खेलों में डोपिंग के विरुद्ध यूनेस्को अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय  

 संदर्भ: युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने खेलों में डोपिंग के विरुद्ध वैश्विक सहयोग को मजबूत करने के लिए नई दिल्ली में पक्षकारों के सम्मेलन (COP 10) के ब्यूरो की तीसरी औपचारिक बैठक तथा वर्ष 2026–27 के लिए निधि की अनुमोदन समिति की चौथी औपचारिक बैठक की अध्यक्षता की।

खेलों में डोपिंग के विरुद्ध यूनेस्को अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय के बारे में

  • अंगीकरण: इसे 19 अक्टूबर 2005 को यूनेस्को के 33वें सामान्य सम्मेलन के दौरान अपनाया गया तथा यह 1 फरवरी 2007 को लागू हुआ।
  • उद्देश्य: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डोपिंग-रोधी नीतियों, कानूनों और विनियमों में सामंजस्य स्थापित करना तथा खिलाड़ियों के लिए निष्पक्ष और सुरक्षित प्रतियोगिता सुनिश्चित करना।
  • सदस्यता: इसके 192 पक्षकार राज्य हैं, जिससे यह यूनेस्को की दूसरी सर्वाधिक अनुसमर्थित संधि बन गई है।
  • प्रमुख प्रावधान : यह अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, डोपिंग नियंत्रण, प्रतिबंधित पदार्थों पर रोक, डोपिंग-रोधी शिक्षा, अनुसंधान और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देता है।
  • शासन व्यवस्था: पक्षकारों का सम्मेलन (COP) इस अभिसमय का सर्वोच्च शासी निकाय है और इसकी बैठक सामान्यतः प्रत्येक दो वर्ष में होती है।
    • COP ब्यूरो बैठकों के बीच की अवधि में इसके कार्यों का समन्वय करता है।
  • निधि: खेलों में डोपिंग उन्मूलन निधि सदस्य देशों में डोपिंग-रोधी शिक्षा, नीति निर्माण और क्षमता निर्माण को समर्थन प्रदान करती है।

डोपिंग-रोधी प्रयासों में भारत की स्थिति

  • कानूनी ढाँचा : भारत ने राष्ट्रीय डोपिंग-रोधी अधिनियम, 2022 और इसके 2025 के संशोधन के माध्यम से अपने डोपिंग-रोधी ढाँचे को मजबूत किया। यह जुलाई 2026 में लागू हुआ।
  • परीक्षण और जागरूकता : वर्ष 2025–26 के दौरान, राष्ट्रीय डोपिंग-रोधी एजेंसी (नाडा) ने 7,000 से अधिक परीक्षण किए और जागरूकता के 350 से अधिक सत्र आयोजित किए, जिनमें 27,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
  • वैश्विक भागीदारी: भारत सीओपी10 ब्यूरो में उपाध्यक्ष के रूप में समूह IV का प्रतिनिधित्व करता है और स्वच्छ खेलों को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करता है।
  • शिक्षा संबंधी पहल: भारत युवा मामले एवं खेल मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और यूनेस्को के बीच प्रस्तावित समझौते के माध्यम से यूनेस्को की ‘प्रत्येक कक्षा में स्पोर्ट्स टूलकिट’ शुरू करने की योजना बना रहा है।

12वाँ ब्रिक्स संसदीय मंच, 2026

संदर्भ: 26–27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 12वाँ ब्रिक्स संसदीय मंच संयुक्त घोषणा-पत्र को अपनाने के साथ संपन्न हुआ। इसमें संसदीय सहयोग, समावेशी विकास और वैश्विक शासन में सुधारों की पुनः पुष्टि की गई।

अन्य संबंधित जानकारी

  • विषय : “जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को सशक्त बनाना”
  • उद्घाटनकर्ता: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला। इस मंच ने भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता का समर्थन करने वाला संयुक्त घोषणा-पत्र अपनाया।
  • प्रमुख परिणाम: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग की गई, सीमा-पार आतंकवाद और आतंकवाद के वित्तपोषण की निंदा की गई तथा सीबीडीआर-आरसी के सिद्धांत के अंतर्गत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और जलवायु कार्रवाई में सहयोग को बढ़ावा दिया गया।
  • ब्रिक्स संसदीय मंच: ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच संसदीय संवाद, विधायी सहयोग और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान का एक मंच।

ब्रिक्स के बारे में

  • ब्रिक्स उभरते बाजारों और विकासशील देशों का एक सहमति-आधारित समूह है, न कि संधि-आधारित संगठन।
  • उत्पत्ति : “ब्रिक” शब्द का प्रयोग गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने 2001 में किया था।
  • पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया गया था।
  • विकास : दक्षिण अफ्रीका 2011 में इसमें शामिल हुआ, जिससे ब्रिक, ब्रिक्स बन गया। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात 2024 में इसमें शामिल हुए, इसके बाद 2025 में इंडोनेशिया शामिल हुआ।
  • सदस्यता : ब्रिक्स में 11 सदस्य हैं: ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया। इसमें भागीदार देश की एक अलग श्रेणी भी है।
  • सहयोग के तीन स्तंभ:
    • राजनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग।
    • आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग।
    • सांस्कृतिक एवं जन-से-जन आदान-प्रदान।
  • वैश्विक महत्व : 11 सदस्यों की सामूहिक रूप से विश्व की जनसंख्या में लगभग 49.5%, क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के आधार पर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 40% और वैश्विक व्यापार में 26% हिस्सेदारी है।
  •  प्रमुख संस्थान:
    • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) : इसकी स्थापना 2014 में फोर्टालेजा घोषणा के अंतर्गत की गई थी। इसका मुख्यालय शंघाई में है और यह अवसंरचना तथा सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण प्रदान करता है।
    • आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (CRA): यह भुगतान संतुलन संबंधी दबावों का सामना कर रहे सदस्य देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

SAMHiTA ताड़पत्र पांडुलिपि डिजिटलीकरण परियोजना

संदर्भ: भारत और श्रीलंका सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत कर रहे हैं। इसी क्रम में, भारत सरकार की अनुदान सहायता से 23 अक्टूबर 2026 को कोलंबो के गंगारामया मंदिर में SAMHiTA परियोजना का शुभारंभ किया गया।

SAMHiTA परियोजना के बारे में

  • पूरा नाम: दक्षिण एशियाई पांडुलिपि इतिहास एवं पाठ्य अभिलेखागार
  • संस्कृत शब्द ‘संहिता’ का अर्थ ‘संग्रह’ या ‘संकलन’ है। यह परियोजना के उस उद्देश्य को दर्शाता है, जिसके अंतर्गत बिखरी हुई पांडुलिपि संबंधी जानकारी को एक साझा ऑनलाइन मंच पर एकत्रित किया जाएगा, ताकि सभी लोगों की उस तक पहुँच हो सके।
  • कार्यान्वयन संस्था: इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC), नई दिल्ली, भारत के बाहर स्थित संस्थागत भागीदारों के सहयोग से।
  • उद्देश्य: भारत के बाहर पुस्तकालयों, अभिलेखागारों और अन्य संग्रह स्थलों में संरक्षित भारतीय एवं दक्षिण एशियाई पांडुलिपियों का एक संबंधपरक डेटाबेस और डिजिटल अभिलेखागार तैयार करना।
  • पांडुलिपि विरासत: ये पांडुलिपियाँ भाषाओं, चिकित्सा, गणित, वास्तुकला, दर्शन, साहित्य, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रथाओं का दस्तावेजीकरण करती हैं।
    • ये संस्कृत, तमिल, ओड़िया और बंगाली जैसी भाषाओं में उपलब्ध हैं तथा ताड़पत्रों, भोजपत्रों और ताम्रपत्रों जैसी सामग्रियों पर लिखी गई हैं।
  • श्रीलंका के साथ साझेदारी : गंगारामया मंदिर इस परियोजना के साथ साझेदारी करने वाला श्रीलंका का पहला संस्थान बना।
    • जुलाई 2026 में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के अंतर्गत स्थानीय विशेषज्ञ 100 प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण कर रहे हैं। इसके नवंबर 2026 के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है।
  • डिजिटल मंच : एकत्रित जानकारी पंडित (PANDiT — Prosopographical Database of Indic Texts and Records) के माध्यम से साझा की जाएगी। यह दक्षिण एशिया के बौद्धिक इतिहास से संबंधित एक डेटाबेस है।

टाटा स्टील ने झारखंड में हाइड्रोसीडिंग तकनीक की शुरुआत की

संदर्भ: टाटा स्टील ने मिट्टी के कटाव को रोकने, खदानों से निकले मलबे के ढेरों की ढलानों को स्थिर करने और पारिस्थितिक पुनर्बहाली में तेजी लाने के लिए झारखंड स्थित अपने वेस्ट बोकारो प्रभाग में हाइड्रोसीडिंग तकनीक शुरू की है।

हाइड्रोसीडिंग के बारे में

    • परिभाषा : हाइड्रोसीडिंग बीजों, पानी, मल्च (मृदा-आवरण सामग्री), उर्वरकों और बंधनकारी पदार्थों (टैकिफायर) के मिश्रण को विशेष उपकरणों की सहायता से मिट्टी पर छिड़ककर बीज बोने की एक द्रवचालित विधि है।
    • कार्यप्रणाली: एक हाइड्रो-मल्चर इन सभी घटकों को मिलाकर एक समान घोल तैयार करता है। इस घोल का भूमि पर छिड़काव किया जाता है, जिससे बीजों का समान वितरण, नमी का संरक्षण और बीजों का मिट्टी के साथ प्रभावी संपर्क सुनिश्चित होता है।
    • बीजों का चयन : मिट्टी के प्रकार, जलवायु परिस्थितियों और पुनर्बहाली के उद्देश्य के अनुसार घास, स्थानीय वनस्पतियों तथा दलहनी पौधों की प्रजातियों का चयन किया जाता है।
    • प्रमुख लाभ : यह वनस्पति की तीव्र वृद्धि को बढ़ावा देता है, मिट्टी के कटाव को कम करता है, नमी बनाए रखता है, ढलानों की स्थिरता में सुधार करता है और श्रम की आवश्यकता को कम करता है।
    • अनुप्रयोग : इसका उपयोग खनन क्षेत्रों की भूमि के पुनर्वास, राजमार्गों की ढलानों को स्थिर करने, क्षरित भूमि की पुनर्बहाली और भू-दृश्य निर्माण में किया जाता है।
    • पर्यावरणीय महत्त्व : वनस्पति का आवरण जड़ों के माध्यम से मिट्टी को बाँधने में मदद करता है, जैव विविधता को बढ़ावा देता है, सतही अपवाह को कम करता है और दीर्घकालिक पारिस्थितिक पुनर्बहाली में योगदान देता है।
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