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सामन्य अध्ययन 2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल ढाँचा; सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
संदर्भ: हाल ही में, गुजरात विधानसभा ने समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पारित किया, जिससे वह उत्तराखंड के बाद UCC को अपनाने वाला दूसरा राज्य बन गया है।
UCC के मुख्य प्रावधान

- विवाह का अनिवार्य पंजीकरण:
- विधेयक के अंतर्गत सभी धर्मों में 60 दिनों के भीतर विवाह का अनिवार्य पंजीकरण आवश्यक है। नियम का उल्लंघन करने पर ₹10,000 तक के दंड का प्रावधान है।
- इसके अतिरिक्त, जबरन, धोखाधड़ी या बहु-विवाह के मामलों में सात वर्ष तक के कारावास का दंड निर्धारित है।
- एकसमान तलाक ढांचा:
- यह एक ऐसी एकसमान तलाक प्रणाली प्रस्तुत करता है जहाँ न्यायालय की स्वीकृति और पंजीकरण अनिवार्य है।
- न्यायालय के बाहर दिए गए तलाक मान्य नहीं होंगे और ऐसा करने पर तीन वर्ष तक का कारावास हो सकता है।
- यह महिलाओं को पुनर्विवाह का अप्रतिबंधित अधिकार भी प्रदान करता है।
- समान उत्तराधिकार अधिकार: यह विधेयक सभी धर्मों में पुत्रों और पुत्रियों के लिए समान उत्तराधिकार और विरासत अधिकारों की गारंटी देता है, जिसका उद्देश्य लैंगिक समानता और महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा को बढ़ावा करना है।
- लिव-इन रिलेशनशिप का विनियमन: लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य है। पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक का कारावास या ₹10,000 का जुर्माना हो सकता है। यदि भागीदारों की आयु 18 से 21 वर्ष के बीच है, तो अधिकारी उनके माता-पिता को सूचित करेंगे।
- कानूनी सुरक्षा उपाय:
- इस विधेयक के प्रावधान अनुसूचित जनजातियों (ST) के सदस्यों और उन समूहों पर लागू नहीं होते जिनके प्रथागत अधिकार संविधान के तहत संरक्षित हैं।
- यह विधेयक महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार और लिव-इन संबंधों से जन्में हुए बच्चों को कानूनी मान्यता प्रदान करता है।
- इसमें जबरदस्ती, धोखाधड़ी या बाल संरक्षण कानूनों के तहत नाबालिगों से जुड़े मामलों में कठोर दंड का भी प्रावधान है।
समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में
- समान नागरिक संहिता (UCC) को नागरिक कानूनों के एक साझा सेट के रूप में परिभाषित किया गया है, जो धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं पर आधारित व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) का स्थान लेता है और सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है।
- यह धर्म पर विचार किए बिना, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे मामलों में सभी व्यक्तियों के लिए एक समान कानून की व्यवस्था करता है।
- इसे भारतीय संविधान के मूल आदर्शों के अनुरूप, एक अधिक पंथनिरपेक्ष और न्यायसंगत सामाजिक व्यवस्था को बढ़ावा देने के उपाय के रूप में देखा जाता है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता का प्रावधान करता है, जो राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) का एक हिस्सा है। यह देश भर में सभी नागरिकों पर लागू होने वाले नागरिक कानूनों के एक समान सेट की स्थापना पर बल देता है।
समान नागरिक संहिता (UCC) के उद्देश्य
- विधि के समक्ष समता: सभी नागरिकों के लिए नागरिक कानूनों का एक साझा सेट प्रदान करके, धर्म पर विचार किए बिना समान व्यवहार सुनिश्चित करता है।
- लैंगिक न्याय: व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करने का प्रयास करता है, जिससे विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में महिलाओं के लिए समान अधिकारों को बढ़ावा मिलता है।
- पंथनिरपेक्षता: नागरिक कानूनों से धर्म को अलग करके और यह सुनिश्चित करके कि शासन धार्मिक सिद्धांतों से प्रभावित न हो, पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत को सुदृढ़ करता है।
- राष्ट्रीय अखंडता: एक समान कानूनी ढांचा नागरिकों के बीच एकता और साझा पहचान की भावना विकसित करता है, जिससे राष्ट्रीय अखंडता सुदृढ़ होती है।
- कानूनों का सरलीकरण: विविध व्यक्तिगत कानूनों से उत्पन्न होने वाली जटिलता को कम करता है, जिससे एक अधिक सुसंगत और सुलभ कानूनी प्रणाली का निर्माण होता है।
- समाज का आधुनिकीकरण: प्रगतिशील और समकालीन मूल्यों को बढ़ावा देता है, जो व्यक्तिगत कानूनों को विकसित होते सामाजिक मानदंडों और संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप बनाता है।
UCC का उद्भव

- औपनिवेशिक युग:
- समान नागरिक संहिता (UCC) की अवधारणा का मूल ब्रिटिश काल है, जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
- ब्रिटिश सरकार की 1835 की रिपोर्ट ने अपराधों, साक्ष्य और अनुबंधों से संबंधित कानूनों के एकसमान संहिताबद्धकरण की वकालत की थी, जबकि इसमें हिंदू, मुस्लिम और ‘कैनन लॉ’ (ईसाई धर्म कानून) जैसे व्यक्तिगत कानूनों को बाहर रखा गया था।
- बी.एन. राव समिति का गठन 1941 में किया गया था और इसने 1947 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें हिंदू व्यक्तिगत कानूनों के संहिताकरण और सुधार की सिफारिश की गई थी।
- आजादी के बाद:
- भारत की संसद ने हिंदू व्यक्तिगत कानूनों को संहिताबद्ध करने के लिए 1955-56 के दौरान हिंदू कोड बिल पारित किए। इन विधेयकों का उद्देश्य हिंदू समाज में विवाह, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषयों में सुधार और एकरूपता लाना था।
- 1985 के शाह बानो मामले से समान नागरिक संहिता (UCC) पर बहस पुनः छिड़ गई, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने इसके कार्यान्वयन की वकालत की थी।
UCC पर महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
- शाह बानो मामला (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भरण-पोषण का अधिकार प्रदान किया। न्यायालय ने राष्ट्रीय अखंडता और लैंगिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया।
- सरला मुद्गल मामला (1995): न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि पहली शादी को तोड़े बिना दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम में धर्मांतरण गैर-कानूनी है। न्यायालय ने व्यक्तिगत कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए UCC की आवश्यकता को दोहराया।
- जॉन वल्लमतम मामला (2003): न्यायालय ने संपत्ति से संबंधित ईसाई व्यक्तिगत कानून के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को निरस्त कर दिया और यह टिप्पणी की कि UCC ऐसी असमानताओं को दूर करने में सहायक होगा।
- शायरा बानो मामला (2017): सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसने व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और लैंगिक न्याय के सिद्धांत को महत्व दिया, जिससे परोक्ष रूप से UCC का पक्ष मजबूत हुआ।
- इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018): न्यायालय ने धार्मिक रीति-रिवाजों के ऊपर संवैधानिक नैतिकता को प्राथमिकता दी। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 सर्वोपरि होने चाहिए और धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए, जो अप्रत्यक्ष रूप से समान नागरिक संहिता के उद्देश्य का समर्थन करता है।
UCC के समक्ष चुनौतियाँ
- धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता: भारत की विशाल विविधता का अर्थ है कि व्यक्तिगत कानून धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों से गहराई से जुड़े हुए हैं। एक समान कानून लागू करने को सांस्कृतिक पहचान के क्षरण के रूप में देखा जा सकता है।
- बहुसंख्यकवाद का भय: अल्पसंख्यक समुदायों में अक्सर यह डर रहता है कि UCC बहुसंख्यक (हिंदू) मानदंडों को प्रतिबिंबित कर सकता है, जिससे अल्पसंख्यकों के अधिकारों और परंपराओं की हानि हो सकती है।
- आम सहमति का अभाव: UCC की विषय-वस्तु और कार्यान्वयन पर कोई व्यापक सामाजिक या राजनीतिक सहमति नहीं है, जो इसे एक संवेदनशील मुद्दा बनाती है।
- व्यक्तिगत कानूनों की जटिलता: व्यक्तिगत कानून विविध, जटिल और कभी-कभी असहिताबद्ध (जैसे मुस्लिम लॉ) हैं, जिससे इनका एकसमान विधीय संहिताकरण कानूनी और प्रशासनिक रूप से कठिन हो जाता है।
- कार्यान्वयन की चुनौतियाँ: UCC के सुचारू संक्रमण के लिए व्यापक कानूनी सुधारों, जन जागरूकता, सार्वजनिक स्वीकार्यता और पर्याप्त संस्थागत तत्परता की आवश्यकता है।
- न्यायिक बनाम विधायी संतुलन: हालांकि न्यायालयों (जैसे शाह बानो मामला) ने UCC का समर्थन किया है, लेकिन इसका वास्तविक कार्यान्वयन विधायिका के पास है, जिससे न्यायिक वकालत और राजनीतिक कार्रवाई के बीच एक अंतराल उत्पन्न होता है।
आगे की राह
- चरणबद्ध कार्यान्वयन: समान नागरिक संहिता (UCC) को एकाएक पूर्ण रूप से लागू करने के बजाय क्रमिक रूप से पेश किया जाना चाहिए। इसकी शुरुआत व्यापक सहमति वाले क्षेत्रों जैसे कि विवाह की आयु, भरण-पोषण और उत्तराधिकार सुधारों से की जानी चाहिए।
- आम सहमति पर आधारित दृष्टिकोण: विश्वास बहाली और सामाजिक प्रतिरोध से बचने के लिए धार्मिक नेताओं, कानूनी विशेषज्ञों, नागरिक समाज और विभिन्न समुदायों को शामिल करते हुए एक व्यापक परामर्श प्रक्रिया अनिवार्य है।
- लैंगिक न्याय को प्राथमिकता पर बल: सभी व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों को हटाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि वास्तविक समानता, विशेष रूप से महिलाओं के लिए, सुनिश्चित की जा सके।
- जन जागरूकता और संवेदीकरण: सरकार को भ्रांतियों को दूर करने और समानता व न्याय सुनिश्चित करने में UCC के लाभों को उजागर करने के लिए जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।
- सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण: एकरूपता सुनिश्चित करते हुए, UCC को आवश्यक सांस्कृतिक प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए और एकता व विविधता के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
