सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।  

संदर्भ: झारखंड सरकार ने राज्य गठन के 25 वर्षों के बाद पेसा (PESA) अधिनियम के तहत नियमों को लागू किया।

झारखंड में PESAनियम

  • कवरेज का विस्तार: नएझारखंड के 24 जिलों में से 13 जिलों में पूरी तरह से लागू होंगे, जिनमें राँची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला, दुमका, जामताड़ा, साहिबगंज और पाकुड़ में पूरी तरह से लागू होते हैं।
  • पलामू, गोड्डा और गढ़वा में इनका आंशिक कार्यान्वयन शुरू हो चुका है।
  • पंचायती राज्य संस्थाओं के साथ संरेखण: अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि पेसा नियम भी अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज चुनावों को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित नहीं करेंगे।
  • झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001, पहले से ही पेसा के अनुरूप है, जिससे त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली अपरिवर्तित बनी रहेगी।
  • ग्राम सभा का सशक्तिकरण: अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को सर्वोच्च प्राधिकारी के रूप में नामित किया गया है।
  • ग्राम सभा के अध्यक्ष का चयन गाँव की स्थापित पारंपरिक प्रथाओं के अनुसार किया जाएगा।
  • ग्राम सभा का क्षेत्राधिकार: ग्राम सभाएं अपनी पारंपरिक सीमाओं के भीतर गौण खनिजों और छोटे जल निकायों सहित प्राकृतिक और सामुदायिक संसाधनों का प्रबंधन करेंगी।
  • उन्हें सामाजिक बुराइयों के खिलाफ कार्रवाई करने, अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर विवादों को सुलझाने और 2,000 रुपये तक का जुर्माना लगाने के लिए भी अधिकृत किया गया है।
  • जिला प्रशसान की भूमिका जिला उपायुक्त (DC) ग्राम सभाओं और उनकी सीमाओं को मान्यता देंगे और उन्हें अधिसूचित करेंगे।
  • वार्षिक विकास योजना: जिला स्तर पर एक बहुविषयक टीम ग्राम सभाओं के साथ परामर्श करके वार्षिक विकास योजनाएं तैयार करेगी।

झारखंड में पेसानियमों का महत्त्व

  • जनजातीय स्व-शासन: 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड की जनसंख्या में आदिवासियों की हिस्सेदारी 26.3% है जहाँ 32 आदिवासी समुदाय हैं। इनमें आठ विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) हैं। ये नए नियम जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के नियंत्रण को बढ़ाने और उनकी स्वायत्तता को बहाल करने के उद्देश्य से लागू किए गए हैं।
  • समावेशी विकास योजना: जिला अधिकारियों द्वारा ग्राम सभाओं के परामर्श से वार्षिक विकास योजनाएं तैयार करने का प्रावधान ‘सहभागी शासन’ को बढ़ावा देता है और स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं का समाधान करता है।
  • आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता: इस कानून के लागू होने से पारंपरिक कानूनों के तहत काम करने वाली आदिवासी ग्राम सभाओं के पारंपरिक अधिकारों और कर्तव्यों को संवैधानिक मान्यता मिलेगी।

झारखंड में पेसानियमों के संबंध में चिंताएं

  • मूल पेसा अधिनियम के प्रावधान का शिथिलीकरण: आलोचकों का मानना है कि पेसा अधिनियम के खंड 4(a) और 4(d)  जो आदिवासियों के अपने पारंपरिक कानून, धार्मिक प्रथाओं और सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण करते थे, उन्हें नए नियमों में शामिल नहीं किया गया है।
  • ‘सामुदायिक स्वामित्व’ शब्द को भी हटा दिया गया है।
  • जिला अधिकारियों को अत्यधिक शक्तियाँ: ग्राम सभाओं को मान्यता देने की जिम्मेदारी जिला अधिकारियों को सौंपना, पारंपरिक स्वशासन के बजाय प्रशासनिक नियंत्रण को दर्शाता है, जिससे ग्राम सभा के अधिकार का हनन होता है।
  • ग्राम सभा की सीमित शक्ति: नियमों में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMF) कोष या जनजातीय उप-योजना (TSP) पर ग्राम सभा के अधिकार का उल्लेख नहीं है, जिससे प्रमुख स्थानीय संसाधनों पर उनका नियंत्रण सीमित हो गया है।
  • प्रमुख विकास क्षेत्रों का बहिष्करण: राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 6.08% आदिवासी परिवारों के पास वेतनभोगी रोजगार है, और 2011 में अनुसूचित जनजातियों की साक्षरता दर 57.2% थी।
  • ग्राम सभा के अधिकारों को केवल गौण खनिजों और वन उपज तक सीमित रखना, और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा रोजगार जैसे क्षेत्रों को इससे बाहर रखने से आदिवासी कमजोर ही बने रहेंगे।

पेसाअधिनियम, 1996के बारे में

  • पेसा (PESA) को 24 दिसंबर 1996 को लागू किया गया था, ताकि संविधान के भाग IX (73वां संशोधन अधिनियम, 1992) का पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों तक विस्तार किया जा सके।  पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र वे हैं जहाँ मुख्य रूप से आदिवासी आबादी निवास करती है।
    • पंचायती राज मंत्रालय द्वारा 24 दिसंबर को पेसा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • अनुच्छेद 243M के तहत, संविधान के भाग IX (पंचायत) के प्रावधानों से 5वीं और 6वीं अनुसूची के क्षेत्रों, तथा कुछ अन्य क्षेत्रों/राज्यों को छूट दी गई है। हालांकि, संसद कानून के माध्यम से, कुछ संशोधनों और छूटों के साथ भाग IX के प्रावधानों का अनुसूचित क्षेत्रों (5वीं अनुसूची) और जनजातीय क्षेत्रों (6वीं अनुसूची) तक विस्तार कर सकती है।
  • इसके तहत, भूरिया समिति की सिफारिशों पर, संसद ने संविधान के भाग IX (73वां संशोधन अधिनियम, 1992) का विस्तार 5वीं अनुसूची के तहत 10 राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों तक करने के लिए ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996’ लागू किया गया।

Source :
DowntoEarth
Indian Express
PIB

Shares: