भारत में मृत्युदंड

संदर्भ: हैदराबाद स्थित नालसर (NALSAR) विधि विश्वविद्यालय के ‘द स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले तीन वर्षों में किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की है। यह मृत्युदंड के प्रति न्यायपालिका की गहन न्यायिक समीक्षा को दर्शाता है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह रिपोर्ट वर्ष 2016 से 2025 के बीच राष्ट्रव्यापी मृत्युदंड के आंकड़ों का विश्लेषण करती है।
  • यह निचली अदालतों (trial courts) द्वारा दी जाने वाली सजा और अपीलीय न्यायालयों द्वारा की जाने वाली समीक्षा के बीच बढ़ते अंतर को रेखांकित करती है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • लगातार तीसरे वर्ष (2023-2025) सर्वोच्च न्यायालय ने एक भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की है।
  • वर्ष 2025 में, सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड वाले 10 कैदियों को दोषमुक्त किया, जो एक दशक में सर्वाधिक संख्या है।
  •  वर्ष 2016 से 2025 के बीच भारत भर में सत्र न्यायालयों ने 1,310 मृत्युदंड  दिए। अकेले वर्ष 2025 में ही 128 मृत्युदंड दिए गए।
  • उच्च न्यायालयों ने केवल 8.31% मृत्युदंड की पुष्टि की, जबकि दोषमुक्ति और सजा के लघुकरण के मामलों की संख्या पुष्टि किए गए मामलों से कहीं अधिक रही।
  • हाल के वर्षों में उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि किए गए एक भी मृत्युदंड को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार नहीं रखा है।

मृत्युदंड (Capital Punishment)

मृत्युदंड भारत में सर्वोच्च कानूनी दंड है, जो केवल “दुर्लभतम से दुर्लभ” (rarest of rare) मामलों के लिए आरक्षित है।

  • दुर्लभतम से दुर्लभसिद्धांत: बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) मामले में स्थापित इस सिद्धांत के अनुसार मृत्युदंड केवल तभी दिया जाना चाहिए जब आजीवन कारावास निर्विवाद रूप से अपर्याप्त हो।
  • कानूनी ढांचा: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2024, जिसने IPC का स्थान लिया है, मृत्युदंड को बरकरार रखती है। इसमें मॉब लिंचिंग और मृत्यु का कारण बनने वाले संगठित अपराध जैसे कुछ नए अपराधों के लिए भी मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है।
  • निष्पादन की विधि: गले में फंदा डालकर फांसी देना; सैन्य कानूनों के तहत गोली मारने की भी अनुमति है।
  • वर्तमान स्थिति: 31 दिसंबर 2025 तक, भारत में मृत्युदंड की सजा पाए 574 कैदी (550 पुरुष, 24 महिलाएं) थे, जो 2016 के बाद सबसे अधिक संख्या है।

लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पारित

संदर्भ: विपक्ष के निरंतर विरोध के बीच लोकसभा ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ को ध्वनि मत से पारित कर लिया है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 28 जनवरी 2026 को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया था।
  • निरंतर व्यवधान के कारण, प्रधानमंत्री के पारंपरिक उत्तर के बिना ही 5 फरवरी को यह प्रस्ताव पारित कर दिया गया।
  • प्रस्ताव पारित होने के समय प्रधानमंत्री सदन में उपस्थित नहीं थे।
  • प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने का पिछला उदाहरण जून 2004 में सामने आया था।
  • यह घटनाक्रम विधायी गरिमा और संसदीय कामकाज की कार्यप्रणाली से संबंधित चिंताओं को रेखांकित करता है।

धन्यवाद प्रस्ताव के बारे में

  • धन्यवाद प्रस्ताव भारतीय संसद में राष्ट्रपति के ‘विशेष अभिभाषण’ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पेश किया गया एक औपचारिक संकल्प है।
  • धन्यवाद प्रस्ताव संवैधानिक अधिदेशों और आंतरिक संसदीय नियमों के संयोजन द्वारा शासित होता है:
  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 87 के अंतर्गत, राष्ट्रपति के लिए प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र की शुरुआत में और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करना अनिवार्य है।
  • अनुच्छेद 87(2) यह अनिवार्य करता है कि संसद का प्रत्येक सदन राष्ट्रपति के अभिभाषण में संदर्भित मामलों पर चर्चा के लिए प्रावधान करेगा, जिसे ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ के माध्यम से संपन्न किया जाता है।
  • प्रक्रिया के नियम
  • लोकसभा: यह लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली के नियम 16 से 24 द्वारा शासित है। विशेष रूप से नियम 17 यह अनिवार्य करता है कि प्रस्ताव प्रधानमंत्री द्वारा चयनित सदस्यों द्वारा प्रस्तुत और उसका समर्थन किया जाए।
  • राज्यसभा: यह राज्यसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली के नियम 14 से 21 द्वारा शासित है।

16वाँ वित्त आयोग: कर हस्तांतरण में संशोधित वन मानदंड

संदर्भ: हाल ही में, 16वें वित्त आयोग ने क्षैतिज कर हस्तांतरण में वनों के मानदंड को संशोधित किया है। इसमें ‘खुले वनों’ को शामिल किया गया है और वन घनत्व के आधार पर अलग-अलग भारांक निर्धारित किए गए हैं।

अन्य संबंधित जानकारी

  • इस परिवर्तन का उद्देश्य राज्यों को वन क्षेत्र में वृद्धि के साथ राजकोषीय पुरस्कारों को जोड़कर वन आवरण के विस्तार और संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करना है।
  • यह पहाड़ी और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की लागत संबंधी अक्षमताओं को भी संबोधित करता है, जिससे पारिस्थितिक प्रबंधन सुदृढ़ होगा और आपदा जोखिम न्यूनीकरण में सुधार होगा।
  • आयोग द्वारा किया गया एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन दावानल को उन 10 खतरों में स्पष्ट रूप से शामिल करना है, जिनका उपयोग अद्यतन आपदा जोखिम सूचकांक (DRI) निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
    • DRI एक ऐसा उपकरण है जो भूकंप, बाढ़ और उष्णकटिबंधीय चक्रवात जैसे प्राकृतिक खतरों से जीवन की हानि, चोट या आर्थिक विनाश की संभावना का आकलन, मापन और मानचित्रण करता है।
  • आयोग 2015-2023 के बीच वन क्षेत्र की हिस्सेदारी और वृद्धि पर विचार करता है।
  • प्रति राज्य न्यूनतम क्षेत्र तल 2% से घटाकर 1.5% कर दिया गया है।

वन क्षेत्र की गणना में किए गए परिवर्तन

  • 16वें वित्त आयोग ने कुल वन क्षेत्र के निर्धारण में ‘खुले वनों’ को भी शामिल किया है। इसके विपरीत, 15वें वित्त आयोग ने केवल सघन और मध्यम सघन वनों पर विचार किया था और इस मानक (पैरामीटर) को केवल कुल वन क्षेत्र में हिस्सेदारी के रूप में परिभाषित किया गया था।
  • अत्यधिक सघन वन (VDF): 70 प्रतिशत और उससे अधिक वितान घनत्व (canopy cover) वाले क्षेत्र।
  • मध्यम सघन वन (MDF): 40-70 प्रतिशत वितान घनत्व वाले क्षेत्र।
  • खुले वन (OF): 10-40 प्रतिशत वितान घनत्व वाले क्षेत्र।

केंद्र सरकार ने खुले वनों के लिए 0.30, मध्यम सघन वनों के लिए 0.65 और अत्यधिक सघन वनों के लिए 1.0 का भारांक निर्धारित करके एक ‘भारित वन क्षेत्र’ (weighted forest area) परिभाषित किया है।

महत्व

  • यह राजकोषीय हस्तांतरण को जलवायु कार्रवाई और जैव विविधता लक्ष्यों के अनुरूप बनाता है।
  • यह परिणाम-आधारित पर्यावरणीय शासन को बढ़ावा देता है।
  • यह आपदा जोखिम न्यूनीकरण में सुधार करता है।

जियो पारसी योजना

संदर्भ: हाल ही में, जियो पारसी योजना के अंतर्गत 490 से अधिक बच्चों के जन्म में सहायता प्रदान की गई है तथा ₹35.05 करोड़ की धनराशि राजकोषीय सहायता के रूप में वितरित की गई है।

जियो पारसी योजना के बारे में

  • यह अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा भारत में पारसी समुदाय की घटती जनसंख्या को रोकने के लिए वर्ष 2013-14 में शुरू की गई एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है।
  • यह अपनी तरह का पहला जनसांख्यिकीय हस्तक्षेप है जिसमें पारसी जनसंख्या को स्थिर करने और धीरे-धीरे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक, चिकित्सा और सामाजिक उपायों को अपनाया गया है।
  • उद्देश्य:
    • पारसी समुदाय के भीतर प्रजनन संबंधी चुनौतियों का समाधान करना।
    • बच्चे के जन्म, बाल देखभाल और बुजुर्गों की देखभाल से जुड़े वित्तीय बोझ को कम करना।
    • प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित जागरूकता, परामर्श और व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देना।
    • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से लाभों का पारदर्शी और लक्षित वितरण सुनिश्चित करना।

योजना की प्रकृति

  • यह 100% केंद्रीय क्षेत्र की योजना है।
  • इसे राज्य सरकारों और पारसी संस्थानों के सहयोग से कार्यान्वित किया जाता है।
  • बायोमेट्रिक और आधिकारिक सत्यापन के बाद लाभ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से हस्तांतरित किए जाते हैं।
  • इसे 15वें वित्त आयोग चक्र (2021-22 से 2025-26) के दौरान कार्यान्वित किया गया है।

योजना के तीन घटक:

  • चिकित्सा सहायता: सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकियों (ART) के माध्यम से प्रजनन संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे युगलों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  • समुदाय का स्वास्थ्य: इसका लक्ष्य बच्चों के पालन-पोषण और बुजुर्ग आश्रितों की देखभाल से जुड़े आर्थिक बाधाओं को दूर करना है।
  • उद्देश्य और आउटरीच: प्रजनन क्षमता और सामुदायिक स्वास्थ्य का समर्थन करने के लिए सामाजिक और व्यवहारिक हस्तक्षेपों पर ध्यान केंद्रित करती है।

पारसी समुदाय के बारे में

  • पारसी जरथुस्त्रवाद (Zoroastrianism) के अनुयायी हैं, जो प्राचीन ईरानी पैगंबर जरथुस्त्र (जिन्हें जोरोस्टर भी कहा जाता है) की शिक्षाओं पर आधारित है।
  • पारसी अपने वंश की उत्पत्ति उन फारसी जरथुस्त्रवादियों से मानते हैं जिन्होंने फारस पर इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए भारत प्रवास किया था। यह प्रवास पारंपरिक रूप से 8वीं शताब्दी में माना जाता है, हालांकि कुछ विद्वान इसे 10वीं शताब्दी या कई चरणों में हुआ मानते हैं।
  • पारसी सामान्यतः दैनिक जीवन में गुजराती और अंग्रेजी बोलते हैं; अवेस्तन उनकी कोई मातृभाषा या बोलचाल की भाषा नहीं है, बल्कि एक धार्मिक अनुष्ठान की भाषा है जिसका उपयोग विशेष रूप से धार्मिक विधियों के लिए किया जाता है।
  • अवेस्ता जरथुस्त्रवाद के पवित्र ग्रंथों का प्राथमिक संग्रह है, जिसमें भजन, अनुष्ठान और सैद्धांतिक शिक्षाएँ शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 2(c) के तहत मुस्लिमों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों और जैनों के साथ जरथुस्त्रवादियों (पारसी) को अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अधिसूचित किया गया है।

आपराधिक रिकॉर्ड साझाकरण पर भारत-यूके समझौता ज्ञापन

संदर्भ: हाल ही में, भारत और यूनाइटेड किंगडम ने आपराधिक न्याय और आंतरिक सुरक्षा में द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करने के लिए गृह मंत्रालय के तत्वावधान में आपराधिक रिकॉर्ड साझाकरण (CRS) पर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

समझौता ज्ञापन (MoU) की मुख्य विशेषताएँ

  • यह आपराधिक रिकॉर्ड, उंगलियों के निशान (फिंगरप्रिंट) और कानून प्रवर्तन खुफिया जानकारी के रियल टाइम विनिमय को सक्षम बनाता है।
  • यह भारत की केंद्रीय एजेंसियों को ज्ञात अपराधियों, गंभीर अपराधियों और यौन अपराधियों से संबंधित सत्यापित डेटा तक पहुँच प्रदान करता है।
  • इसका उद्देश्य सीमा पार जांच की गति, सटीकता और प्रभावशीलता में सुधार करना है।

संबंधित घटनाक्रम

  • जुलाई 2024 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भ्रष्टाचार, गंभीर धोखाधड़ी और संगठित अपराध पर सहयोग करने के लिए यूनाइटेड किंगडम की ‘नेशनल क्राइम एजेंसी’ (NCA) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे।
  • इसके अतिरिक्त, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत और नेपाल के बीच आपराधिक मामलों में पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (MLAT) पर हस्ताक्षर करने को मंजूरी दी, जिस पर 24 दिसंबर 2025 को हस्ताक्षर किए गए।

महत्व

  • यह संगठित अपराध और यौन अपराधों सहित पार-राष्ट्रीय अपराधों से निपटने की भारत की क्षमता को सुदृढ़ करता है।
  • यह औपचारिक कानूनी ढांचे के माध्यम से संस्थागत कानून-प्रवर्तन सहयोग को बढ़ाता है।
  • यह विभिन्न न्यायक्षेत्रों में साक्ष्य साझाकरण, जांच और अभियोजन में सुधार करता है।
  • यह मजबूत अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा साझेदारी बनाने की भारत की व्यापक रणनीति को दर्शाता है।

पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (MLAT) के बारे में

  • पारस्परिक कानूनी सहायता (MLA) एक औपचारिक तंत्र है जो देशों को आपराधिक जांच और अभियोजन में सहयोग करने में सक्षम बनाता है, विशेष रूप से तब जब साक्ष्य या अपराध की आय विदेश से प्राप्त हो।
  • इस तरह का सहयोग आम तौर पर देशों के बीच द्विपक्षीय संधियों या समझौतों के माध्यम से किया जाता है।
  • विरासत संबंधी अपराधों, वित्तीय अपराधों और पार-राष्ट्रीय जांच से जुड़े मामलों में MLAT का उपयोग निरंतर बढ़ रहा है।

संयुक्त राष्ट्र सामाजिक विकास आयोग (CSocD)

 संदर्भ: हाल ही में, भारत ने 100 से अधिक संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों की उपस्थिति वाले सामाजिक विकास आयोग के 64वें सत्र में समावेशी और अधिकार-आधारित सामाजिक विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुन: दोहराया।

संयुक्त राष्ट्र सामाजिक विकास आयोग (CSocD) के बारे में

  • यह संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) के अंतर्गत एक आयोग है।
  • इसका मुख्य दायित्व सामाजिक विकास के विषयों पर संयुक्त राष्ट्र को परामर्श देना है।
  • यह आयोग उन सामाजिक नीतियों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो संयुक्त राष्ट्र के समग्र विकास लक्ष्यों का समर्थन करती हैं।
  • यह विशेष रूप से निर्धनता उन्मूलन, सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने और सभी के लिए पूर्ण रोजगार एवं गरिमापूर्ण कार्य सुनिश्चित करने से संबंधित है।

CSocD का विकास

  • वर्ष 1995 में कोपेनहेगन में आयोजित सामाजिक विकास के लिए विश्व शिखर सम्मेलन के बाद से, सामाजिक विकास आयोग ‘कोपेनहेगन घोषणा और कार्य योजना’ के अनुवर्तन और कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी प्रमुख संयुक्त राष्ट्र निकाय है।
  • इसकी स्थापना वर्ष 1946 में आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) के प्रस्ताव 10 (II) द्वारा की गई थी। प्रारंभ में इसे ‘सामाजिक आयोग’ के रूप में जाना जाता था, जिस्जा 1966 में पुन: नामकरण किया गया।
  • यह सामान्य सामाजिक नीतियों और उन सामाजिक विषयों पर ECOSOC को परामर्श देता है जो विशिष्ट अंतर-सरकारी एजेंसियों के कार्यक्षेत्र में नहीं आते हैं।
  • सदस्यता: प्रारंभ में इसकी सदस्य संख्या 18 थी, जिसे कई बार बढ़ाया गया। अंतिम बार इसमें 1996 में संशोधन किया गया।  वर्तमान में इसकी सदस्य संख्या 46 है।
  • मुख्यालय: आयोग की बैठक प्रतिवर्ष न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सामान्यतः फरवरी माह में बुलाई जाती है।
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