संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।
संदर्भ: ओडिशा की नवीनतम समुद्री डॉल्फिन जनगणना में डॉल्फिन की आबादी 765 दर्ज की गई हैं, जो पिछले पांच वर्षों में सर्वाधिक है। यह राज्य की तटरेखा के निकट उनके संरक्षण प्रयासों के बेहतर परिणामों को दर्शाता है।
अन्य संबंधित जानकारी:
- वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के वन्यजीव प्रभाग ने 20 जनवरी 2026 को डॉल्फिन और सीटेशियन के आकलन हेतु वार्षिक राज्यव्यापी गणना की।
- इस जनगणना के अंतर्गत चिलिका झील, राजनगर मैंग्रोव डिवीजन, पुरी, भद्रक, बालासोर और बरहमपुर डिवीजनों को शामिल किया गया।
- डॉल्फिन आकलन अभ्यास की शुरुआत 2008 में चिलिका से हुई थी और 2015 में इसका विस्तार सभी तटीय डिवीजनों तक किया गया। अब यह एक समन्वित, विज्ञान-आधारित निगरानी कार्यक्रम के रूप में विकसित हो गया है।
जनगणना के मुख्य निष्कर्ष
- आबादी का आकार और प्रजाति संरचना: डॉल्फिन की अनुमानित आबादी 765 है, जो हाल के वर्षों की तुलना में स्थिरता से सुधार की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है।
- प्रजाति-वार वितरण:
- हम्पबैक डॉल्फिन: 497 (सर्वाधिक)
- इरावदी डॉल्फिन: 208
- बॉटलनोज डॉल्फिन: 55
- स्पिनर डॉल्फिन: 3
- फिनलेस पॉरपॉइज़: 2
- प्रजाति-वार वितरण:
- आबादी की प्रवृत्ति: 2020-21 में ओडिशा में डॉल्फिन की अनुमानित जनसंख्या 544 थी। तब से, इसकी जनसंख्या में या तो वृद्धि हो रही है या स्थिर बनी हुई है।
- डॉल्फिन की आबादी वर्ष 2021-22 में 726, 2022-23 में 733, 2023-24 में 743 और 2024-25 में 710 थी।
- स्थानिक वितरण:
- चिलिका झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी का लैगून और रामसर आर्द्रभूमि है। यहाँ 159 इरावदी डॉल्फिन दर्ज की गईं हैं जो वैश्विक स्तर पर किसी एक स्थान पर उनकी सर्वाधिक संख्या है।
- केंद्रपाड़ा जिले में स्थित गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य 474 डॉल्फिन के साथ हम्पबैक डॉल्फिन के लिए एक प्रमुख गढ़ के रूप में उभरा है।
- इरावदी डॉल्फिन तटों के पास बालासोर (15), बरहमपुर (13), पुरी (12), राजनगर/भितरकणिका मैंग्रोव (9) में भी देखी गई हैं जो चिलिका झील से परे इनके पर्यावास विस्तार को दर्शाता है।
संरक्षण का महत्व
- संरक्षण की सफलता: इनकी जनसंख्या में निरंतर वृद्धि की प्रवृत्ति ओडिशा के एकीकृत दृष्टिकोण को उजागर करती है जिसमें वैज्ञानिक निगरानी, पर्यावास प्रबंधन और सामुदायिक सहभागिता शामिल है।
- नीतिगत मूल्य: ये निष्कर्ष समुद्री जैव विविधता संरक्षण, आर्द्रभूमि एवं तटीय प्रबंधन, और नीति निर्माण के लिए आधारभूत वैज्ञानिक डेटा प्रदान करते हैं।
- जैव विविधता संकेतक: डॉल्फिन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए प्रमुख और ‘संकेतक प्रजाति’ के रूप में कार्य करती हैं। स्थिर या बढ़ती जनसंख्या ओडिशा के तटीय और लैगून प्रणालियों में सापेक्ष पारिस्थितिक लचीलेपन का सुझाव देती है।
- अनुकरणीय शासन मॉडल: ओडिशा की वार्षिक, मानकीकृत गणना पद्धति (जिसमें प्रशिक्षण, अंतर-विभागीय समन्वय और विशेषज्ञ भागीदारी शामिल है) भारत और वैश्विक स्तर पर समुद्री वन्यजीव निगरानी के लिए मॉडल के रूप में कार्य करती है।
डॉल्फिन के बारे में
- डॉल्फिन जलीय समुद्री स्तनधारी हैं जो अपनी उच्च बुद्धिमत्ता, इकोलोकेशन (Echolocation) क्षमता और जटिल सामाजिक व्यवहार के लिए जानी जाती हैं।
- वे महासागरों, ज्वारनद्मुख और कुछ मीठे पानी की प्रणालियों में रहती हैं। इरावदी डॉल्फिन जैसी प्रजातियां खारे पानी और नदी के वातावरण के लिए अनुकूल होती हैं।
- वैश्विक स्तर पर सीटेशियन की 90 से अधिक प्रजातियां हैं, जिनमें से लगभग 40 प्रजातियां डॉल्फिन हैं।
- सीटेशियन (वर्ग: सीटेशिया) स्तनधारियों का एक पूर्णतः जलीय वर्ग है जिसमें व्हेल, डॉल्फिन और पोरपॉइज़ शामिल हैं।
- भारतीय जलक्षेत्र में तटीय और समुद्री डॉल्फिन की लगभग 30 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 29 समुद्री हैं और एक ज्वारनद्मुख/झील में पाई (इरावदी डॉल्फिन) जाती है।
- डॉल्फिन को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है।
- भारत में दक्षिण एशियाई नदी डॉल्फिन के संरक्षण के लिए 2010 से 2020 तक 10 वर्षों की अवधि के लिए एक संरक्षण कार्य योजना (CAP) तैयार की गई थी।
- यह कहते हुए इस योजना की आलोचना की गई थी कि यह केवल गंगा की प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए तैयार की गई है। इसके परिणामस्वरूप 15 अगस्त 2020 को प्रोजेक्ट डॉल्फिन शुरू किया गया और नदी तथा समुद्री डॉल्फिन दोनों को इसके दायरे में लाने के लिए इसका विस्तार किया गया।
