लिए शीर्ष निकाय के रूप में राष्ट्रीय कोच प्रत्यायन बोर्ड (NCAB) की स्थापना।
- टास्क फोर्स ने चार स्तरों अर्थात आधारभूत, मध्यवर्ती, कुलीन और नेशनल टीम कोच (जिसमें “स्तर 0” को सार्वभौमिक प्रवेश बिंदु माना गया है) के साथ एक स्तरीकृत राष्ट्रीय कोचिंग पथ के निर्माण की सिफारिश की।
- अभ्यास–सिद्धांत–अभ्यास (Practice–Theory–Practice) मॉडल की शुरुआत, जिसमें 1,800 घंटे के प्रशिक्षण का 78% व्यावहारिक अनुभव और निर्देशित इंटर्नशिप पर केंद्रित होगा।
- “कोचों के लिए TOPS” का शुभारंभ, जो टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) से प्रेरित है। इसका उद्देश्य उच्च प्रदर्शन करने वाले कोचों को वित्तीय सहायता, अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रौद्योगिकी तक पहुंच प्रदान करना है।
- इस ढांचे को राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचे (NSQF) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के साथ एकीकृत करना।
- अनिवार्य लाइसेंसिंग, नवीनीकरण तंत्र और निरंतर व्यावसायिक विकास (CPD)।
- प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन और प्रोत्साहन संरचनाएं।
राष्ट्रीय कोच प्रत्यायन बोर्ड (NCAB)
- NCAB कोच शिक्षा और प्रत्यायन के लिए राष्ट्रीय मानक निर्धारित करने, कोचिंग के पथों को अनुमोदित करने एवं निगरानी करने तथा कोच शिक्षा संस्थानों को मान्यता प्रदान करने वाली शीर्ष संस्था होगी।
- NCAB सभी खेलों में एक एकीकृत कोर पाठ्यक्रम तैयार करेगा, कोचों के लाइसेंस और उनके नवीनीकरण की देखरेख करेगा तथा NSQF एवं NEP 2020 के अनुरूप गुणवत्ता आश्वासन सुनिश्चित करेगा।
भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेषों की भारत वापसी
संदर्भ: श्रीलंका में अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन के पश्चात भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरीअवशेषों की भारत वापसी हुई हैं। यह भारत-श्रीलंका बौद्ध संबंधों को प्रगाढ़ करता है और वैश्विक बौद्ध विरासत के संरक्षण में भारत के योगदान को रेखांकित करता है।
अन्य संबंधित जानकारी

- इन अवशेषों को 4 से 10 फरवरी 2026 तक कोलंबो के गंगारामया मंदिर में दिखाया गया था और वे 11 फरवरी 2026 को भारत वापस लाए गए।
- यह देवनीमोरी अवशेषों की पहली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी है।
- सात दिवसीय सार्वजनिक वंदना के दौरान दस लाख से अधिक भक्तों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए।
- साझा बौद्ध विरासत को उजागर करने के लिए ‘पवित्र पिपरहवा का अनावरण’ और ‘पवित्र अवशेष और समकालीन भारत का सांस्कृतिक जुड़ाव’ नामक विशेष प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं।
- ये अवशेष मूल रूप से गुजरात के देवनीमोरी में खोजे गए थे और भारत की प्राचीन बौद्ध विरासत से संबंधित हैं।
प्रदर्शनी का महत्व
- इस आयोजन ने बौद्ध धर्म पर आधारित भारत और श्रीलंका के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत और आध्यात्मिक संबंधों को मजबूत किया।
- इसने वैश्विक बौद्ध विरासत के अभिरक्षक के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ किया।
- इसने दोनों देशों की जनता के बीच संपर्क और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा दिया।
- अवशेषों की वापसी साझा विश्वास, कृतज्ञता और पारस्परिक सम्मान का प्रतीक है।
देवनीमोरी अवशेषों के बारे में
- देवनीमोरी स्थल की खुदाई 1957 में पुरातत्वविद् प्रो. एस. एन. चौधरी द्वारा की गई थी ।
- ये अवशेष गुजरात में एक बौद्ध स्तूप परिसर के भीतर पाए गए थे।
- अवशेष रखने वाली मंजूषा हरे शिस्ट पत्थर से बनी है और इस पर “दशबल शरीर निलय” अंकित है, जिसका अर्थ है – “भगवान बुद्ध के शारीरिक अवशेषों का निवास”।
- ये अवशेष वर्तमान में महाराज सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में संरक्षित हैं।
