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सामान्य अध्ययन-2: गरीबी एवं भुखमरी से संबंधित मुद्दे; स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधन से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास एवं प्रबंधन से संबंधित विषय।
संदर्भ: ‘खाद्य सुरक्षा के बिना कोई सुरक्षा नहीं’ विषय के अंतर्गत जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) 2026 में 122 देशों में भारत 100वें स्थान पर है। भारत का 24.1 का स्कोर देश में भुखमरी की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) के बारे में

- उद्देश्य एवं प्रकाशक: GHI एक वार्षिक, समकक्ष-समीक्षित (Peer-reviewed) प्रकाशन है, जो वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी का मापन एवं निगरानी करता है। इसे संयुक्त रूप से वेल्टहंगरहिल्फे (WHH), इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल लॉ ऑsफ पीस एंड आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (IFHV) तथा हेल्वेटास (Helvetas) द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
- चार संकेतक: यह सूचकांक अल्पपोषण, बाल अवरुद्ध विकास, बाल दुबलापन और पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को सम्मिलित करता है।
- स्कोरिंग: GHI में 0–100 के पैमाने का उपयोग किया जाता है, जहाँ 0 का अर्थ भुखमरी का न होना और 100 का अर्थ भुखमरी की सबसे गंभीर संभावित स्थिति है। इसकी पाँच गंभीरता श्रेणियाँ हैं—निम्न, मध्यम, गंभीर, चिंताजनक और अत्यंत चिंताजनक।
वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) 2026 के प्रमुख निष्कर्ष

A. वैश्विक एवं क्षेत्रीय निष्कर्ष
- वैश्विक भुखमरी में वृद्धि: वैश्विक GHI स्कोर वर्ष 2018 के 17.6 से बढ़कर वर्ष 2026 में 18.1 हो गया है, जिससे वर्ष 2000 के बाद दर्ज की गई गिरावट का रुझान बाधित हुआ है। रिपोर्ट में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर परस्पर प्रभाव डालने वाले संघर्षों, जलवायु की चरम घटनाओं और आर्थिक झटकों के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।
- उप-सहारा अफ्रीका में भुखमरी का स्तर सबसे अधिक: आकलन किए गए क्षेत्रों में उप-सहारा अफ्रीका का GHI स्कोर 27.5 सर्वाधिक है। इसके बाद दक्षिण एशिया 23.5 के स्कोर के साथ दूसरे स्थान पर है। दोनों क्षेत्र गंभीर श्रेणी में आते हैं।
- सबसे गंभीर भुखमरी का सामना करने वाले देश: वर्ष 2026 की रिपोर्ट में सोमालिया का GHI स्कोर सर्वाधिक है। इसके बाद कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, चाड और मेडागास्कर का स्थान है। आठ देशों में भुखमरी का स्तर चिंताजनक है, जबकि 36 देशों को गंभीर श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
- प्रगति में असमानता: वर्ष 2018 की तुलना में उप-सहारा अफ्रीका तथा पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में GHI स्कोर बढ़ा, यूरोप और मध्य एशिया में अपरिवर्तित रहा, जबकि लैटिन अमेरिका एवं कैरिबियन तथा पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में इसमें एक अंक से कम की गिरावट दर्ज की गई।
- खाद्य सुरक्षा एवं व्यापक स्थिरता: रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि संघर्ष, खाद्य एवं उर्वरक बाजारों में व्यवधान, जलवायु संबंधी झटके और आर्थिक दबाव खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं। इसमें सुदृढ़ खाद्य प्रणालियों, सुरक्षित आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन तथा जल जैसे आवश्यक संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करने का आह्वान किया गया है।
B.भारत का प्रदर्शन
- समग्र प्रदर्शन: भारत ने 24.1 स्कोर प्राप्त किया और 122 देशों में 100वाँ स्थान हासिल किया। इस प्रकार, भारत गंभीर भुखमरी की श्रेणी में आता है। इथियोपिया की रैंक और स्कोर भी समान हैं।
- घटक संकेतक: भारत में अल्पपोषण की दर 9.8%, बाल अवरुद्ध विकास की दर 29.3%, बाल दुबलेपन की दर 19.0% तथा पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 2.7% है।
- बाल पोषण में प्रगति: बाल अवरुद्ध विकास की दर वर्ष 2000 के 50.0% से घटकर वर्ष 2026 में 29.3% हो गई, अर्थात् इसमें 20.7 प्रतिशत अंकों की कमी आई। भारत का GHI स्कोर भी वर्ष 2018 के 25.8 से सुधरकर वर्ष 2026 में 24.1 हो गया।
- मिश्रित प्रगति: अल्पपोषण और बाल अवरुद्ध विकास में सुधार के बावजूद, बाल दुबलेपन की दर 19.0% पर उच्च बनी हुई है, जो दक्षिण एशिया में सर्वाधिक है। बाल अवरुद्ध विकास की स्थिति अत्यधिक उच्च श्रेणी से घटकर उच्च श्रेणी में आ गई है।
- क्षेत्रीय तुलना: भारत का प्रदर्शन श्रीलंका (53वाँ स्थान; 10.2 स्कोर), नेपाल (72वाँ स्थान; 14.5 स्कोर) और बांग्लादेश (84वाँ स्थान; 19.2 स्कोर) की तुलना में खराब है, लेकिन पाकिस्तान (106वाँ स्थान; 25.5 स्कोर) और अफगानिस्तान (108वाँ स्थान; 28.6 स्कोर) से बेहतर है।
भारत के लिए प्रमुख चिंताएँ
- बाल अल्पपोषण की निरंतर समस्या: समग्र GHI स्कोर में सुधार के बावजूद, बच्चों में दुबलेपन और अवरुद्ध विकास की उच्च दर एक प्रमुख चिंता बनी हुई है।
- असमान प्रगति: अल्पपोषण में कमी और बाल दुबलेपन में वृद्धि के बीच का अंतर दर्शाता है कि खाद्य पदार्थों तक पहुँच में सुधार होने से पोषण संबंधी परिणामों में स्वतः सुधार नहीं होता है।
- बहुआयामी निर्धारक: भुखमरी विभिन्न एवं किफायती आहार की उपलब्धता, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छता और सुरक्षित आजीविका जैसे कारकों से प्रभावित होती है।
- बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता: रिपोर्ट में जलवायु की चरम घटनाओं, खाद्य कीमतों पर दबाव और खाद्य प्रणालियों में व्यवधान से उत्पन्न जोखिमों को रेखांकित किया गया है। इनमें वर्ष 2026 में भारत के मानसून के मुख्य क्षेत्र (Monsoon Core Zone) में सामान्य से कम वर्षा की संभावना भी शामिल है।
भुखमरी एवं कुपोषण से निपटने के लिए सरकारी पहल
- मिशन सक्षम आँगनवाड़ी एवं पोषण 2.0: बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषण एवं एकीकृत आँगनवाड़ी सेवाएँ प्रदान करता है। इसके साथ ही पोषण शिक्षा और व्यवहार परिवर्तन संबंधी हस्तक्षेप भी किए जाते हैं।
- पीएम पोषण (PM POSHAN): पोषण स्तर में सुधार करने तथा विद्यालयों में उपस्थिति और बच्चों को विद्यालय में बनाए रखने को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में पात्र बच्चों को गर्म पका हुआ भोजन उपलब्ध कराता है।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013: खाद्य सुरक्षा के लिए अधिकार-आधारित ढाँचा स्थापित करता है। इसके अंतर्गत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से पात्र परिवारों को रियायती दरों पर खाद्यान्न तथा निर्धारित योजनाओं के माध्यम से महिलाओं और बच्चों को पोषण संबंधी सहायता प्रदान की जाती है।
- एनीमिया मुक्त भारत: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आयरन एवं फोलिक एसिड की पूरक खुराक, सामुदायिक पहुँच और निगरानी के माध्यम से एनीमिया की समस्या का समाधान करने का प्रयास करता है।
आगे की राह
- मातृ एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था के पोषण को प्राथमिकता: मातृ पोषण, स्तनपान, अनुपूरक आहार, वृद्धि की निगरानी तथा अल्पपोषण की शीघ्र पहचान करना।
- योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन एवं अभिसरण में सुधार: पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और खाद्य सुरक्षा संबंधी हस्तक्षेपों के बीच समन्वय स्थापित करना। इसके साथ ही समयबद्ध निगरानी और संवेदनशील समूहों के लिए लक्षित कार्रवाई सुनिश्चित करना।
- अंतर्निहित निर्धारकों का समाधान: विविध एवं किफायती आहार, स्वास्थ्य देखभाल, सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता तक पहुँच में सुधार करना।
- सुदृढ़ खाद्य प्रणालियों का निर्माण: आर्थिक एवं पर्यावरणीय झटकों से संवेदनशील परिवारों की रक्षा के लिए सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित आजीविका और जलवायु अनुकूलन उपायों को बढ़ावा देना।
