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सामान्य अध्ययन -3: आपदा और आपदा प्रबंधन।
संदर्भ: एशिया-प्रशांत आपदा रिपोर्ट 2025 के निष्कर्षों के अनुसार, दिल्ली, कराची, शंघाई, ढाका, मनीला, सियोल और ऐसी ही अन्य घनी आबादी वाली एशियाई मेगासिटीज़ को सदी के अंत तक वैश्विक तापन के अलावा स्थानीय तापमान में 2-7 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है।
वैश्विक निष्कर्ष

- बढ़ता तापमान और चरम घटनाएँ:
- बढ़ते तापमान के कारण, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बाढ़, तूफान, सूखा, मरुस्थलीकरण और रेत/धूल भरी आंधी जैसी आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है जबकि अत्यधिक गर्मी को सबसे तेज़ी से उभरते खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
- दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया को गर्मी के जोखिमों का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है, जहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा गंभीर ऊष्मा तनाव के संपर्क में है।
- वर्ष 2024 सबसे गर्म वर्ष था; उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में हीटवेव से लगभग 33 मिलियन लोग प्रभावित हुए।
- वातावरण में नमी में वृद्धि से (1°C तापमान वृद्धि पर 7%) बांग्लादेश, समोआ और म्यांमार जैसे क्षेत्रों में तूफानों की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ रही है।
- स्वास्थ्य, आर्थिक और श्रम पर प्रभाव
- यह अनुमान है कि 2030 तक, उत्पादकता में गिरावट के कारण गर्मी से होने वाला आर्थिक नुकसान दुगुना हो जाएगा, जो 8 मिलियन पूर्णकालिक नौकरियों (80 लाख रोजगार) के नुकसान के बराबर होगा।
- अत्यधिक गर्मी के दौरान श्रम उत्पादकता में 27% तक की गिरावट आ सकती है।
- ग्लेशियर हानि या GLOF जोखिम और जल सुभेद्यता
- क्षेत्रीय ग्लेशियर इस सदी में पहले ही अपने आयतन का लगभग 5% हिस्सा खो चुके हैं।
- ग्लेशियर झील विस्फ़ोट बाढ़ (GLOF) उच्च पर्वतीय एशिया (High Mountain Asia – HMA) में 93 लाख (9.3 मिलियन) लोगों को खतरे में डालती है।
- कृषि और खाद्य प्रणालियों पर प्रभाव
- 2008 और 2018 के बीच हुए वैश्विक जलवायु आपदा के कुल नुकसान का 25% से अधिक कृषि क्षेत्र को हुआ।
- सूखा और मरुस्थलीकरण, फसल और पशुधन उत्पादकता को प्रभावित कर रहे हैं, जिसका असर विशेष रूप से अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में देखा जा रहा है।
- समुद्र स्तर में वृद्धि और तटीय खतरे: समुद्र का स्तर प्रशांत द्वीपों और पूर्वी/उत्तर-पूर्वी एशिया में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण महासागरों द्वारा वैश्विक उष्मा का 91% अवशोषित करना है।
- क्षेत्रीय जलवायु जोखिम हॉटस्पॉट : प्रशांत क्षेत्र, दक्षिण पूर्व एशिया, और पूर्वी/उत्तर-पूर्वी एशिया शामिल हैं, जो सबसे अधिक समग्र जलवायु जोखिम का सामना कर रहे हैं जबकि म्यांमार, ईरान, अमेरिकी समोआ और तुर्किये जैसे देश सबसे बुरी तरह प्रभावित होने वाले देशों में शामिल हैं।
- पूर्व चेतावनी:
- वर्तमान में, वैश्विक मौसम विज्ञान सेवाओं में से केवल आधे ही गर्मी की चेतावनी जारी करते हैं।
- 57 अतिरिक्त देशों में गर्मी की चेतावनी प्रणालियों का विस्तार करने से हर साल लगभग 1,00,000 (एक लाख) लोगों को बचाया जा सकता है।
भारत संबंधी निष्कर्ष
- अत्यधिक गर्मी और स्वास्थ्य जोखिम:
- भारत उन पाँच एशिया-प्रशांत देशों में शामिल है जो कृषि में लगातार उच्च ऊष्मीय तनाव का सामना कर रहे हैं।
- कठोर जलवायु परिस्थितियों में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में एक वर्ष में 300 से अधिक दिन हीट इंडेक्स 35°C से ऊपर रह सकते हैं, और कई क्षेत्रों में 200 दिन से अधिक समय 41°C से ऊपर का तापमान रह सकता है।
- भारत में 2024 की लू (हीटवेव) से लगभग 700 मौतें हुईं, जो इस क्षेत्र में दूसरी सबसे घातक हीटवेव रही।
- दिल्ली जैसे शहरों में शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island – UHI) प्रभाव गर्मी के जोखिम को और भी बढ़ा देता है। इसका विशेष रूप से खुले में काम करने वाले श्रमिकों, बच्चों और बुजुर्गों पर गहरा असर पड़ता है, और यह शीतलन, पानी तथा स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच को भी बाधित करता है।
- ग्लेशियरों का पिघलना और जल सुरक्षा: उच्च पर्वतीय एशिया (HMA) में पिघलते ग्लेशियर जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम पैदा करते हैं, जिसमें ग्लेशियर झील विस्फ़ोट बाढ़ (GLOFs) से उत्पन्न होने वाले खतरे भी शामिल हैं।
- भारी वर्षा और आपदा भेद्यता:
- केरल में 2024 की भारी मानसूनी वर्षा से भूस्खलन हुआ जिसमें 350 से अधिक लोग मारे गए, जो अत्यधिक वर्षा (extreme precipitation) से होने वाले खतरों को रेखांकित करता है।
- 2060 तक, भारत में अत्यधिक वर्षा में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाएगा।
प्रभाव
- स्वास्थ्य: अत्यधिक ऊष्मा मानव शरीर पर गहन तनाव उत्पन्न करती है, जिससे मौजूदा बीमारियाँ और गंभीर हो जाती हैं। इसका अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव विशेष रूप से संवेदनशील आबादी पर पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी दबाव बढ़ जाता है।
- अर्थव्यवस्था: भूकंप, सुनामी, बाढ़ और तूफान जैसी आपदाएँ महत्वपूर्ण अवसंरचना—जैसे परिवहन, ऊर्जा, जल, दूरसंचार, स्कूल और अस्पताल—को खतरे में डालती हैं। अत्यधिक गर्मी श्रमिकों की उत्पादकता को घटाती है, जिससे 2030 तक खोए हुए कार्य घंटे दोगुने हो सकते हैं।
- कृषि: बढ़ती गर्मी फसलों की पैदावार, पशुधन की उत्पादकता और काम करने की क्षमता को घटाती है, जिससे ग्रामीण गरीबी और बढ़ती है। अफ़ग़ानिस्तान, भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश सबसे उच्च कृषि-गर्मी जोखिम वाले देशों में शामिल हैं।
- ऊर्जा: गर्मी के कारण शीतलीकरण के लिए बिजली की मांग बढ़ती है, और 2050 तक एयर कंडीशनर की ऊर्जा खपत तीन गुना होने की उम्मीद है। उच्च तापमान विद्युत उत्पादन की दक्षता को कम करता है और विद्युत संयंत्रों पर दबाव बढ़ाता है।
Sources:
Downtoearth
Downtoearth
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