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सामान्य अध्ययन-2: भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का प्रभाव, प्रवासी भारतीय।

सामान्य अध्ययन -3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति,विकास और रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: यूरोपीय संघ (EU) ने 1 जनवरी, 2026 से अपना ‘कार्बन सीमा समायोजन तंत्र’ (CBAM) अर्थात् ‘कार्बन कर लागू कर दिया है। इस तंत्र के तहत कार्बन उत्सर्जन करने वाले उत्पादों के आयात पर ‘कार्बन शुल्क’ लगाया जाता है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • प्रारंभिक तौर पर CBAM लौह और इस्पात, एल्यूमीनियम, उर्वरक, सीमेंट, बिजली और हाइड्रोजन पर लागू होगा।
  • उल्लेखनीय है कि 1 जनवरी, 2026 से, उत्सर्जन डेटा का स्वतंत्र सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है। इसके तहत केवल यूरोपीय संघ द्वारा मान्यता प्राप्त या ISO 14065-अनुपालन करने वाले सत्यापनकर्ताओं को ही स्वीकृति दी जाएगी।

कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) क्या है?

  • यह यूरोपीय संघ का एक तंत्र है जिसके तहत यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाली उच्च कार्बन-गहन वस्तुओं के उत्पादन के दौरान उत्सर्जित कार्बन पर एक कीमत निर्धारित की जाती है और गैर-EU देशों में स्वच्छ औद्योगिक उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • उद्देश्य: 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 55% तक कम करने के यूरोप के लक्ष्य से अनुरूप।
  • CBAM के चरण: संक्रमणकालीन चरण को 1 अक्टूबर 2023 से 2025 तक लागू किया गया था।
  • इसका वास्तविक और पूर्ण कार्यान्वयन 1 जनवरी 2026 से शुरू हो गया है।
  • प्रक्रिया: यूरोपीय संघ के आयातकों को सक्षम प्राधिकारियों के पास पंजीकरण कराना होगा, अपने आयातित उत्पादों में निहित कार्बन उत्सर्जन की रिपोर्ट देनी होगी और यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (EU ETS) की कीमतों से जुड़े प्रमाणपत्र खरीदने होंगे।
  • यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) एक विनियमित कार्बन बाज़ार है, जिसके अंतर्गत यूरोपीय संघ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर एक वार्षिक सीमा निर्धारित करता है। यूरोपीय संघ के भीतर काम करने वाली कंपनियों के लिए अपने द्वारा किए जाने वाले उत्सर्जन के लिए ‘भत्ता’ (Allowances) खरीदना अनिवार्य होता है।

भारत पर CBAM के प्रभाव  

  • निर्यात लागत में वृद्धि: CBAM से स्टील, लोहा, एल्युमीनियम, सीमेंट और उर्वरक जैसे उत्पादों के निर्यातकों के लिए लागत बढ़ने की आशंका है, जिससे संभावित रूप से उनकी व्यापारिक प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी आ सकती है।
  • ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के अनुसार, कई भारतीय निर्यातकों को अपनी कीमतों में 15-22% तक की कटौती करनी पड़ सकती है, ताकि यूरोपीय संघ (EU) के आयातक उस मार्जिन का उपयोग कार्बन कर का भुगतान करने के लिए कर सकें।
  • उच्च अनुपालन लागत: CBAM के जटिल डेटा और सत्यापन नियम अनुपालन लागत को बढ़ा सकते हैं, जिससे छोटे निर्यातक यूरोपीय संघ के बाज़ार से बाहर हो सकते हैं।
  • विनिर्माण निर्यातकों को यूरोपीय संघ की पद्धतियों के अनुरूप ईंधन के उपयोग, बिजली की खपत, उत्पादन की मात्रा और उत्सर्जन कारकों का त्रैमासिक आधार पर रिकॉर्ड रखना होगा।
  • निर्यात में गिरावट: CBAM के रिपोर्टिंग चरण के कारण भारत से यूरोपीय संघ (EU) को होने वाले स्टील और एल्यूमीनियम के निर्यात में 24.4% की भारी गिरावट देखी गई है।
  • गैर-टैरिफ व्यापार बाधा: यह व्यापार को सीमा शुल्क के माध्यम से नहीं, बल्कि नियामक, लागत और अनुपालनआवश्यकताओं के माध्यम से प्रतिबंधित करता है।
  • क्षेत्र-विशिष्ट प्रभाव: स्टील और एल्यूमीनियम निर्यातक सर्वाधिक प्रभावित होंगे क्योंकि इन क्षेत्रों में कोयले से उत्पन्न बिजली का उपयोग कार्बन भार को काफी बढ़ा देता है, जिससे CBAM लागत में अत्यधिक वृद्धि होती है।

विकासशील देशों के लिए चिंताएँ:

  • विकसित और विकासशील दोनों अर्थव्यवस्थाओं पर एकसमान उत्सर्जन मानक लागू करना उन पर असमान बोझ डालता है। जैसा कि ब्राजील में UNFCCC COP30 के दौरान रेखांकित किया गया था, इससे मौजूदा व्यापारिक असमानताओं के और बढ़ने का जोखिम है।
  • एकतरफा जलवायु-आधारित व्यापार उपाय: जलवायु से जुड़े एकतरफा व्यापारिक उपाय बहुपक्षीय व्यापार सिद्धांतों को कमजोर करते हैं और ‘साझा किन्तु विभेदित दायित्व और संबंधित क्षमताएं’ (CBDR-RC) की मूल भावना का भी उल्लंघन करते हैं।
  • डीकार्बोनाइजेशन लागत का स्थानांतरण: CBAM डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन कम करने) की लागत को गरीब देशों पर स्थानांतरित करने का जोखिम उत्पन्न करता है। साथ ही, यह ऐतिहासिक उत्तरदायित्वों या संरचनात्मक असमानताओं का समाधान नहीं करता है।
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