संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन -3: देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।
संदर्भ: नीति आयोग ने अध्ययन रिपोर्टों का एक सेट जारी किया है, जिसमें 2070 तक नेट ज़ीरो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत के विकास पथ की रूपरेखा दी गई है।
अन्य संबंधित जानकारी
- भारत ने 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त करने के साथ-साथ 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करने की परिकल्पना की है, जो अभूतपूर्व पैमाने के विकास और डीकर्बोनाइजेशन के एक साथ होने वाले संक्रमण को दर्शाता है।
- इस संदर्भ में, नीति आयोग ने एक ‘रोडमैप’ प्रस्तुत किया है, जो इस बात पर प्रकाश डालता है कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का तीव्र विस्तार, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु उत्तरदायित्व के बीच सामंजस्य स्थापित करना भारत की दीर्घकालिक नीति योजना का केंद्रबिंदु है।
- इस अध्ययन में दो मुख्य परिदृश्यों के साथ एक मॉडल-आधारित ढांचे का उपयोग किया गया: वर्तमान नीति परिदृश्य (CPS) जो मौजूदा नीतियों और प्रवृत्तियों का विस्तार करता है, और एक अधिक महत्वाकांक्षी नेट ज़ीरो परिदृश्य (NZS) जो भारत के 2070 के नेट ज़ीरो संकल्प के अनुरूप है।
- यह संक्रमण संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के समता, जलवायु न्याय और साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों (CBDR) के सिद्धांतों पर आधारित है, और भारत द्वारा 2022 में UNFCCC को सौंपी गई दीर्घकालिक निम्न उत्सर्जन विकास रणनीति (LT-LEDS) पर आधारित है।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- विकास और प्रगति का पथ:
- सभी परिदृश्यों में GDP के 2025 में 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2047 तक लगभग 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है, जो दीर्घकालिक विकास के लचीलेपन को दर्शाता है।
- शहरीकरण 37% (2023) से बढ़कर 2047 तक 51% और 2070 तक 65% होने की उम्मीद है, जिससे परिवहन, भवनों और बुनियादी ढांचे का विस्तार होगा।
- नेट-ज़ीरो संक्रमण का GDP पर सीमित दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है, जिसमें वित्तपोषण संरचना के आधार पर 2050 तक लगभग 0.5% का अंतर हो सकता है।
- ऊर्जा संक्रमण पथ:
- नेट ज़ीरो परिदृश्य के तहत, GDP में 11 गुना विस्तार होने के बावजूद भारत की ऊर्जा मांग मामूली रूप से (2025 और 2070 के बीच केवल 2.1–2.6 गुना) बढ़ती है, जो दक्षता लाभ, विद्युतीकरण और चक्रीयता द्वारा संचालित है।
- बिजली अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाएगी, जिसमें मध्य शताब्दी तक अक्षय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा का दबदबा होगा, जबकि जीवाश्म ईंधन 2070 तक केवल अवशिष्ट भूमिका में रह जाएंगे।
- अंतिम ऊर्जा में बिजली की हिस्सेदारी EV, इलेक्ट्रिक हीट और स्वच्छ खाना पकाने के कारण 2025 में 21% से बढ़कर 2070 तक CPS में 40% और NZS में 60% हो जाएगी।
- कोयले की मांग वर्तमान नीतियों के तहत मध्य शताब्दी तक बढ़ सकती है, जिसके बाद नेट-ज़ीरो परिदृश्य में इसमें तेजी से गिरावट आएगी।
- प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण 2025 में 87% जीवाश्म ईंधन से बदलकर 2070 तक CPS के तहत 54% और NZS के तहत मात्र 14% रह जाएगा।
- वित्त और निवेश संरचना:
- नेट ज़ीरो प्राप्त करने के लिए 2070 तक लगभग 22.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के संचयी निवेश की आवश्यकता है (लगभग 500 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष), जिसमें से आधा बिजली क्षेत्र में होगा।
- अपेक्षित घरेलू और विदेशी प्रवाह लगभग 16.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर जुटा सकते हैं, जिससे लगभग 6.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तपोषण अंतराल रह जाएगा, जिसे मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय पूंजी से पूरा किया जाना चाहिए।
- महत्वपूर्ण खनिज और सामाजिक प्रभाव:
- NZS के तहत 2050-70 के दौरान महत्वपूर्ण ऊर्जा संक्रमण खनिजों (CETMs) की मांग 110 मिलियन टन से अधिक हो जाएगी, जिसमें EV बैटरी और सौर ऊर्जा का वर्चस्व होगा।
- तांबा और ग्रेफाइट 2070 तक कुल CETM मांग का लगभग दो-तिहाई हिस्सा होंगे, जबकि भारत लिथियम, निकल, कोबाल्ट और रेयर अर्थ्स के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर रहेगा।
- नेट ज़ीरो पथ कुल मिलाकर अधिक रोजगारों का सृजन करते हैं, लेकिन जीवाश्म ईंधन आधारित विनिर्माण में लगभग 1.7 करोड़ श्रमिकों और 150 से अधिक कोयला-निर्भर जिलों को संरचनात्मक व्यवधान का सामना करना पड़ सकता है।
चुनौतियां और बाधाएं
- तकनीकी और बुनियादी ढांचा संबंधी बाधाएं: कई प्रमुख नेट ज़ीरो प्रौद्योगिकियां, जैसे कि कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS), लंबी अवधि का भंडारण, छोटे मॉड्युलर रिएक्टर और बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन, अभी भी प्रारंभिक चरण में हैं या व्यावसायिक रूप से अप्रमाणित हैं।
- वित्तीय और व्यापक आर्थिक जोखिम: 6.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का वित्तपोषण अंतराल और 2050 तक लगभग 8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के अग्रिम निवेश की आवश्यकता पूंजी जुटाने और पूंजी की लागत की महत्वपूर्ण चुनौतियां पेश करती है।
- संसाधन और आपूर्ति-श्रृंखला पर दबाव: बड़े पैमाने पर अक्षय ऊर्जा के परिनियोजन से भूमि और पानी के लिए कृषि और शहरी विकास के साथ प्रतिस्पर्धा हो सकती है। महत्वपूर्ण खनिजों के लिए उच्च आयात निर्भरता भारत को भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के प्रति असुरक्षित बनाती है।
- सामाजिक और शासन संबंधी चुनौतियां: कोयला और जीवाश्म ईंधन बेल्ट में क्षेत्रीय रोजगार के नुकसान के लिए असमान परिणामों से बचने हेतु पुनर्कौशल और आर्थिक विविधीकरण की आवश्यकता है।
रिपोर्ट की सिफारिशें
- संपूर्ण अर्थव्यवस्था में “अवॉयड–शिफ्ट–इंप्रूव” (Avoid–Shift–Improve) दृष्टिकोण अपनाएं: अनावश्यक मांग से बचें, निम्न-कार्बन विधियों की ओर स्थानांतरित हों, और परिवहन, भवनों तथा उद्योगों में दक्षता में सुधार करें।
- जीवाश्म-ईंधन पर निर्भर क्षेत्रों में पुनर्कौशल और विविधीकरण: कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर क्षेत्रों में पुन:प्रशिक्षण, पुनर्वास और आर्थिक विविधीकरण के वित्तपोषण के लिए जिला खनिज फाउंडेशन (DMF), स्किल इंडिया और ‘स्किल काउंसिल फॉर ग्रीन जॉब्स’ का उपयोग किया जाए, जिसमें महिलाओं और वंचित समूहों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- वित्तीय संरचना का सुदृढ़ीकरण: एक राष्ट्रीय हरित वित्त संस्थान की स्थापना करें, बॉन्ड बाजारों को मजबूत किया जाए, एक एकीकृत जलवायु वित्त वर्गीकरण तैयार किया जाए, और विदेशी तथा निजी पूंजी को आकर्षित करने के लिए मिश्रित वित्त को बढ़ावा दिया जाए।
- लचीला CETM (महत्वपूर्ण ऊर्जा संक्रमण खनिज) इकोसिस्टम: घरेलू अन्वेषण, शोधन और उन्नत पुनर्चक्रण के माध्यम से एक सशक्त खनि CETM का निर्माण किया जाए। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्रोतों का विविधीकरण करें और स्वच्छ-तकनीक विनिर्माण के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं लागू किया जाए।
SOURCES
Down to Earth
PIB
DD News
