OPEC+ ने तेल के उत्पादन को स्थिर रखने पर सहमति जताई
संदर्भ:
सदस्य देशों के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद, OPEC + 2026 की पहली तिमाही तक के लिए तेल के उत्पादन को स्थिर रखने के अपने निर्णय की पुष्टि कर सकता है।
अन्य संबंधित जानकारी
- पिछली बार उत्पादन बढ़ाए जाने के बाद अब यह फैसला लिया गया है, जो वैश्विक बाजार में तेल की अधिक आपूर्ति और गिरती कीमतों को लेकर बढ़ती चिंताओं को उजागर करता है।
- यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया, पूर्वी यूरोप और लैटिन अमेरिका भू-राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं।
- ओपेक+ के आठ देशों सऊदी अरब, रूस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कजाकिस्तान, कुवैत, इराक, अल्जीरिया और ओमान ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया है।
- नवंबर 2025 में, इन देशों ने जनवरी, फरवरी और मार्च के लिए उत्पादन में और अधिक वृद्धि पर रोक लगाने का निर्णय लिया था।
- ये देश समग्र रूप से विश्व की कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग आधे हिस्से का उत्पादन करते हैं।
- अप्रैल और दिसंबर 2025 के बीच, उन्होंने उत्पादन लक्ष्य में प्रतिदिन लगभग 2.9 मिलियन बैरल की वृद्धि की थी।
पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन प्लस (OPEC+)
- OPEC+ ओपेक के 12 सदस्य देशों और 10 गैर-ओपेक तेल उत्पादक देशों का एक शक्तिशाली गठबंधन है। इसका गठन 2016 के अंत में किया गया था।
- OPEC (पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन) एक स्थायी, अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका गठन सितंबर 1960 में बगदाद सम्मेलन के दौरान किया गया था।
- यह समूह वैश्विक कीमतों को स्थिर रखने और बाजार की आपूर्ति का प्रबंधन करने के लिए कच्चे तेल के उत्पादन का समन्वय करता है।
- जनवरी 2026 तक, ओपेक के 12 सदस्य देश हैं: अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला।
- OPEC+ ऑस्ट्रिया के वियना में स्थित मौजूदा ओपेक मुख्यालय को ही अपने ऑपरेशनल बेस के तौर पर इस्तेमाल करता है। ध्यातव्य है कि 1965 में जिनेवा से स्थानांतरित होने के बाद से यह यहीं स्थित है।
रानी वेलु नचियार की जयंती
संदर्भ:
प्रधानमंत्री ने रानी वेलु नचियार की जयंती (3 जनवरी) के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
रानी वेलु नचियार के बारे में

- उनका जन्म 3 जनवरी, 1730 को हुआ था। वे वर्तमान तमिलनाडु के रामनाथपुरम (रामनाड) साम्राज्य के राजा और रानी की इकलौती संतान थीं।
- छोटी आयु से ही उन्होंने अस्त्र-शस्त्र, तीरंदाजी और घुड़सवारी का प्रशिक्षण प्राप्त किया और उन्होंने सिलंबम (लाठी चलाना) तथा वलारी (हथियार फेंकना) जैसी युद्ध कलाओं (मार्शल आर्ट्स) में महारत हासिल की।
- वे सुशिक्षित थीं और तमिल, अंग्रेजी, फ्रेंच तथा उर्दू सहित कई भाषाओं में निपुण थीं।
- विवाह के पश्चात, वे शिवगंगा की रानी बनीं जहाँ के राजा उनके पति मुथु वडुगनाथ पेरियाउदैया थेवर थे।
- 1772 में, अर्कोट के नवाब के सहयोग से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने शिवगंगा पर आक्रमण कर दिया और इस युद्ध के दौरान उनके पति की मृत्यु हो गई।
- इस पराजय के बाद, रानी वेलु नचियार और उनकी पुत्री को निर्वासित कर दिया गया और वे लगभग आठ वर्षों तक डिंडीगुल के निकट गोपाल नायक के संरक्षण में रहीं।
- अपने निर्वासन काल के दौरान, उन्होंने एक प्रशिक्षित सेना तैयार करने के लिए मैसूर के हैदर अली के साथ एक महत्वपूर्ण गठबंधन सहित अन्य रणनीतिक गठबंधन बनाकर अपनी शक्ति को पुनर्गठित किया।
- 1780 में, उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ एक निर्णायक सैन्य अभियान का नेतृत्व किया और सफलतापूर्वक शिवगंगा साम्राज्य को पुनः हासिल कर लिया।
- उन्होंने ‘वीरमंगई’ की उपाधि हासिल की, जिसका अर्थ है ‘वीर महिला’, और वे 1857 के विद्रोह से दशकों पहले ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को सफलतापूर्वक चुनौती देने वाली पहली भारतीय रानी बनीं।
- अपने सैन्य संगठन के हिस्से के रूप में, उन्होंने ‘उदैयाल’ की स्थापना की, जो इतिहास में ज्ञात सबसे शुरुआती महिला सेना इकाइयों में से एक थी।
- उनकी विश्वसनीय सेनापति, कुयिली ने अभियान के दौरान ब्रिटिश गोला-बारूद के भंडार को नष्ट करने के लिए स्वयं जलकर एक ऐतिहासिक आत्मघाती हमला किया।
- रानी वेलु नचियार ने 1790 तक शिवगंगा पर शासन किया, अपने सत्ता को मजबूत किया और क्षेत्र में स्थिरता बहाल की।
- 25 दिसंबर, 1796 को उनका निधन हो गया, और उन्होंने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के शुरुआती प्रतिरोध में एक अग्रणी व्यक्तित्व के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
- भारतीय डाक ने 2008 में रानी वेलु नचियार के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।
केंद्र ने डीप टेक स्टार्टअप्स के लिए DSIR मानदंडों में छूट दी
संदर्भ:
हाल ही में, केंद्र सरकार ने डीप-टेक स्टार्टअप्स को वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) के पात्रता मानदंडों में छूट दी। इसका उद्देश्य डीप-टेक स्टार्टअप्स के शुरुआती चरणों में उनकी सार्वजनिक वित्त पोषण तक पहुंच को सुगम बनाना और भारत के नवाचार इकोसिस्टम को गति देना है।
अन्य संबंधित जानकारी
- केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री ने डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए अनिवार्य तीन साल की व्यवहार्यता आवश्यकता को समाप्त करने की घोषणा की।
- यह निर्णय की घोषणा नई दिल्ली में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) के 42वें स्थापना दिवस के दौरान की गई।
- यह छूट ‘औद्योगिक अनुसंधान और विकास संवर्धन कार्यक्रम’ के तहत ₹1 करोड़ तक की वित्तीय सहायता पर मिलेगी।
- पहले, DSIR सहायता के लिए पात्रता हेतु स्टार्टअप्स को न्यूनतम तीन वर्षों तक अपनी निरंतरता और व्यवहार्यता प्रदर्शित करना आवश्यक था।
- इस बदलाव के साथ, शुरुआती चरण के डीप-टेक स्टार्टअप अब तीन साल का समय पूरा किए बिना भी वित्तपोषण प्राप्त कर सकते हैं।
- इस सुधार का उद्देश्य विलक्षण नवप्रवर्तकों के स्टार्टअप्स को गति देना और प्रौद्योगिकी आधारित उद्यमिता में तेजी लाना है।
- सरकार ने स्पष्ट किया कि तकनीकी परिपक्वता से जुड़े मूल्यांकन मानक पहले की तरह ही रहेंगे।
- यह कदम ₹1 लाख करोड़ के ‘अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष’ का पूरक है, जो अधिक परिपक्व प्रौद्योगिकियों के लिए सहायता प्रदान करता है।
- यह छूट उन डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए प्रवेश बाधाओं को कम करती है, जिन्हें लंबी विकास अवधि के कारण प्रारंभिक पूंजी सहायता की आवश्यकता होती है।
वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR)
- DSIR की स्थापना 1985 में की गई थी। यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत एक सरकारी विभाग है।
- यह भारत में स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, उसके उपयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है।
- वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली
संदर्भ:
पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के सतत विकास और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, पेंशन कवरेज को बढ़ाने और प्रशासन को मजबूत करने के लिए प्रमुख नीतिगत सुधारों को मंजूरी दी है।
अन्य संबंधित जानकारी
- पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) को मजबूत करने और इसका विस्तार करने के लिए अपनी बोर्ड बैठक में नीतिगत सुधारों को सैद्धांतिक मंजूरी दी।
- वित्त मंत्रालय ने घोषणा की कि इन सुधारों का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, ग्राहकों के हितों की रक्षा करना और NPS की पहुंच का विस्तार करना है।
- एक प्रमुख सुधार के रूप में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को NPS संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्वतंत्र रूप से पेंशन फंड प्रायोजित करने की अनुमति दी गई है।
- यह बदलाव उन पिछले नियामक प्रतिबंधों को समाप्त करता है जिन्होंने पेंशन इकोसिस्टम में बैंकों की भागीदारी को सीमित कर दिया था।
- बैंक-प्रायोजित पेंशन फंडों की पात्रता आरबीआई (RBI) के मानदंडों के अनुरूप नेट वर्थ, बाजार पूंजीकरण और विवेकपूर्ण सुदृढ़ता (Prudential soundness) पर आधारित होगी।
- विस्तृत पात्रता मानदंड अलग से अधिसूचित किए जाएंगे और ये नए तथा मौजूदा दोनों पेंशन फंडों पर लागू होंगे।
राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS)
- राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) एक सरकारी सहायता प्राप्त, बाजार आधारित ‘निश्चित अंशदान सेवानिवृत्ति योजना’ है, जो पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) द्वारा विनियमित होती है।
- NPS को भारत सरकार द्वारा 2004 में व्यक्तियों के कामकाजी जीवन के दौरान व्यवस्थित और नियमित बचत को सक्षम करने के लिए शुरू किया गया था, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद एक स्थिर और पर्याप्त आय सुनिश्चित की जा सके।
पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA)
- यह पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2013 के तहत स्थापित एक सांविधिक नियामक निकाय है, जो भारत में पेंशन क्षेत्र के समग्र पर्यवेक्षण, विनियमन और विकास के लिए जिम्मेदार है।
- यह वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, और इसका उद्देश्य पेंशन फंड ग्राहकों के हितों की रक्षा करके वृद्धावस्था आय सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
- पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
‘सूर्यास्त्र’ लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर सिस्टम
संदर्भ:
भारतीय सेना ने अपनी ‘डीप-स्ट्राइक’ तोपखाना क्षमताओं को बढ़ाने के लिए स्वदेशी लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर सिस्टम ‘सूर्यास्त्र’ के लिए पुणे स्थित NIBE लिमिटेड के साथ ₹293 करोड़ के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं।
अन्य संबंधित जानकारी
- यह अनुबंध ‘सूर्यास्त्र’ नामक एक बहुविध लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर सिस्टम के निर्माण और आपूर्ति के लिए किया गया है, जिसे इज़राइली रक्षा दिग्गज ‘एल्बिट सिस्टम्स’ (Elbit Systems) के सहयोग से विकसित किया गया है।
- यह प्रणाली कई मोर्चों पर भारतीय सेना की ‘डीप-स्ट्राइक’ (सटीक मारक क्षमता) और परिचालन पहुंच को बढ़ाएगी।
- NIBE लिमिटेड ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के माध्यम से इसकी आधिकारिक जानकारी दी है।
- इस अनुबंध में लॉन्चर, ग्राउंड सपोर्ट उपकरण, एक्सेसरीज़, इलेक्ट्रॉनिक सीक्वेंस प्रोग्रामिंग यूनिट और कस्टमाइज्ड गोला-बारूद शामिल हैं।
- यह अधिग्रहण रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) के 26 दिसंबर, 2025 के उस निर्णय के बाद हुआ है, जिसमें आपातकालीन खरीद शक्तियों को 15 जनवरी, 2026 तक बढ़ाने की मंजूरी दी गई थी।
- इन प्रावधानों के तहत, सशस्त्र बल ₹300 करोड़ तक की प्रणालियों की खरीद कर सकते हैं, जिनकी डिलीवरी छह महीने के भीतर शुरू होनी चाहिए और एक वर्ष के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।
- यह सौदा जुलाई 2025 में NIBE लिमिटेड और एल्बिट सिस्टम्स (Elbit Systems) के बीच भारत में लाइसेंस प्राप्त विनिर्माण के लिए हस्ताक्षरित तकनीकी सहयोग समझौते (TCA) पर आधारित है।
सूर्यास्त्र प्रणाली: मुख्य विशेषताएँ और क्षमताएँ

- सूर्यास्त्र भारत का पहला स्वदेशी ‘यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर’ रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है।
- यह प्रणाली 150 किमी और 300 किमी की दूरी तक सटीक सतह-से-सतह हमले करने में सक्षम है।
- इसे अलग-अलग दूरी पर स्थित कई लक्ष्यों को एक साथ निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- परीक्षणों के दौरान लॉन्चर ने पांच मीटर से कम का ‘सर्कुलर एरर प्रोबेबल’ (CEP) प्रदर्शित किया, जो इसकी उच्च सटीकता को दर्शाता है।
- यह एक ही प्लेटफॉर्म से कई प्रकार के रॉकेट दागने में सक्षम है, जिससे युद्ध के मैदान में लचीलापन बढ़ जाता है।
- यह प्रणाली लगभग 100 किमी. की सीमा तक आत्मघाती ड्रोन (loitering munitions) लॉन्च करने में भी सक्षम है।
- सूर्यास्त्र, एल्बिट सिस्टम्स की प्रमाणित ‘PULS’ लॉन्चर तकनीक पर आधारित है, जिसे भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया गया है।
- यह ‘एरिया सैचुरेशन फायर’ (एक बड़े क्षेत्र में भारी गोलाबारी) और ‘लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन स्ट्राइक’ (लंबी दूरी के सटीक हमले) दोनों में सक्षम है।
पवित्र पिपरहवा अवशेषों की भव्य अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी
संदर्भ:
हाल ही में, प्रधानमंत्री ने भगवान बुद्ध के पिपरहवा अवशेषों को प्रदर्शित करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। उल्लेखनीय है कि इन अवशेषों को 127 वर्षों के बाद भारत वापस लाया गया है।
अन्य संबंधित जानकारी

- संस्कृति मंत्रालय ने नई दिल्ली में स्थित ‘राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर’ में लगी इस प्रदर्शनी की मेजबानी की।
- इस प्रदर्शनी का शीर्षक “द लाइट एंड द लोटस: रिलिक्स ऑफ द अवेकनड वन” (The Light and the Lotus: Relics of the Awakened One) था।
- यह आयोजन 2025 में वापस लाए गए पिपरहवा के ‘रत्न अवशेषों’ के साथ, पूर्व में 1898 और 1971-1975 के दौरान खुदाई में मिले अवशेषों और अस्थि-मंजूषाओं की वापसी का प्रतीक था।
- इन अवशेषों की स्वदेश वापसी जुलाई 2025 में एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से संभव हुई, जिसके तहत एक अंतर्राष्ट्रीय नीलामी को रोककर इन्हें पुनः प्राप्त किया।
- इस प्रदर्शनी में पहली बार उन पवित्र वस्तुओं को एक साथ प्रदर्शित किया गया जो खोज के बाद से विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों में अलग-अलग संरक्षित थीं।
- इसमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान काल तक की अस्सी से अधिक वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया।
- प्रदर्शित वस्तुओं में मूर्तियां, पांडुलिपियाँ, थांगका (thangkas), अनुष्ठान से जुड़ी वस्तुएं और पुरातात्विक सामग्रियां शामिल थीं।
- इस प्रदर्शनी ने बौद्ध धर्म की जन्मस्थली और वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक भूमि के रूप में भारत की भूमिका को और सुदृढ़ किया।
पिपरहवा अवशेष प्रदर्शनी के मुख्य बिंदु
- इन पवित्र अवशेषों की खोज मूल रूप से 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने कपिलवस्तु के प्राचीन स्तूप स्थल पर की थी।
- पिपरहवा अवशेष पवित्र बौद्ध कलाकृतियां हैं जो भारत के उत्तर प्रदेश में पिपरहवा स्तूप में मिली थीं। पुरातत्वविदों द्वारा इस स्थान की पहचान गौतम बुद्ध की मातृभूमि प्राचीन ‘कपिलवस्तु’ के रूप में की जाती है।
- इन अवशेषों को ऐतिहासिक बुद्ध के अस्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण भौतिक प्रमाणों में से एक माना जाता है।
- औपनिवेशिक काल के दौरान इन अवशेषों के कुछ हिस्सों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वितरित कर दिया गया था।
- इनका एक हिस्सा कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में संरक्षित किया गया था, जबकि अन्य हिस्सों को विदेश ले जाया गया था।
- प्रदर्शनी में भारतीय संग्रहालय कोलकाता से लाई गई अस्थि-मंजूषाएं और जवाहरात शामिल थे।
- इसमें उस मूल एकाश्म पत्थर के संदूक का भी प्रदर्शन किया गया था जिसमें ये अवशेष मिले थे।
