संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन–2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन –3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: विश्व बैंक की हालिया ‘स्टेट एंड ट्रेंड्स ऑफ कार्बन प्राइसिंग 2025‘ रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि विश्व भर में कार्बन बाजारों का अभूतपूर्व विस्तार हो रहा है।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष


- कार्बन बाज़ार में उछाल: कार्बन टैक्स और उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) से प्राप्त होने वाला वैश्विक राजस्व लगातार दूसरे वर्ष 100 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है।
- कार्बन बाज़ार एक बाज़ार-आधारित प्रणाली है जो कार्बन उत्सर्जन पर एक मूल्य निर्धारित करती है, जिससे संस्थाओं को ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को लागत प्रभावी ढंग से कम करने के लिए उत्सर्जन परमिट या कार्बन क्रेडिट खरीदने और बेचने की अनुमति मिलती है।
- कार्बन मूल्य निर्धारण की बढ़ती स्वीकार्यता: वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन का लगभग 28 प्रतिशत भाग अब प्रत्यक्ष कार्बन मूल्य के अंतर्गत आता है, जबकि वर्ष 2005 में यह केवल 5 प्रतिशत था।
- विश्वभर में प्रत्यक्ष कार्बन मूल्य निर्धारण के 80 माध्यम कार्य कर रहे हैं, जिनमें 37 उत्सर्जन व्यापार प्रणालियाँ (ETS) और 43 कार्बन कर शामिल हैं।
- राजकोषीय उपकरण के रूप में कार्बन मूल्य निर्धारण: वर्ष 2024 में, वैश्विक कार्बन मूल्य निर्धारण राजस्व का 56% भाग पर्यावरण कार्यक्रमों, बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों पर खर्च किया गया।
- मांग से अधिक आपूर्ति: कार्बन क्रेडिट की आपूर्ति मांग से अधिक बनी रही, जिससे वैश्विक बाजारों में लगभग 1 अरब टन अप्रयुक्त क्रेडिट बच गए।
- प्रमुख चुनौतियाँ:
- धरातली वास्तविकता: बढ़ता राजस्व और व्यापक कवरेज स्वचालित रूप से उत्सर्जन में भारी कमी का संकेत नहीं देते हैं।
- कुल उत्सर्जन में कमी पर अनिश्चितता: भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने दर-आधारित उत्सर्जन व्यापार प्रणाली को अपनाया है, जो कुल उत्सर्जन पर पूर्ण सीमा लगाने के बजाय उत्पादन की प्रति इकाई उत्सर्जन को नियंत्रित करती है।
- भारत-विशिष्ट निष्कर्ष:
- भारत का कार्बन बाज़ार: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) शुरू में नौ ऊर्जा-गहन औद्योगिक क्षेत्रों को कवर करती है। इसका उद्देश्य 2030 तक जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता को 45 प्रतिशत तक कम करने के भारत के लक्ष्य को पूरा करना है।
- परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (PAT) की विरासत: PAT के तहत लक्ष्य आम तौर पर मामूली थे, जिससे कई उद्योगों को न केवल आसानी से अनुपालन करने बल्कि बिना किसी महत्वपूर्ण तकनीकी अपग्रेड के लक्ष्य से अधिक उपलब्धि प्राप्त करने की अनुमति मिली।
- क्षेत्रीय कवरेज में कमी: कृषि और अपशिष्ट जैसे कई प्रमुख क्षेत्र अभी भी कार्बन मूल्य निर्धारण के दायरे से बाहर हैं।
- CCTS में कमियाँ: भारत के पुराने बाज़ार-आधारित कार्यक्रमों के साक्ष्य बताते हैं कि कमजोर लक्ष्य, सीमित क्षेत्रीय कवरेज और खराब शासन जलवायु परिणामों को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
- अनुपालन में कमी: ऊर्जा-बचत प्रमाणपत्रों की अधिकता, विशेष रूप से PAT चक्र II के दौरान, जब 20 लाख से अधिक अतिरिक्त प्रमाणपत्र बाज़ार में आए। इसके कारण कीमतें गिर गईं, जिससे स्वच्छ तकनीकों में निवेश करने के बजाय अनुपालन करना किफायती हो गया।
- ताप विद्युत क्षेत्र, जो भारत के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत (40 प्रतिशत) है, वहां छह वर्षों में PAT के तहत प्राप्त संचयी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी, एक ही वर्ष (2016) के उत्सर्जन के 2.5 प्रतिशत से भी कम थी।
