संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप,  उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।

संदर्भ: हाल ही में, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय (OPSA) ने “तकनीकी-कानूनी ढांचे के माध्यम से एआई शासन के सुदृढ़ीकरण” शीर्षक से एक श्वेत पत्र जारी किया। इसमें एक विश्वसनीय, जवाबदेह और नवाचार-अनुकूल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) इकोसिस्टम बनाने के भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह प्रकाशन “भारत के एआई इकोसिस्टम के लिए उभरती नीतिगत प्राथमिकताएं” विषय पर श्वेत पत्र श्रृंखला का दूसरा भाग है। यह प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय की एक पहल है जिसका उद्देश्य एआई नीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर समझ विकसित करना और सूचित चर्चा को बढ़ावा देना है।
  • इस श्रृंखला का पहला श्वेत पत्र दिसंबर 2025 में जारी किया गया था और यह “एआई अवसंरचना तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण पर केंद्रित था। इसमें एआई अवसंरचना को एक साझा राष्ट्रीय संसाधन मानने की आवश्यकता और उच्च गुणवत्ता वाले डेटासेट तक पहुंच, किफायती कंप्यूटिंग संसाधन और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के साथ एकीकरण जैसे प्रमुख समर्थक कारकों की पहचान की गई थी।

श्वेत पत्र की मुख्य विशेषताएँ

  • पारंपरिक “कमांड-एंड-कंट्रोल” विनियमन से “तकनीकी-कानूनी” एआई शासन की ओर संक्रमण: यह एक व्यावहारिक और संपूर्ण इकोसिस्टम मॉडल है जो शासन को  ‘डिफ़ॉल्ट’ रूप से सीधे एआई प्रणालियों के डिजाइन और संचालन में समाहित करता है। इसका उद्देश्य जोखिमों को कम करते हुए लचीलापन और नवाचार को बनाए रखना है।
    • इस ढांचे को गोपनीयता सुरक्षा के साथ समावेशिता, समानता और मॉडल उपयोगिता के विचारों के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन स्थापित करना चाहिए।
  • कवर किए गए प्रमुख फोकस क्षेत्र:
    • एआई गवर्नेंस के प्रति तकनीकी-कानूनी दृष्टिकोण को समझना।
    • संपूर्ण एआई जीवनचक्र में सुरक्षित और विश्वसनीय एआई को सक्षम बनाना।
    • तकनीकी-कानूनी शासन के संचालन के लिए तकनीकी मार्ग।
    • भारत के एआई शासन फ्रेमवर्क के लिए कार्यान्वयन संबंधी विचार-विमर्श।
    • तकनीकी-कानूनी उपकरणों और अनुपालन तंत्र का विकास।
  • राष्ट्रीय डेटाबेस:
    • सुरक्षा विफलताओं, पक्षपाती परिणामों, सुरक्षा उल्लंघन और एआई के दुरुपयोग को रिकॉर्ड करना, उनका वर्गीकरण और विश्लेषण करना।
    • भारत-विशिष्ट ‘जोखिम वर्गीकरण’, प्रणालीगत प्रवृत्तियों और उभरते खतरों की पहचान, डेटा-संचालित ऑडिट और लक्षित नियामक हस्तक्षेपों जैसे उपायों के माध्यम से परिनियोजन के बाद जवाबदेही को सक्षम करना।
  • इस राष्ट्रीय डेटाबेस में सार्वजनिक निकायों, निजी संस्थाओं, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों द्वारा प्रस्तुत ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट होनी चाहिए।
  • एआई-उद्योग के लिए उपाय: पारदर्शिता रिपोर्ट प्रकाशित करना, नियमित निष्पक्षता और सुदृढ़ता परीक्षण करना, सुरक्षा की समीक्षा करना और ‘रेड-टीमिंग’ (Red-teaming) अभ्यास करना।
    • ये कदम संगठनों को आवश्यकताओं के अनिवार्य बनने से पहले अनुपालन प्रक्रियाओं और दस्तावेजीकरण से परिचित होने में सक्षम बनाते हैं।
  • संस्थागत संरचना:
    • एआई गवर्नेंस ग्रुप (AIGG): मंत्रालयों, नियामकों और हितधारकों के बीच एआई शासन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार द्वारा अध्यक्षता की जाती है।
    • एआई सुरक्षा संस्थान (AISI): एआई प्रणालियों के मूल्यांकन, परीक्षण और प्रमाणन के लिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे सुरक्षा और नैतिक मानकों को पूरा करते हैं।
  • प्रौद्योगिकी और नीति विशेषज्ञ समिति (TPEC): AIGG के कामकाज में सहायता करने के लिए,इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को एक समर्पित समिति (TPEC) स्थापित करनी चाहिए। इसमें कानून, सार्वजनिक नीति, मशीन लर्निंग, एआई सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और सार्वजनिक प्रशासन जैसे क्षेत्रों के बहु-विषयक विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है।
  • प्रभाव-सचेत डेटा विलोपन तंत्र: भाषाई और जनसांख्यिकीय रूप से विविध देश में गोपनीयता, बहिष्करण और असमानता के जोखिमों को कम करने के लिए, बिना शर्त डेटा हटाने के बजाय’ प्रभाव-सचेत डेटा विलोपन तंत्र’ की आवश्यकता है।
  • बड़े पैमाने पर प्राप्त ‘अनलर्निंग’ अनुरोधों का निष्पादन, निष्पक्षता एवं प्रतिनिधित्व संबंधी प्रभाव मूल्यांकन के आधार पर ही सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

रिपोर्ट का महत्व

  • सूक्ष्म एआई गवर्नेंस ढांचा: यह एआई शासन के प्रति भारत के नवाचार-समर्थक दृष्टिकोण को उजागर करता है, जो कानूनी सुरक्षा उपायों, क्षेत्र-विशिष्ट नियमों, तकनीकी नियंत्रणों और संस्थागत तंत्रों को एकीकृत करता है।
  • नियामक और तकनीकी आवश्यकता: एक मजबूत और जिम्मेदार शासन ढांचा विकसित करना केवल एक नियामक आवश्यकता नहीं है, बल्कि तकनीकी प्रगति की गति को बनाए रखने के लिए एक पूर्व शर्त है। तकनीकी-कानूनी दृष्टिकोण डिजाइन के माध्यम से ही एआई प्रणालियों में सुरक्षा उपायों को समाहित करने का मार्ग प्रदान करता है।
  • पेसिंग प्रॉब्लम” को हल करने का प्रयास: केवल बाद में प्रवर्तन पर निर्भर रहने के बजाय सिस्टम डिजाइन में ही शासन को शामिल करना।
  • वैश्विक एआई शासन को आकार देना: यह श्वेत पत्र वैश्विक एआई शासन विमर्श को आकार देने में भारत की उत्प्रेरक भूमिका को मजबूती प्रदान करते हैं।
  • भारत के डिजिटल इकोसिस्टम के साथ एकीकरण: यह श्वेत पत्र एक विश्वसनीय और सहमति-आधारित डेटा पहुँच हेतु डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) तथा डेटा एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर (DEPA) के प्रभावी उपयोग पर बल देता है।
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