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सामान्य अध्ययन-2: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां, शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व; शासन (गवर्नेस) के महत्वपूर्ण पक्ष; संघीय ढांचे से संबंधित विषय और चुनौतियाँ।

संदर्भ: राज्यपालों के व्यापक फेरबदल की प्रक्रिया के अंतर्गत, भारत के राष्ट्रपति ने विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राज्यपालों और उपराज्यपालों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान की।

अन्य संबंधित जानकारी:

  • यह परिवर्तन नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए किया गया हैं, जिनमें तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड, दिल्ली और लद्दाख सम्मिलित हैं।
  • इनमें से कई नियुक्तियाँ पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले की गई हैं, जिससे विपक्षी दलों ने यह आरोप लगाया है कि यह फेरबदल राजनीतिक विचारों से प्रेरित हो सकता है।

राज्यपाल के पद के बारे में

  • राज्यपाल राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है। परंतु, राष्ट्रपति की भाँति, वह एक नाममात्र का कार्यकारी प्रमुख (नाममात्र का या संवैधानिक प्रमुख) होता है।
  • राज्यपाल, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है। अतः, राज्यपाल के पद की दोहरी भूमिका होती है।
  • राज्यपाल की नियुक्ति: भारत के संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार, राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाएगी।
  • राज्यपाल के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएँ: अनुच्छेद 157 किसी व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त किए जाने के लिए दो अर्हताएँ निर्धारित करता है –
    • वह भारत का नागरिक हो, और
    • उसने 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो।
  • राज्यपाल की पदावधि एवं पदच्युत होना: राज्यपाल अपने पद ग्रहण की तिथि से पाँच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करता है। हालांकि, यह पाँच वर्ष की अवधि राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (अनुच्छेद 156) होती है। इसके अतिरिक्त, वह राष्ट्रपति को संबोधित अपना त्यागपत्र देकर किसी भी समय पद से मुक्त हो सकता है।
  • मुख्य शक्तियाँ और कार्य:
    • कार्यकारी शक्तियाँ: वह मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति करता है; राज्य के सभी कार्यकारी कार्य राज्यपाल के नाम से किए जाते हैं।
    • विधायी शक्तियाँ: वह राज्य विधानमंडल के सत्र को आहूत और सत्रावसान करता है; वह कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है।
    • वित्तीय शक्तियाँ: राज्यपाल की अनुशंसा के बिना राज्य विधानसभा में कोई भी धन विधेयक प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।
    • न्यायिक शक्तियाँ: उसके पास राज्य कानूनों के विरुद्ध किए गए अपराधों के लिए क्षमादान, दंडविराम, या दंड कम करने (लघुकरण) की शक्ति होती है।

राज्यपाल के पद से संबंधित चिंताएँ/चुनौतियाँ

  • पद का राजनीतिकरण: राज्यपालों पर प्रायः केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के आरोप लगते रहे हैं, जिससे संघीय ढाँचा कमजोर होता है।
  • विधेयकों पर सहमति देने में विलंब: राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब कर देते हैं, जिससे राज्य सरकारों के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • विवेकाधीन शक्तियों का बार-बार दुरुपयोग: राज्यपालों पर राज्य के दैनिक प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप करके शासन तंत्र के सुचारू संचालन में बाधा डालने के आरोप लगते रहे हैं।

न्यायिक निर्णय

  • शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।
  • रघुकुल तिलक मामला (1979): सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि भले ही राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार के माध्यम से राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, परंतु राज्यपाल का पद केंद्र सरकार का कोई कर्मचारी या सेवक नहीं है, और इस प्रकार, वह केंद्र सरकार के अधीनस्थ या अधीन नहीं है।
  • एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): यह मामला अनुच्छेद 356 और राज्य सरकार को बर्खास्त करने की राज्यपाल की शक्ति पर केंद्रित था।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि राज्य सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका निर्धारण राज्यपाल के व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर होने के बजाय विधानसभा के पटल पर किया जाना चाहिए।
  • बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010): सर्वोच्च न्यायालय ने ‘प्रसादपर्यंत सिद्धांत’ की विस्तृत समीक्षा की। राष्ट्रपति की राज्यपाल को हटाने की शक्ति को बरकरार रखते हुए, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि केंद्र में सरकार का परिवर्तन होना या केंद्र सरकार की नीतियों और विचारधाराओं के साथ वैचारिक मतभेद होना, राज्यपाल को पद से हटाने का आधार नहीं हो सकता।
  • तमिलनाडु बनाम राज्यपाल (अप्रैल 2025): सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर अनिश्चित काल तक सहमति नहीं रोक सकते। न्यायालय ने इसके लिए विशिष्ट समय-सीमा निर्धारित की, जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए विधेयकों पर कार्रवाई करने हेतु तीन महीने की सीमा तय की गई है।
    • तथापि, बाद में एक ‘राष्ट्रपति संदर्भ’ में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि वह राष्ट्रपति या राज्यपालों पर कोई न्यायिक समय-सीमा आरोपित नहीं कर सकता, क्योंकि संविधान में इनका उल्लेख नहीं किया गया है।

विभिन्न आयोगों द्वारा की गई प्रमुख सिफारिशें

  • सरकारिया आयोग (1988): यह सुझाव दिया कि राज्यपाल ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति होने चाहिए जिनका हाल के वर्षों में सक्रिय राजनीति में कोई हस्तक्षेप न रहा हो। आयोग ने सिफारिश की कि राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व मुख्यमंत्री से परामर्श किया जाना चाहिए।
  • पुंछी आयोग (2010): यह प्रस्ताव दिया कि कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व राज्यपालों को मनमाने ढंग से पद से नहीं हटाया जाना चाहिए। आयोग ने राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राज्यपालों हेतु एक समय-सीमा निर्धारित करने की भी सिफारिश की।
  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग: इस बात पर बल दिया कि राज्यपालों को निष्पक्ष संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करना चाहिए, जिससे सहकारी संघवाद की भावना को बल मिल सके।

SOURCES
The Hindu
Indian Express

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