संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन -3: भारत में भूमि सुधार।
संदर्भ: वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब ने “भारत में भूमि असमानता: प्रकृति, इतिहास और बाजार” शीर्षक से एक वर्किंग पेपर जारी किया है, जो ग्रामीण भारत में भूमि स्वामित्व में व्याप्त अत्यधिक असमानताओं को रेखांकित करता है।
अन्य संबंधित जानकारी
- ये निष्कर्ष 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के आंकड़ों पर आधारित हैं, जिसमें भारत के दस सबसे बड़े राज्यों के 2,70,000 गांवों के लगभग 65 करोड़ लोगों को सम्मिलित किया गया था।
- ये निष्कर्ष कृषि संकट, कृषि कानूनों और भूमि सुधारों की आवश्यकता पर चल रही बहसों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
- भूमि स्वामित्व का अत्यधिक संकेंद्रण: ग्रामीण परिवारों के शीर्ष 10% के पास कुल भूमि का लगभग 44% हिस्सा है, जो भूमि स्वामित्व के उच्च संकेंद्रण को दर्शाता है।
- इसी समूह के भीतर, शीर्ष 5% और शीर्ष 1% परिवारों का क्रमशः 32% और 18% भूमि पर नियंत्रण है, जो शीर्ष स्तर पर अत्यधिक विषम वितरण का सूचक है।
- ग्राम स्तर पर बड़े भूस्वामियों का प्रभुत्व: एक औसत गाँव में, सबसे बड़े भूस्वामी के पास कुल भूमि का लगभग 12.4% हिस्सा होता है। इसके अतिरिक्त, लगभग 3.8% गाँवों में एक ही व्यक्ति के पास 50% से अधिक भूमि है, जो निरंतर बनी हुई ज़मींदारी प्रभुत्व की स्थिति को प्रकट करता है।
- अत्यधिक क्षेत्रीय असमानताएँ: राज्यों के मध्य भूमि असमानता में महत्वपूर्ण भिन्नता देखी जाती है। केरल में गिनी गुणांक सर्वाधिक 90 है, जिसके पश्चात बिहार, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है, जिनमें से प्रत्येक का गिनी गुणांक लगभग 80 है।
- कर्नाटक और राजस्थान जैसे राज्यों (गिनी गुणांक <65) में तुलनात्मक रूप से कम असमानता प्रदर्शित होती है।
- गिनी गुणांक का कम मान जनसंख्या के भीतर आय या संपत्ति के अधिक समान वितरण को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि अमीर और गरीब के बीच का अंतराल कम है।
- उच्च असमानता (गिनी गुणांक): भूमि का गिनी गुणांक लगभग 71 है, जो अत्यंत उच्च असमानता को दर्शाता है। विशेष रूप से जब विश्लेषण में भूमिहीन परिवारों को सम्मिलित किया जाता है, तो यह विषमता और भी स्पष्ट हो जाती है।
- व्यापक भूमिहीनता: ग्रामीण भारत के लगभग 46% परिवार भूमिहीन हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त समग्र असमानता में भूमिहीनता सबसे बड़ा एकल योगदानकर्ता कारक है।
- राज्यों के मध्य भूमिहीनता में अत्यधिक भिन्नता: विभिन्न राज्यों में भूमिहीनता के स्तर में भारी अंतर देखा गया है। पंजाब (73%), बिहार (59%) और मध्य प्रदेश (51%) में भूमिहीनता का स्तर बहुत अधिक है, जबकि राजस्थान (34%) और उत्तर प्रदेश (39%) में इसका अनुपात तुलनात्मक रूप से कम है।
भारत में भूमि असमानता के प्रमुख निर्धारक
- ऐतिहासिक विरासत: औपनिवेशिक काल की भू-स्वामित्व प्रणालियों, जैसे ज़मींदारी और जागीरदारी ने ऐसी गहन असमानताओं को जन्म दिया जो आज भी विद्यमान हैं।
- सामाजिक-आर्थिक कारक: जातिगत पदानुक्रम और सामाजिक स्तरीकरण ने ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए भूमि तक पहुँच को सीमित किया है।
- बाज़ार की शक्तियाँ: भूमि की बढ़ती कीमतें, व्यावसायीकरण और शहरीकरण तथा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण उत्पन्न “भूमि संकुचन” ने भूमि के संकेंद्रण को और अधिक बढ़ावा दिया है।
- कृषि-पारिस्थितिक स्थितियाँ: उपजाऊ भूमि और बेहतर उत्पादकता वाले क्षेत्रों में भूमि संकेंद्रण अधिक होने की प्रवृत्ति देखी जाती है, क्योंकि ऐसी भूमि अधिक मूल्यवान और प्रतिस्पर्धी हो जाती है।
भूमि असमानता के निहितार्थ
- आर्थिक असमानता और ग्रामीण संकट: भूमि का असमान वितरण ग्रामीण निर्धनता और कृषि संकट (Agrarian distress) को और अधिक गहरा करता है। भूमिहीन परिवारों के पास उत्पादक संपत्तियों और ऋण के लिए संपार्श्विक (गारंटी) का अभाव होता है, जो अंततः उन्हें ऋणग्रस्तता और पलायन ओर अग्रसर करता है।
- गहराती सामाजिक असमानता: भूमि का संकेंद्रण जाति और वर्ग के भेदों को और अधिक बढ़ाता है। यह हाशिए पर स्थित समूहों की आर्थिक अवसरों, सार्वजनिक सेवाओं और निर्णय लेने वाली संरचनाओं तक पहुँच को सीमित कर देता है।
- विकृत कृषि विकास: भूमि का संकेंद्रण व्यापक आधार वाले कृषि विकास को बाधित करता है। जहाँ छोटे किसानों को कृषि आदानों (Inputs) और तकनीक तक पहुँच में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, वहीं यह भी देखा गया है कि बड़े भू-जोतों का हमेशा कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं किया जाता।
- नीतिगत अप्रभावीता: कल्याणकारी योजनाएँ जैसे सहायिकी (सब्सिडी) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ आनुपातिक रूप से बड़े भूस्वामियों को अधिक मिल सकता है, जिससे संवेदनशील वर्गों पर इन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव कम हो जाता है।
- खाद्य सुरक्षा और जलवायु जोखिम: भूमि का उच्च स्तर का असमान वितरण जलवायु झटकों के प्रति कृषि के लचीलेपन को कमजोर कर सकता है। चूंकि सीमांत किसानों के पास अनुकूलन क्षमता का अभाव होता है, इसलिए यह स्थिति खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि के लिए दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न करती है।
असमानता को कम करने के लिए भूमि सुधार उपाय
- स्वतंत्रता के पश्चात संरचनात्मक सुधार: प्रारंभिक सुधारों (1950-70 के दशक) का मुख्य फोकस बिचौलियों के उन्मूलन (ज़मींदारी), काश्तकारी विनियमन और भूमि सीमा कानूनों पर था। हालांकि, असमान कार्यान्वयन के कारण भूमि का पुनर्वितरण सीमित (कुल कृषि योग्य भूमि का लगभग 2%) रहा।
- काश्तकारी सुधार और कृषि सुरक्षा: जोत की सुरक्षा और उचित लगान सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उपाय किए गए, यद्यपि कमजोर प्रवर्तन और अनौपचारिक काश्तकारी प्रथाओं के कारण राज्यों में इसके परिणाम भिन्न रहे।
- ऑपरेशन बरगा (पश्चिम बंगाल, 1978): इसके तहत लगभग 1.4 मिलियन बटाईदारों को पंजीकृत किया गया, जिससे समानता और कृषि उत्पादकता दोनों में सुधार हुआ। इसे सबसे प्रभावी काश्तकारी सुधारों में से एक माना जाता है।
- अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: वन अधिकार अधिनियम, 2006, वनवासी जनजातियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि अधिकारों को मान्यता देता है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करना है।
- डिजिटलीकरण और आधुनिक शासन पहल: डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) और स्वामित्व (SVAMITVA) जैसी योजनाओं का उद्देश्य भूमि अभिलेखों का आधुनिकीकरण करना, पारदर्शिता बढ़ाना और विवादों को कम करना है, जिससे भूमि शासन में सुधार हो सके।
