संक्षेप में समाचार

विश्व व्यापार संगठन का 14वाँ मंत्रिस्तरीयसम्मेलन

संदर्भ: हाल ही में, विश्व व्यापार संगठन का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) कैमरून के याउंडे में शुरू हुआ। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब संगठन अपनी प्रासंगिकता के बढ़ते संकट से जूझ रहा है।

बैठक के मुख्य केंद्र बिंदु

  • बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली में संकट: यह सम्मेलन बढ़ते संरक्षणवाद और रुकी हुई डब्ल्यूटीओ विवाद समाधान प्रणाली के बीच वैश्विक व्यापार नियमों के कमजोर होने को रेखांकित करता है, जो नियम-आधारित बहुपक्षीयता को कमजोर कर रहा है।
  • खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग (PSH): भारत ने सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग के लिए एक स्थायी समाधान की मांग की है। भारत का तर्क है कि 10% की वर्तमान डब्ल्यूटीओ सब्सिडी सीमाएँ पुरानी हो चुकी हैं और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) तंत्र के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की उसकी क्षमता को बाधित करती हैं।
  • डिजिटल व्यापार अधिस्थगन:
    • मुख्य मुद्दों में से एक ‘इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण’ पर सीमा शुल्क न लगाने के अधिस्थगन को जारी रखना है।
    • भारत इसके विस्तार का विरोध करता है क्योंकि इससे महत्वपूर्ण राजस्व की हानि होती है और उभरती हुई डिजिटल अर्थव्यवस्था में नियम बनाने की स्वतंत्रता  बाधित होती है।
  • कृषि सब्सिडी पर बहस: विकासशील देश किसानों की आजीविका की रक्षा के लिए सब्सिडी प्रदान करने में अधिक लचीलेपन की मांग कर रहे हैं, जबकि विकसित राष्ट्र सख्त अनुशासन (के लिए दबाव बना रहे हैं, जिससे एक उत्तर-दक्षिण विभाजन उत्पन्न हो गया है।
  • WTO संस्थागत सुधार:
    • यह सम्मेलन विवाद समाधान प्रणाली को बहाल करने और WTO के कामकाज में सुधार की तत्काल आवश्यकता पर बल देता है, लेकिन भू-राजनीतिक तनावों के कारण आम सहमति बनाना कठिन बना हुआ है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका ‘सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र’ (MFN) सिद्धांत की समीक्षा और केवल सदस्यों के एक समूह को शामिल करने वाले बहुपक्षीय समझौतों के लिए दबाव डालने सहित बड़े सुधारों की मांग कर रहा है। यह WTO की पारंपरिक ‘आम सहमति-आधारित’ प्रणाली से दूर जाने का संकेत है।
  • विकास के लिए निवेश सुगमीकरण (IFD) समझौता
  • इसे चीन और 120 से अधिक देशों का समर्थन प्राप्त है, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक अन्य प्रमुख मुद्दा है।
  • भारत इसका विरोध करता है क्योंकि इसे एक प्लूरिलैटरल (अल्पपक्षीय) मार्ग से आगे बढ़ाया जा रहा है, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) की आम सहमति-आधारित बहुपक्षीय संरचना को कमजोर करता है, और वैश्विक निवेश नेटवर्कों के माध्यम से इसके रणनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं।
  • भारत की रणनीतिक स्थिति
  • भारत ने नीतिगत संप्रभुता की रक्षा करते हुए, कुछ व्यापार नियमों का विरोध करके और घरेलू हितों की सुरक्षा के लिए विकासशील देशों के साथ समन्वय स्थापित करके एक विकासोन्मुख रुख अपनाया है।
  • विश्व व्यापार संगठन के प्रति भारत का दृष्टिकोण सतर्कतापूर्ण है, जिसका लक्ष्य अपनी ‘नीतिगत स्थान’ को सुरक्षित रखना है। इसके साथ ही भारत वैश्विक व्यापार में अपनी कम हिस्सेदारी और उच्च विकास क्षमता के बीच संतुलन बना रहा है, जो सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (ITA-1) जैसे पिछले अनुभवों से प्रेरित है।

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल  (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026

संदर्भ: हाल ही में, सरकार ने राज्यसभा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया।

विधेयक की मुख्य विशेषताएं

  • उद्देश्य: सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) में कर्मियों के प्रबंधन के लिए एक एकीकृत, पारदर्शी और विधिक रूप से समर्थित प्रशासनिक ढांचा स्थापित करना।
  • CAPFs में IPS प्रतिनियुक्ति का संस्थागतकरण: इस विधेयक का लक्ष्य सभी पांच CAPFs— BSF, CRPF, CISF, ITBP और SSB के शीर्ष नेतृत्व पदों पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति (Deputation) की प्रधानता को निरंतर बनाए रखना है।
  • पदों में आरक्षण: विधेयक में कुल महानिरीक्षक (IG) पदों का 50%, अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) पदों का न्यूनतम 67%, और विशेष महानिदेशक तथा महानिदेशक रैंक के सभी पदों को भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों द्वारा प्रतिनियुक्ति के माध्यम से भरने का प्रस्ताव है।
  • नियम बनाने की शक्तियाँ: यह विधेयक केंद्र सरकार को निर्दिष्ट CAPFs के अधिकारियों के सेवा-संबंधी मामलों पर नियम बनाने हेतु सशक्त बनाता है। इनमें भर्ती, प्रतिनियुक्ति, पदोन्नति और सेवा की शर्तें सम्मिलित हैं।

विधेयक से संबंधित चिंताएँ

  • समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन: भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों को दिया जाने वाला अधिमान्य व्यवहार, सार्वजनिक रोजगार में ‘समान अवसर’ के सिद्धांतों के साथ संभावित संघर्ष और निष्पक्षता पर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
  • CAPF की स्वायत्तता का क्षरण: प्रतिनियुक्त अधिकारियों पर अत्यधिक निर्भरता केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की पेशेवर स्वतंत्रता और उनकी विशिष्ट विशेषज्ञता को कमजोर कर सकती है।
  • बलों के भीतर मनोबल में गिरावट: कैडर अधिकारियों के विरुद्ध कथित भेदभाव, उनके कार्य उत्साह और संगठनात्मक सामंजस्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है।
  • प्राधिकार का केंद्रीयकरण: केंद्र सरकार की बढ़ी हुई नियम-निर्माण शक्तियाँ संस्थागत लचीलेपन और विकेंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया को कम कर सकती हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध: यह विधेयक सीधे तौर पर संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत संघ (मई, 2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लंघन करता है। इस निर्णय में न्यायालय ने CAPF के ग्रुप-A अधिकारियों को सभी उद्देश्यों के लिए ‘संगठित ग्रुप-A सेवा’ (OGAS) घोषित किया था और दो वर्षों के भीतर महानिरीक्षक (IG) रैंक तक IPS प्रतिनियुक्ति को क्रमिक रूप से कम करने का निर्देश दिया था।

आप्रवासन, वीज़ा, विदेशी पंजीकरण एवं ट्रैकिंग (IVFRT) योजना (IVFRT) का विस्तार

संदर्भ: हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अप्रैल 2026 से मार्च 2031 तक पाँच वर्षों के लिए ₹1,800 करोड़ के परिव्यय के साथ आप्रवासन, वीज़ा, विदेशी पंजीकरण एवं ट्रैकिंग (IVFRT) योजना को जारी रखने की स्वीकृति दी है।

IVFRT योजना के बारे में

  • वर्ष 2010 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य भारत में आप्रवासन, वीज़ा जारी करने और विदेशियों के पंजीकरण से संबंधित कार्यों को आपस में जोड़ना और उन्हें इष्टतम बनाना है।
  • नोडल मंत्रालय: गृह मंत्रालय।
  • नवीनतम विस्तार ‘नए आप्रवासन और विदेशी अधिनियम, 2025’ और अवैध प्रवासन को रोकने के नियमों के अनुरूप है।
  • योजना के महत्वपूर्ण पक्ष
  • एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म: यह विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों, आप्रवासन जांच चौकियों (ICPs), क्षेत्रीय विदेशी पंजीकरण कार्यालयों (FRROs), राज्य पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को जोड़ने वाला एक केंद्रीकृत ऑनलाइन सिस्टम प्रदान करता है।
  • सुरक्षा एवं निगरानी: IVFRT प्रणाली विदेशी नागरिकों की रियल टाइम ट्रैकिंग, सुरक्षा एजेंसियों के बीच डेटा साझाकरण और आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने में वृद्धि करती है।
  • प्रौद्योगिकी-संचालित शासन: यह योजना बायोमेट्रिक्स, ‘सेल्फ-सर्विस कियोस्क’ और मोबाइल-आधारित प्लेटफॉर्म जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को एकीकृत करती है ताकि एक ‘फेसलेस’ और ‘संपर्क रहित’ वीज़ा प्रसंस्करण प्रणाली सक्षम हो सके।
  • परिचालन दक्षता: प्रणाली ने पहले ही 100% संपर्क रहित वीज़ा प्रक्रिया को सक्षम बना दिया है, जिसमें 91.24% ई-वीज़ा 72 घंटों के भीतर स्वीकृत किए जाते हैं। इसने आप्रवासन चौकियों पर औसत मैनुअल क्लीयरेंस समय को घटाकर 2.5–3 मिनट कर दिया है।
  • फास्ट ट्रैक इमिग्रेशन-ट्रस्टेड ट्रैवलर प्रोग्राम (FTI-TTP): इसे 13 प्रमुख हवाई अड्डों पर स्वचालित ई-गेट्स के माध्यम से लागू किया गया है, जिससे आप्रवासन क्लीयरेंस का समय 2.5-3 मिनट से घटकर 30 सेकंड रह गया है। वर्तमान में यह केवल भारतीय नागरिकों और OCI कार्डधारकों के लिए उपलब्ध है।
  • ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस (व्यापार सुगमता): IVFRT प्रणाली द्वारा सुनिश्चित सुविधा और सुरक्षा ने पर्यटन, व्यवसाय, व्यापार और सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से विमानन और आतिथ्य उद्योग को व्यापक लाभ पहुँचाया है।

राष्ट्रीय दंत आयोग

संदर्भ: हाल ही में, भारत सरकार ने दंत चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और इसे वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय दंत चिकित्सा आयोग (NDC) का गठन किया।

आयोग के मुख्य बिंदु

  • इसका गठन राष्ट्रीय दंत चिकित्सा आयोग (NDC) अधिनियम, 2023 के तहत किया गया है। इसने भारतीय दंत चिकित्सा परिषद (DCI) का स्थान लिया है।
    • 19 मार्च, 2026 से NDC अधिनियम के लागू होने के साथ ही दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 को निरस्त कर दिया गया है।
  • यह देश भर में दंत चिकित्सा शिक्षा को विनियमित करने, पेशेवर आचरण सुनिश्चित करने और संस्थागत मानकों को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी शीर्ष वैधानिक निकाय है।
  • यह दंत चिकित्सा शिक्षा में आवश्यक और लंबे समय से लंबित नियामक सुधारों को प्रस्तुत करेगा और देश भर में सस्ती मुख स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को बढ़ाएगा।
  • आयोग के कामकाज में सहायता के लिए तीन स्वायत्त निकायों का गठन किया गया है:
  • स्नातक और स्नातकोत्तर दंत चिकित्सा शिक्षा बोर्ड: दंत चिकित्सा शिक्षा की निगरानी के लिए।
  • दंत चिकित्सा मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड: प्रत्यायन और संस्थागत मूल्यांकन को विनियमित करने के लिए।
  • नीतिशास्त्र और दंत चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड: दंत चिकित्सकों के पेशेवर आचरण और पंजीकरण को नियंत्रित करने के लिए।

आयोग के मुख्य कार्य

  • अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए आवश्यक विनियम तैयार करना।
  • दंत चिकित्सा संस्थानों की रेटिंग और उनका मूल्यांकन सुनिश्चित करना।
  • दंत चिकित्सा के क्षेत्र में मानव संसाधनों का आकलन करना और शोध व अनुसंधान को बढ़ावा देना।
  • निजी दंत चिकित्सा महाविद्यालयों में शुल्क विनियमन के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना।
  • सामुदायिक दंत चिकित्सा देखभाल, शिक्षा, अनुसंधान और पेशेवर नैतिकता के लिए मानक स्थापित करना।

GlobE नेटवर्क की 12वीं संचालन समिति की बैठक

संदर्भ: हाल ही में, भारत ने ‘ग्लोबल ऑपरेशनल नेटवर्क ऑफ एंटी-करप्शन लॉ एनफोर्समेंट अथॉरिटीज’ (GlobE नेटवर्क) की12वीं संचालन समिति की बैठक की मेजबानी की।

GlobE नेटवर्क के बारे में

  • उत्पत्ति: इसका गठन सऊदी अरब की G20 अध्यक्षता के दौरान ‘रियाद पहल’ के तहत किया गया था। यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCAC) के ढांचे के भीतर कार्य करता है।
  • सदस्यता: इस नेटवर्क में 135 सदस्य देश और 250 सदस्य प्राधिकरण सम्मिलित हैं। इसके साथ ही इसमें 18 पर्यवेक्षक संगठन भी शामिल हैं, जिनमें यूरुपोल (EUROPOL), विश्व बैंक और भ्रष्टाचार विरोधी प्राधिकरणों का अंतर्राष्ट्रीय संघ (IAACA) मुख्य हैं।
  • शासन संरचना: इसका मार्गदर्शन एक संचालन समिति द्वारा किया जाता है, जिसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और 13 सदस्य होते हैं। यह समिति नेतृत्व और रणनीतिक दिशा प्रदान करती है।
  • भारत की सहभागिता: भारत में, गृह मंत्रालय केंद्रीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है, जबकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) इसकी सदस्य एजेंसियां हैं।
  • कार्य: यह नेटवर्क औपचारिक ‘पारस्परिक कानूनी सहायता’ तंत्र के पूरक के रूप में भ्रष्टाचार की जांच, अभियोजन और भ्रष्टाचार की कमाई की वसूली के लिए एजेंसियों के बीच प्रत्यक्ष और तीव्र सहयोग की सुविधा प्रदान करता है।
  • सहायता तंत्र: इस नेटवर्क को संयुक्त राष्ट्र मादक द्रव्य एवं अपराध कार्यालय (UNODC) द्वारा सहायता प्रदान की जाती है, जो इसके सचिवालय के रूप में कार्य करता है और प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है।

भारत के लिए महत्व

  • भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे का सुदृढ़ीकरण: यह जांच और प्रवर्तन में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में सुधार करके, सीमा पार आयामों वाले भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने की भारत की क्षमता को बढ़ाता है।
  • अपराध की कमाई की तीव्र वसूली: यह नेटवर्क प्रत्यक्ष ‘एजेंसी-से-एजेंसी’ समन्वय के माध्यम से विदेश में स्थित अवैध संपत्तियों की त्वरित पहचान और उनकी वसूली को सक्षम बनाता है।
  • बेहतर खुफिया जानकारी साझाकरण: यह CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियों और उनके वैश्विक समकक्षों के बीच सूचनाओं के रियल टाइम विनिमय की सुविधा प्रदान करता है, जिससे मामलों की दक्षता में सुधार होता है।
  • औपचारिक कानूनी चैनलों का पूरक: यह प्रत्यक्ष और अनौपचारिक सहयोग को सक्षम करके धीमी पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों (MLATs) के पूरक के रूप में कार्य करता है, जिससे प्रवर्तन प्रक्रिया अधिक चपल/सुगम हो जाती है।

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026

संदर्भ: भारत के जनजातीय एथलीटों के लिए पहले राष्ट्रीय मल्टी-स्पोर्ट्स इवेंट, ‘खेलो इंडिया जनजातीय खेल’ का आयोजन 25 मार्च से 3 अप्रैल, 2026 तक किया जा रहा है।

खेलो इंडिया जनजातीय खेल 2026 के बारे में

  • यह एक राष्ट्रीय स्तर का बहु-खेल आयोजन है जो विशेष रूप से पूरे भारत के जनजातीय एथलीटों के लिए समर्पित है।
  • इसका आयोजन ‘खेलो इंडिया योजना’ के तहत किया गया है, जो युवा मामले और खेल मंत्रालय की एक प्रमुख पहल है। इसका उद्देश्य खेल संस्कृति को बढ़ावा देना और खेल के क्षेत्र में उत्कृष्टता को पोषित करना है।
  • इसे युवा मामले एवं खेल मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI), भारतीय ओलंपिक संघ, राष्ट्रीय खेल संघों और छत्तीसगढ़ राज्य आयोजन समिति द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है।
  • आयोजन स्थल: छत्तीसगढ़ के 3 शहरों— रायपुर, जगदलपुर और सरगुजा में।
  • शुभंकर: ‘मोरवीर’; यह छत्तीसगढ़ी शब्दों ‘मोर’ (हमारा अपना) और ‘वीर’ (बहादुरी) से लिया गया है, जो भारत के जनजातीय समुदायों के गर्व, भावना और पहचान का प्रतीक है।
  • खेल स्पर्धाएं: इसमें 7 पदक खेल— तीरंदाजी, एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, तैराकी, भारोत्तोलन और कुश्ती शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, 2 प्रदर्शन खेल— मलखंब और कबड्डी भी शामिल किए गए हैं।

खेलो इंडिया जनजातीय खेल का महत्व

  • जनजातीय प्रतिभा का संवर्धन: ये खेल जनजातीय एथलीटों के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय मंच प्रदान करते हैं, जिससे जनजातीय क्षेत्रों से खेल प्रतिभाओं की पहचान करने और उन्हें तराशने में सहायता मिलती है।
  • मुख्यधारा के खेलों में समावेश: ये खेल जनजातीय समुदायों को राष्ट्रीय खेल इकोसिस्टम में एकीकृत करते हैं, जिससे व्यापक सामाजिक समावेश और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
  • स्वदेशी खेलों का संरक्षण: यह पहल पारंपरिक और स्वदेशी जनजातीय खेलों को बढ़ावा देती है, जिससे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और खेल विरासत को संरक्षित करने में मदद मिलती है।
  • जमीनी स्तर पर खेल विकास: यह बेहतर प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा के अवसर प्रदान करके जनजातीय एवं दूरदराज के क्षेत्रों में जमीनी स्तर के खेल ढांचे को सुदृढ़ करता है।
  • अभिजात (एलिट) खेलों का मार्ग: यह आयोजन ‘खेलो इंडिया’ और ‘टॉप्स’ (TOPS – टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम) जैसी योजनाओं के लिए एक ‘टैलेंट पाइपलाइन’ के रूप में कार्य करता है, जिससे जनजातीय एथलीट राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति करने में सक्षम होते हैं।
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