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सामान्य अध्ययन-2: विकास के लिए सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप।
सामान्य अध्ययन -3: मुख्य फसलें – देश के विभिन्न भागों में फसल पैटर्न; प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से संबंधित मुद्दे; कृषि में प्रौद्योगिकी मिशन।
संदर्भ: हाल ही में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने कपास सीजन 2023-24 के लिए भारतीय कपास निगम (CCI) को ₹1,718.56 करोड़ के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) वित्तपोषण को मंजूरी दी है।
अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
- इस वित्तपोषण का उद्देश्य देश भर के कपास किसानों को प्रत्यक्ष मूल्य सहायता प्रदान करना है, जिससे कपास उगाने वाले समुदायों की आर्थिक सुरक्षा बढ़ेगी।
- कपास लगभग 60 लाख किसानों की आजीविका का साधन है और प्रसंस्करण, व्यापार तथा वस्त्र सहित संबद्ध गतिविधियों में लगे 400-500 लाख लोगों को सहायता प्रदान करता है।
- 2023-24 कपास सीजन के दौरान, भारत ने 114.47 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती करते हुए वैश्विक कपास उत्पादन में लगभग 25% का योगदान दिया।
- भारत सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर बीज कपास (कपास/kapas) के लिए MSP तय करती है।
भारत में कपास की खेती के पहलू
- कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ
- फसल का प्रकार: कपास मुख्य रूप से एक खरीफ फसल है, जिसकी बुवाई का सीजन उत्तरी भारत में अप्रैल-मई की शुरुआत में और दक्षिणी क्षेत्र में मानसून के दौरान शुरू होता है।
- तापमान: आदर्श रूप से 21°C से 30°C के बीच।
- पाला-मुक्त अवधि: इसे एक लंबी पाला-मुक्त अवधि (180-200 दिन) की आवश्यकता होती है।
- वर्षा: 50-100 सेमी (जलभराव के प्रति अत्यंत संवेदनशील, इसलिए उचित जल निकासी महत्वपूर्ण है)।
- मिट्टी: इसे विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है, जिसमें उत्तर में अच्छी जल निकासी वाली जलोढ़ मिट्टी, मध्य क्षेत्र में परिवर्तनशील गहराई वाली काली मिट्टी और दक्षिण में मिश्रित काली और लाल मिट्टी शामिल है।
- प्रमुख कपास उत्पादक राज्य
- भारत एकमात्र ऐसा देश है जो कपास की सभी चार प्रजातियाँ उगाता है: जी. आर्बोरियम (एशियाई कपास), जी. हर्बेरियम (एशियाई कपास), जी. बारबाडेंस (मिस्र की कपास) और जी. हिर्सुटम (अमेरिकी अपलैंड कपास)।
- भारत में अधिकांश कपास उत्पादन 9 प्रमुख राज्यों से आता है:
- उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान।
- मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश।
- दक्षिणी क्षेत्र: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक।
- वैश्विक स्थिति और व्यापार
- भारत कपास उत्पादन और उपभोग दोनों में विश्व स्तर पर दूसरे स्थान पर है। 2024-25 के दौरान विश्व उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 20% और वैश्विक खपत में लगभग 21.4% है।
- निर्यात: कपास के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक, जिसका अनुमानित निर्यात 18 लाख गांठ (0.31 मिलियन मीट्रिक टन) है, जो विश्व निर्यात का 3.23% है।
- बीटी कपास (Bt Cotton)
- यह कपास का एक आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) संस्करण है जो बीटी बैक्टीरिया से ‘क्राय प्रोटीन’ (जैसे Cry1Ac और Cry2Ab) उत्पन्न करता है, जो बॉलवर्म जैसे कीटों को लक्षित करता है।
- वर्तमान में यह भारत के कपास क्षेत्र के लगभग 95% भाग को शामिल करता है।
कपास की खेती का महत्व
- बहुउद्देशीय फसल (तिहरा आउटपुट): यह एक अत्यंत बहुमुखी फसल है जिससे तीन मुख्य उत्पाद प्राप्त होते हैं: लिंट फाइबर (रेशा), बिनोला (कपास का बीज) और उप-उत्पाद/अपशिष्ट।
- कपड़ा क्षेत्र की रीढ़: भारत के कपड़ा उद्योग में कपास का केंद्रीय स्थान है, जो कुल रेशा खपत में लगभग दो-तिहाई योगदान देता है।
- पशुधन और चारा उद्योग में भूमिका: बिनोला के उप-उत्पाद, विशेष रूप से बिनोला खल (cottonseed cake), चारा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- पोषक तत्वों से भरपूर पशु चारा: तेल निकालने के बाद बचा हुआ बिनोला खल (बीज का लगभग 80-85%) प्रोटीन से भरपूर होता है और मवेशियों तथा पोल्ट्री के चारे के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
भारत में कपास क्षेत्र की चुनौतियाँ
- जलवायु परिवर्तनशीलता: अनियमित वर्षा, बार-बार सूखा, बाढ़, घटती मिट्टी की उर्वरता और अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएं उत्पादकता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं।
- कम उत्पादकता: किसानों का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक खेती के तरीकों पर निर्भर है, जिसके परिणामस्वरूप कम पैदावार और निम्न गुणवत्ता वाला रेशा प्राप्त होता है।
- तकनीकी अंतराल: आधुनिक प्रौद्योगिकियों, गुणवत्तापूर्ण बीजों और प्रभावी खरपतवार प्रबंधन तक सीमित पहुंच, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए उत्पादकता को और कम करती है।
- कीटों का प्रकोप: कपास की फसलें पिंक बॉलवर्म (PBW) और विभिन्न कवक संक्रमणों के प्रति तेजी से संवेदनशील हो रही हैं। जीएम कपास किस्मों की घटती प्रभावशीलता ने समस्या को और बढ़ा दिया है।
- मूल्य अस्थिरता: संगठित बाजारों तक सीमित पहुंच के कारण किसान अक्सर MSP से नीचे अपनी उपज बेचने को मजबूर होते हैं। वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव भी आय स्थिरता को प्रभावित करता है।
कपास उद्योग को सहायता देने के लिए सरकारी पहल
- कपास उत्पादकता मिशन (Mission for Cotton Productivity): बजट 2025-26 में घोषित, यह मिशन उच्च पैदावार के लिए वैज्ञानिक और तकनीक-आधारित सहायता प्रदान करता है।
- NFSM कपास विकास कार्यक्रम: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का हिस्सा, जो उत्पादकता बढ़ाने के लिए 15 प्रमुख राज्यों में प्रदर्शन (demos) और उच्च घनत्व रोपण को बढ़ावा देता है।
- कस्तूरी कॉटन भारत (Kasturi Cotton Bharat): वस्त्र मंत्रालय और CCI द्वारा संचालित ट्रैसेबिलिटी और ब्रांडिंग कार्यक्रम।
- पीएम मित्रा (PM MITRA) पार्क: कपास प्रसंस्करण सहित निवेश और बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के लिए 7 एकीकृत वस्त्र पार्कों का निर्माण।
- बेल आइडेंटिफिकेशन एंड ट्रेसेबिलिटी सिस्टम (BITS): आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए भारतीय कपास निगम द्वारा ब्लॉकचेन-आधारित पहल।
- कॉट-एली (Cott-Ally) ऐप: किसानों तक बेहतर पहुंच और सेवा वितरण सुनिश्चित करने के लिए।

