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संदर्भ: हाल ही में, भारत के उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि सशस्त्र बलों में महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों को स्थायी कमीशन (PC) देने से इनकार करना, संस्थागत भेदभाव और असमान मूल्यांकन ढांचे पर आधारित था।

मामले की पृष्ठभूमि

  • 1990 के दशक की शुरुआत में महिलाओं को सशस्त्र बलों में केवल शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के माध्यम से शामिल किया गया था, जो एक सीमित अवधि (14 वर्ष तक) के लिए सेवा की अनुमति देता है। इसके विपरीत, स्थायी कमीशन (PC) सेवानिवृत्ति तक पूर्ण करियर सुनिश्चित करता है।
  • इस संरचनात्मक सीमा के परिणामस्वरूप महिला अधिकारियों के लिए करियर की प्रगति बाधित हुई, उन्हें पेंशन से वंचित होना पड़ा और नेतृत्व की भूमिकाओं तक उनकी पहुँच सीमित रही।
  • स्थायी कमीशन (PC) प्रदान करने में लैंगिक भेदभाव के मुद्दे को पहले भी ऐतिहासिक निर्णयों में संबोधित किया गया था, जैसे कि:
    • बबीता पुनिया वाद (2020): इस निर्णय में महिलाओं को स्थायी कमीशन (PC) और कमांड भूमिकाओं के लिए पात्र माना गया।
    • लेफ्टिनेंट कर्नल नितिशा वाद (2021): इस वाद ने मूल्यांकन प्रणालियों में व्याप्त संरचनात्मक भेदभाव को उजागर किया।
  • इन निर्णयों के बावजूद, कार्यान्वयन में अंतराल बने रहे, विशेष रूप से 2019 के आसपास नीतिगत परिवर्तनों के बाद, जहाँ चयन बोर्डों ने उन मानदंडों और सेवा अभिलेखों  का उपयोग करके स्थायी कमीशन के लिए महिला अधिकारियों का मूल्यांकन किया, जो उस अवधि के दौरान विकसित किए गए थे जब वे दीर्घकालिक करियर के लिए पात्र भी नहीं थीं।
  • विंग कमांडर सुचेता एडन और अन्य महिला SSC अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह ने स्थायी कमीशन से इनकार, मनमानी मूल्यांकन प्रक्रियाओं, चयन बोर्डों में पारदर्शिता की कमी और पिछले सेवा अभिलेखों के भेदभावपूर्ण प्रभाव को चुनौती दी।
  • केंद्र सरकार ने इस नीति का बचाव करते हुए इसे ‘लिंग-तटस्थ’ और सेवा आवश्यकताओं पर आधारित बताया, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ‘संस्थागत पूर्वाग्रह’ और ‘असमान अवसर संरचनाओं’ ने महिलाओं को प्रतिकूल स्थिति  में रखना जारी रखा।

निर्णय के मुख्य बिंदु

  • संरचनात्मक भेदभाव की मान्यता: न्यायालय ने यह माना कि स्थायी कमीशन (PC) से इनकार करना उस संस्थागत भेदभाव का परिणाम था, जो इस पुरानी धारणा से उपजा था कि महिलाएँ सशस्त्र बलों में दीर्घकालिक करियर नहीं बनाए रखेंगी।
  • दोषपूर्ण मूल्यांकन ढांचा: मूल्यांकन प्रणाली को संरचनात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण पाया गया क्योंकि महिला अधिकारियों का मूल्यांकन ‘अल्पकालिक सेवा मानसिकता’ के तहत किया गया था, जिसके कारण:
    • वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में उन्हें अनौपचारिक या निम्न ग्रेडिंग दी गई।
    • करियर-संवर्द्धक पाठ्यक्रमों और प्रमुख नियुक्तियों से वे वंचित हुईं।
    • उनके खराब सेवा प्रोफाइल बने, जिससे उनकी तुलनात्मक योग्यता प्रभावित हुई।
  • योग्यता और समानता पर प्रभाव: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अवसर की असमानता सीधे तौर पर पारस्परिक योग्यता (Inter se merit) को विकृत करती है, क्योंकि पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मूल्यांकन समान करियर संभावनाओं के बिना किया गया था।
  • चिह्नित सेवा-वार कमियाँ:
    • थल सेना: अनौपचारिक ग्रेडिंग और समान अवसरों से वंचना ने संरचनात्मक प्रतिकूलता उत्पन्न की।
    • नौसेना: मूल्यांकन मानदंडों और रिक्तियों का खुलासा न करने के कारण पारदर्शिता का अभाव रहा।
    • वायु सेना: 2019 के मानदंडों का एकाएक प्रयोग और अल्पकालिक रिकॉर्ड पर अनुचित निर्भरता देखी गई।
  • संस्थागत तर्कों की अस्वीकार्यता:
    • स्थायी कमीशन (PC) प्रभावी रूप से केवल पुरुषों के लिए विशिष्ट नहीं रह सकता।
    • रिक्तियों की सीमाएँ अपरिहार्य नहीं हैं और वे असमानता को उचित नहीं ठहरा सकतीं।
    • संवैधानिक गारंटी प्रशासनिक प्रथाओं पर सर्वोपरि हैं।
    • न्यायालय ने मूल्यांकन मानदंडों में पारदर्शिता और रिक्तियों तथा मूल्यांकन प्रणाली के पूर्व प्रकटीकरण को भी अनिवार्य किया।
  • प्रभावित अधिकारियों को राहत: न्यायालय ने निम्नलिखित राहत प्रदान करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया:
    • 20 वर्ष की सेवा की काल्पनिक पूर्णता
    • पेंशन और पारिणामिक लाभ  (पूर्ण भूतलक्षी बकाया राशि के बिना)।
    • पुनर्बहाली नहीं (परिचालन प्रभावशीलता को ध्यान में रखते हुए।
    • काल्पनिक पदोन्नति नहीं (संस्थागत संतुलन बनाए रखने के लिए)।
  • संवैधानिक शक्तियों का उपयोग: अनुच्छेद 142 का आह्वान करते हुए, न्यायालय ने पूर्ण न्याय सुनिश्चित किया और पुष्टि की कि महिलाओं को स्थायी कमीशन (PC) प्रदान करना एक संवैधानिक दायित्व है, न कि विवेकाधीन नीतिगत विकल्प।

स्थायी कमीशन के बारे में

  • स्थायी कमीशन सशस्त्र बलों में एक ऐसे करियर पथ को संदर्भित करता है जहाँ एक अधिकारी सेवानिवृत्ति तक सेवा करता है, जो दीर्घकालिक करियर प्रगति, नेतृत्व के अवसर और पेंशन लाभ सुनिश्चित करता है।
  • इसके विपरीत, SSC कार्यकाल को सीमित करता है (सामान्यतः 14 वर्ष तक), जिससे करियर की उन्नति और सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा बाधित होती है।
  • हालाँकि 2020 के बाद से न्यायिक हस्तक्षेपों ने औपचारिक रूप से महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन के द्वार खोल दिए हैं, फिर भी संस्थागत बाधाएँ और पूर्वाग्रहपूर्ण मूल्यांकन प्रणालियाँ इसके प्रभावी कार्यान्वयन में बाधक बन रही हैं।

महत्व

  • मूलभूत समानता सुनिश्चित करना: यह निर्णय लोक नियोजन में समानता और अवसर की समानता सुनिश्चित करके अनुच्छेद 14 और 16 को बल प्रदान करता है। यह रेखांकित करता है कि निष्पक्ष मूल्यांकन प्रणालियों के बिना औपचारिक पात्रता अर्थहीन है।
  •  संस्थागत भेदभाव का निवारण: न्यायालय व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर उस संस्थागत भेदभाव की पहचान करता है, जो दोषपूर्ण प्रदर्शन वाली मूल्यांकन प्रणालियों, असमान अवसर संरचनाओं और महिलाओं की भूमिकाओं के बारे में रूढ़िवादी धारणाओं जैसे ढांचों में गहराई से रची-बसी हैं।
  • करियर और आर्थिक सुरक्षा: स्थायी कमीशन एक स्थिर करियर पथ, उच्च रैंक और नेतृत्व की भूमिकाएं, तथा पेंशन एवं वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है; जबकि पहले इससे इनकार करने से महिलाओं को सम्मान और आर्थिक लाभ, दोनों से वंचित रखा था।
  • संवैधानिक नैतिकता और गरिमा: यह निर्णय पुष्टि करता है कि स्थायी कमीशन (PC) में महिलाओं को शामिल करना केवल विवेकाधीन मामला नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक बाध्यता है; इस प्रकार यह गरिमा, निष्पक्षता और गैर-भेदभाव को मूल संवैधानिक मूल्यों के रूप में स्थापित करता है।
  • सशस्त्र बलों में संस्थागत सुधार: यह निर्णय पारदर्शी चयन प्रक्रियाओं, तर्कसंगत मूल्यांकन मानदंडों और मनमानी प्रथाओं को समाप्त करने का निर्देश देता है और सशस्त्र बलों को आधुनिकीकरण तथा लैंगिक-संवेदनशील संस्थागत संस्कृति की ओर अग्रसर करता है।
  • न्यायिक प्रक्षेपवक्र की निरंतरता: यह निर्णय ‘रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता पुनिया (2020)’ और ‘लेफ्टिनेंट कर्नल नितिशा बनाम भारत संघ (2021)’ पर आधारित है, जो सामूहिक रूप से  ‘औपचारिक समावेश’ से ‘वास्तविक समानता’ की ओर एक प्रगतिशील बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं।

Sources:
Indian Express
The Hindu
Economic Time

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