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सामान्य अध्ययन-1: भौगोलिक विशेषताएँ और उनका स्थान—महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं (जल निकायों और हिमच्छदों सहित) में परिवर्तन।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरणीय प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन।

संदर्भ: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राष्ट्रीय तटीय मिशन (NCM) 2.0 के कार्यान्वयन हेतु दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो तटीय लचीलेपन को बढ़ाने, पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण करने तथा सतत ब्लू इकॉनमी के विकास के लिए एक सुव्यवस्थित फ्रेमवर्क प्रदान करते हैं।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के कार्यान्वयन के लिए प्रमुख दिशानिर्देश

• संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण: दिशानिर्देशों में वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, तटीय राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, कार्यान्वयन एजेंसियों और अन्य हितधारकों के बीच समन्वित कार्यान्वयन की व्यवस्था की गई है। इसमें स्पष्ट संस्थागत उत्तरदायित्व तथा मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ अभिसरण सुनिश्चित किया गया है।

• संस्थागत ढाँचा: परियोजना संचालन समिति (PSC), जिसकी अध्यक्षता MoEFCC के सचिव द्वारा की जाती है, निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है।

  • परियोजना प्रबंधन प्रकोष्ठ (PMC) योजना निर्माण, मूल्यांकन, निगरानी और रिपोर्टिंग में सहायता करता है, जबकि सतत तटीय प्रबंधन प्रभाग (SCMD) मिशन का कार्यान्वयन करता है।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) निधि प्रवाह और वित्तीय निगरानी के लिए केंद्रीय नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।

• राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की भागीदारी: तटीय राज्य और केंद्रशासित प्रदेश महत्वपूर्ण कार्यान्वयन भागीदार हैं।

  • प्रत्येक भाग लेने वाला राज्य/केंद्रशासित प्रदेश एक राज्य नोडल समन्वय अधिकारी (SNCO) नामित करेगा और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के साथ एकल समझौता ज्ञापन करेगा।
  • राज्य/केंद्रशासित प्रदेश परियोजना तैयार करने, वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त करने, सामुदायिक भागीदारी, डेटा साझा करने तथा दीर्घकालिक संचालन और रखरखाव में सहयोग करेंगे।

• वैज्ञानिक परियोजना नियोजन: परियोजनाएँ एक निर्धारित जीवन-चक्र का पालन करेंगी, जिसमें अवधारणा नोट, पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन, अनुमोदन और कार्यान्वयन शामिल हैं।

  • परियोजनाओं में मापनीय आउटपुट, परिणाम और प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPIs), पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय तथा जोखिम-प्रबंधन प्रावधान होना आवश्यक है।

• निगरानी और जवाबदेही: दिशानिर्देशों में प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS), नियमित भौतिक और वित्तीय प्रगति की निगरानी, शिकायत निवारण, तृतीय-पक्ष मूल्यांकन, वैधानिक लेखापरीक्षा तथा मूल्यांकन के निष्कर्षों के आधार पर मध्यावधि सुधारात्मक उपायों का प्रावधान किया गया है।

• प्रमुख हस्तक्षेप क्षेत्र: कार्यान्वयन में जलवायु-लचीला तटीय पर्यटन, प्रदूषण में कमी और निगरानी, प्रवाल भित्ति संरक्षण एवं पुनर्स्थापन, तटीय और समुद्री डॉल्फिन संरक्षण तथा अपरदित तटरेखाओं के लिए हरित तटीय अवसंरचना शामिल हैं।

  • इसमें एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजनाएँ (ICZMPs), तटीय एवं समुद्री स्थानिक योजनाएँ (CMSPs) तथा क्षमता निर्माण और पर्यावरणीय जागरूकता भी शामिल हैं।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के बारे में

• राष्ट्रीय तटीय मिशन (राष्ट्रीय तटीय मिशन) को 2021–22 से 2025–26 के दौरान मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों के संरक्षण, तटीय एवं समुद्री अनुसंधान, सतत समुद्र तटों तथा क्षमता निर्माण के लिए कार्यान्वित किया गया।

• पूर्ववर्ती राष्ट्रीय तटीय मिशन को 16 मई 2025 से राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 में समाहित कर दिया गया।

• राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित  किया जाता है।

• राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के लिए 2025–26 से 2030–31 तक ₹767 करोड़ के परिव्यय को मंजूरी दी गई है।

• विज़न: तटीय और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण एवं सुरक्षा करते हुए सतत एवं समावेशी विकास, जलवायु लचीलापन और ब्लू इकॉनमी की संभावनाओं को बढ़ावा देना।

• कवरेज: इसमें नौ तटीय राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल तथा चार केंद्रशासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, पुडुचेरी और लक्षद्वीप—शामिल हैं।

• प्रमुख अपेक्षित परिणामों में लगभग 1,000 किमी प्राथमिकता वाले तटरेखा क्षेत्र के लिए ICZMPs और CMSPs, तटीय जल की गुणवत्ता में सुधार, तटीय अपरदन, लवणता के अंतःप्रवेश और बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता में कमी, प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव का पुनर्स्थापन, पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन अवसंरचना तथा तटीय समुदायों के लिए आजीविका के बेहतर अवसर शामिल हैं।

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