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सामान्य अध्ययन-1: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास-महत्वपूर्ण घटनाएं, व्यक्तित्व, विषय।
संदर्भ: भारत सरकार ने सामाजिक न्याय, शिक्षा और समानता के क्षेत्र में महात्मा ज्योतिबा फुले के अतुलनीय योगदान को सम्मानित करने हेतु 11 अप्रैल 2026 से 11 अप्रैल 2028 तक दो वर्षीय राष्ट्रव्यापी स्मृति समारोह का शुभारंभ किया।
महात्मा ज्योतिबा फुले के बारे में:

- ज्योतिराव गोविंदराव फुले (11 अप्रैल 1827 – 28 नवंबर 1890) एक भारतीय समाज सुधारक, लेखक और निम्न जातियों, महिलाओं तथा निर्धन श्रमिकों के लिए समानता के प्रबल पक्षधर थे।
- उनका जन्म तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी (वर्तमान महाराष्ट्र) में हुआ था। वे माली जाति (बागवान और सब्जी किसान) से संबंधित थे, जिसे सामाजिक व्यवस्था में शूद्र वर्ग के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया था।
- प्रारंभिक जीवन और प्रभाव:
- उन्होंने पुणे के स्कॉटिश मिशन स्कूल में शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 1847 में अपनी पढ़ाई पूरी की।
- वे थॉमस पेन और उनकी प्रसिद्ध रचना ‘राइट्स ऑफ मैन’ जैसे विचारकों से अत्यधिक प्रभावित थे। इसके अतिरिक्त, दासता विरोधी आंदोलनों, भगवान बुद्ध के उपदेशों और संत-कवि कबीर की शिक्षाओं का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
- उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1848 था, जब उनकी जाति के कारण उन्हें एक ब्राह्मण मित्र के विवाह समारोह में अपमानित होना पड़ा। इस घटना ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनके आजीवन संघर्ष और वैचारिक विरोध की आधारशिला रखी।
- वे हिंदू जाति व्यवस्था के कट्टर आलोचक थे, जो जन्म के आधार पर लोगों का वर्गीकरण करती थी और जिसके कारण शूद्रों तथा वर्तमान दलितों के विरुद्ध भेदभाव व्याप्त था।
- वर्ष 1888 में विट्ठलराव कृष्णजी वांडेकर द्वारा उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
- उनकी सुप्रसिद्ध कृति ‘गुलामगिरी’ (1873) में उन्होंने भारत में व्याप्त जातिगत उत्पीड़न की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका की दास प्रथा से की थी।
- उन्होंने सामाजिक समानता को बढ़ावा देने और गैर-ब्राह्मणों के उत्थान के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना की।
- इस समाज गैर-ब्राह्मणों के लिए स्वतंत्र अनुष्ठानों को बढ़ावा दिया और विभिन्न सामाजिक सुधारों के लिए प्रेरित किया।
- इसे छत्रपति शाहू महाराज जैसे सुधारवादी शासकों का समर्थन प्राप्त था।
शिक्षा और महिला अधिकार:
- शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन की कुंजी मानते हुए, फुले ने:
- अपनी पत्नी, सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया, जो आगे चलकर भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनीं।
- वर्ष 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला विद्यालय खोला।
- शूद्रों, अति-शूद्रों और दलितों के लिए अलग से विद्यालयों की स्थापना की।
- उन्होंने बाल विवाह का सख्त विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का पुरजोर समर्थन किया।
- उन्होंने गर्भवती विधवाओं के लिए एक आश्रय गृह और एक अनाथालय की स्थापना की; बाद में उन्होंने उन्हीं बच्चों में से एक को गोद भी लिया।
जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष:
- फुले ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व को नकार दिया और तर्क दिया कि जातिगत असमानता थोपी गई है और पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है।
- उन्होंने शूद्रों और दलितों की गरिमा और उत्थान के लिए कार्य किया। ऐसा माना जाता है कि शोषित समुदायों के लिए “दलित” शब्द का प्रयोग करने वाले वे पहले व्यक्तियों में से एक थे।
- उन्होंने सभी जातियों के लिए अपना निजी कुआँ खोल दिया, जो सामाजिक समानता का एक सशक्त प्रतीक बना।
ज्योतिबा फुले की विरासत
- फुले के कार्यों ने भारत में जाति-विरोधी और सामाजिक न्याय के आंदोलनों की नींव रखी।
- उनके विचारों ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर और बाद के दलित आंदोलनों को गहराई से प्रभावित किया। डॉ. अंबेडकर उन्हें अपना ‘गुरु’ मानते थे।
- उनकी विरासत के मुख्य पहलू:
- विशेष रूप से महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले (वंचित) समूहों के लिए शिक्षा के द्वार खोलना।
- वे लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के शुरुआती पैरोकारों में से एक थे।
- उन्होंने जातिगत पदानुक्रम और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को ‘सत्यशोधक समाज’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से संगठित चुनौती दी।
- एक समतावादी समाज का उनका दृष्टिकोण आधुनिक भारत में जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के प्रयासों को आज भी प्रेरित करता है।
