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सामान्य अध्ययन 2: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप; केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ।

सामान्य अध्ययन 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय; समावेशी विकास; सूक्ष्म वित्त संस्थानों, स्वयं सहायता समूहों और NBFCs की भूमिका।

संदर्भ: हाल ही में, भारत सरकार ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों के लिए क्रेडिट गारंटी योजना-2.0 (CGSMFI-2.0) की शुरुआत की।

योजना के बारे में 

• इस योजना का उद्देश्य नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी लिमिटेड (NCGTC) के माध्यम से बैंकों और वित्तीय संस्थानों को संभावित नुकसान के विरुद्ध गारंटी कवर प्रदान करना है।

• यह गारंटी उन नुकसानों पर लागू होती है जो बैंकों द्वारा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी-सूक्ष्म वित्त संस्थानों (NBFC-MFIs) और अन्य सूक्ष्म वित्त संस्थानों को छोटे ऋणकर्ताओं को आगे ऋण देने के लिए प्रदान की गई वित्तीय सहायता के कारण होते हैं।

योजना की मुख्य विशेषताएँ

• पात्र ऋणकर्ता: इसके अंतर्गत वे सभी मौजूदा या नए लघु ऋणकर्ता पात्र हैं, जो भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा समय-समय पर निर्धारित सूक्ष्म वित्त (Microfinance) की नियामक परिभाषा के दायरे में आते हैं।

• गारंटी कवरेज: ऋण डिफ़ॉल्ट की स्थिति में, यह योजना छोटे संस्थानों के लिए 80%, मध्यम के लिए 75% और बड़े NBFC-MFIs/MFIs के लिए 70% तक की राशि का गारंटी कवर प्रदान करती है।

• गारंटी शुल्क: स्वीकृत राशि (प्रथम वर्ष) और बकाया राशि (उसके बाद) पर 0.50% प्रति वर्ष का शुल्क देय होगा।

• ब्याज दर: सदस्य ऋण संस्थानों (MLIs) द्वारा सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFIs) को दिए जाने वाले ऋण पर ब्याज दर EBLR या MCLR + 2% प्रति वर्ष तक सीमित है। छोटे ऋणकर्ताओं को आगे ऋण देने के लिए, इन संस्थानों को ब्याज दर पिछले छह महीनों की अपनी औसत ऋण दर से कम से कम 1% कम रखनी होगी।

• वैधता: यह योजना 30.06.2026 तक या 20,000 करोड़ रुपये तक के ऋणों की गारंटी दिए जाने तक (जो भी पहले हो) वैध है।

योजना के प्रभाव

• यह योजना सूक्ष्म वित्त संस्थान (MFI) क्षेत्र में ऋण प्रवाह को बढ़ाने में सहायता करेगी।

• यह अनुमान लगाया गया है कि यह योजना NBFC-MFIs/MFIs द्वारा लगभग 36 लाख छोटे ऋणकर्ताओं को आगे ऋण देने की सुविधा प्रदान करेगी।

सूक्ष्म वित्त (माइक्रोफाइनेंस) क्या है?

• यह वित्तीय सेवा का एक रूप है जो निर्धन और निम्न-आय वाले परिवारों को निरंतर और वैध तरीके से लघु ऋण और अन्य वित्तीय सेवाएँ प्रदान करता है।

• यह एक आर्थिक उपकरण है जो निम्न-आय वाले परिवारों को गरीबी से बाहर निकलने, आय बढ़ाने और जीवन स्तर में सुधार करने में मदद करके वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देता है।

• यह उन राष्ट्रीय नीतियों की प्राप्ति में सहायक हो सकता है जिनका लक्ष्य निर्धनता उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण, कमजोर समूहों को सहायता प्रदान करना और जीवन स्तर में सुधार करना है।

भारत में सूक्ष्म वित्त के व्यावसायिक मॉडल

भारत में सूक्ष्म वित्त सेवाओं के विस्तार के लिए मुख्य रूप से दो अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए जाते हैं:

1. बैंक-आधारित दृष्टिकोण:

• इस मॉडल की मुख्य विशेषता स्वयं सहायता समूह (SHG)-बैंक लिंकेज कार्यक्रम है, जिसकी शुरुआत नाबार्ड (NABARD) द्वारा 1992 में की गई थी।

  • स्वयं सहायता समूह (SHGs) 10-20 सदस्यों (मुख्य रूप से महिलाओं) के अनौपचारिक समूह होते हैं, जो अपनी बचत को एकत्रित करते हैं और SHG-बैंक लिंकेज कार्यक्रम (SHG-BLP) के तहत औपचारिक ऋण तक पहुँच प्राप्त करते हैं।

2. सूक्ष्म वित्त संस्थान (MFI)-आधारित दृष्टिकोण:

• सूक्ष्म वित्त संस्थान (MFIs) सूक्ष्म-ऋण के साथ-साथ बचत, बीमा और प्रेषण  जैसी अन्य वित्तीय सेवाएँ प्रदान करते हैं।

• ऋण आमतौर पर संयुक्त देयता समूहों (Joint Lending Groups – JLGs) के माध्यम से प्रदान किए जाते हैं। ये समान आर्थिक गतिविधियों में लगे 4-10 सदस्यों के अनौपचारिक समूह होते हैं जो संयुक्त रूप से ऋण का पुनर्भुगतान करते हैं।

भारत में सूक्ष्म वित्त ऋणदाता 

• लघु वित्त बैंक: ये बैंक छोटे किसानों, सूक्ष्म उद्योगों और असंगठित संस्थाओं सहित वंचित वर्गों को जमा और ऋण जैसी बुनियादी बैंकिंग सेवाएँ प्रदान करते हैं।

• गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी-सूक्ष्म वित्त संस्थान (NBFC-MFIs): ये संस्थान अपने स्वयं के संसाधनों या बैंकों से ऋण के माध्यम से धन जुटाते हैं और संयुक्त देयता समूहों को ऋण प्रदान करते हैं।

• गैर-लाभकारी सूक्ष्म वित्त संस्थान: ये गैर-सरकारी संगठन (NGOs) सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 या भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1880 के तहत पंजीकृत होते हैं और सूक्ष्म-ऋण सेवाएँ प्रदान करते हैं।

• सहकारी समितियाँ: प्रासंगिक कानूनों के तहत पंजीकृत संस्थाएं, जैसे कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (PACS), सूक्ष्म वित्त सेवाएँ प्रदान करती हैं।

सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFIs) का विनियमन

• मालेगाम समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) दिसंबर 2011 में पेश किए गए NBFC-MFI फ्रेमवर्क के माध्यम से सूक्ष्म वित्त संस्थानों को विनियमित करता है।

• ये दिशानिर्देश पंजीकरण की पात्रता, ऋणकर्ता संरक्षण, अत्यधिक ऋणग्रस्तता की रोकथाम, डेटा गोपनीयता और ब्याज दर विनियमन जैसे प्रमुख क्षेत्रों को संबोधित करते हैं, जिससे इस क्षेत्र में अधिक पारदर्शिता और विश्वास सुनिश्चित होता है।

सूक्ष्म वित्त का महत्व

• वित्तीय समावेशन: सूक्ष्म-ऋण उन लोगों को महत्वपूर्ण ऋण प्रदान करते हैं जिनकी औपचारिक बैंकिंग तक पहुँच नहीं है। लगभग 70% ग्रामीण परिवार उच्च आय सीमा से लाभान्वित हो रहे हैं, जिससे सूक्ष्म वित्त संस्थानों (MFI) की पहुँच और वित्त तक सुलभता बढ़ी है।

  • जीविका  पहल जैसे कार्यक्रमों ने उच्च ब्याज वाले साहूकारों पर निर्भरता कम की है और स्वयं सहायता समूह (SHG)-आधारित ऋणों के माध्यम से उधार लेने की लागत में कमी आई है।

• निर्धनता उन्मूलन: कई प्रभाव अध्ययनों से पता चलता है कि सूक्ष्म-ऋणों से ग्रामीण गरीबी में कमी आई है, पारिवारिक आय में वृद्धि हुई है और शिक्षा एवं स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले व्यय में कमी आई  है।

• महिला सशक्तिकरण: सूक्ष्म वित्त कार्यक्रम महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने या विस्तार करने के लिए सशक्त बनाते हैं, जिससे उनकी आय और सामाजिक स्थिति में वृद्धि होती है। भारत में 6 करोड़ से अधिक महिलाएँ इन ऋणों का लाभ उठा रही हैं, जिससे लगभग 30 करोड़ परिवार प्रभावित हुए हैं।

• कृषि उत्पादन को बढ़ावा: कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म-ऋण किसानों को बेहतर निवेश करने में सक्षम बनाते हैं, जिससे उत्पादकता और फसल की पैदावार बढ़ती है।

• स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का गठन: स्वयं सहायता समूह सदस्यों के बीच सामूहिक ऋण और बचत की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे आपसी सहयोग को बढ़ावा मिलता है और व्यक्तिगत जोखिम कम होता है।

• आय के स्रोतों का विविधीकरण: सूक्ष्म-ऋणों तक पहुँच ने परिवारों को पारंपरिक कृषि से परे अपने आय के स्रोतों में विविधता लाने की अनुमति दी है, जिससे बाजार के उतार-चढ़ाव और पर्यावरणीय झटकों के प्रति उनकी संवेदनशीलता हुई है।

भारत में सूक्ष्म वित्त की चुनौतियाँ 

• नियामक दबाव: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा सख्त नियामक जाँच और क्षेत्रीय राजनीतिक हस्तक्षेप (जैसे ऋण माफी की अफवाहें, विशेष रूप से बिहार जैसे राज्यों में) ऋणकर्ताओं को पुनर्भुगतान रोकने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

• उच्च ब्याज दरें: इन ऋणों की असुरक्षित प्रकृति के कारण, इनकी सर्विसिंग की लागत अधिक होती है, जिससे ब्याज दरें 12-30% तक पहुँच जाती हैं।

• परिचालन संबंधी तनाव: क्षेत्र-आधारित संग्रहण तंत्र परिचालन चुनौतियों और लागतों को बढ़ा देते हैं।

• डिजिटल अंतराल: डिजिटल प्रगति के बावजूद, 90% से अधिक पुनर्भुगतान नकद में किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, क्रेडिट रिपोर्टिंग में मौजूदा कमियाँ ऋणकर्ताओं को एक साथ कई स्रोतों से ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

SOURCES:
PIB
IBEF
USFB

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