संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: संसद और राज्य विधायिका– संरचना, कार्य, कामकाज का संचालन, शक्तियाँ और विशेधाधिकार तथा उनसे संबंधित विषय; जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।
संदर्भ: हाल ही में, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के बीस बागी लोकसभा सांसदों ने ‘नेशनललिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) के साथ अपने विलय की घोषणा की है। ध्यातव्य है कि एनसीपीआई एक कम ज्ञात, पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है।
अन्य संबंधित जानकारी
- तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी लोकसभा सांसदों के एक समूह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और संसद में अलग मान्यता तथा बैठने की अलग व्यवस्था की मांग की।
- सांसदों ने बाद में ‘नेशनललिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) के साथ अपने विलय की घोषणा की और दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के विलय प्रावधान के तहत सुरक्षा दिए जाने का दावा किया।
- यह घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व के भीतर लंबे समय से चल रही आंतरिक कलह का परिणाम है।
- शिवसेना और एनसीपी विद्रोहों के विपरीत, बागी सांसदों ने शुरुआत में स्वयं को “असली” तृणमूल कांग्रेस होने का दावा नहीं किया; इसके बजाय, उन्होंने एक अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय करने का मार्ग चुना।
- इस कदम ने दलबदल विरोधी कानून, दसवीं अनुसूची के तहत विलय अपवाद, और समकालीन भारत में राजनीतिक विद्रोहियों द्वारा अपनाई जा रही बदलती रणनीतियों पर बहस को फिर से शुरू कर दिया है।
दलबदल विरोधी कानून को समझना और विलय अपवाद
- दसवीं अनुसूची को1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से पेश किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलबदल पर रोक लगाना और संसदीय लोकतंत्र में स्थिरता सुनिश्चित करना था।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- यदि कोई विधायक या सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, या सदन में पार्टी के ‘व्हिप’ का उल्लंघन करता है, तो उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- यह कानून अवसरवादी दलबदलों से उत्पन्न होने वाली राजनीतिक अस्थिरता को रोकने का प्रयास करता है।
- पैराग्राफ 4 के अंतर्गत विलय अपवाद:
- मूल दलबदल विरोधी कानून में ‘विभाजन’ और ‘विलय’ दोनों के लिए अपवाद मौजूद थे।
- 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ‘विभाजन’ के प्रावधान को समाप्त कर दिया। इसका मुख्य उद्देश्य दलबदल करने वाले छोटे समूहों को मिलने वाली सुरक्षा को खत्म करना था। हालाँकि, ‘विलय’ के अपवाद को बरकरार रखा गया।
- कानून के तहत विलय को केवल तभी सुरक्षित माना जाता है यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करने के लिए सहमत हों।
- मूल रूप से इस विलय प्रावधान का उद्देश्य वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन को सुगम बनाना था, लेकिन अब इसका उपयोग तेजी से अयोग्यता से बचने के लिए एक ‘ढाल’ के रूप में किया जा रहा है।
दलबदल कानून की न्यायिक व्याख्या
- विभिन्न न्यायिक निर्णयों के माध्यम से, सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार इस बात पर बल दिया है कि ‘दलबदल विरोधी कानून’ का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अवसरवाद पर रोक लगाना और निर्वाचित सरकारों की स्थिरता को बनाए रखना है।
- राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अध्यक्ष को अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय वस्तुनिष्ठ संवैधानिक मानदंडों के आधार पर ही करना चाहिए। अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के तहत निर्णय लेने की प्रक्रिया में अनिश्चित काल तक विलंब नहीं कर सकते।
- केशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020) में न्यायालय ने दलबदल मामलों में होने वाली अत्यधिक देरी पर चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने सिफारिश की कि अध्यक्ष को सामान्यतः ऐसी याचिकाओं पर अपना निर्णय तीन महीने के भीतर दे देना चाहिए।
- ‘सुभाष देसाई बनाम प्रधान सचिव, महाराष्ट्र राज्यपाल (2023)’ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने ‘राजनीतिक दल’ (Political Party) और ‘विधायी दल’ (Legislature Party) के बीच स्पष्ट अंतर किया है। न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि दसवीं अनुसूची के तहत केवल विधायी संख्या बल के आधार पर किसी राजनीतिक दल की पहचान तय नहीं की जा सकती।
- न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि 91वें संविधान संशोधन के बाद ‘विभाजन’ का अपवाद समाप्त हो चुका है। अतः, अयोग्यता से सुरक्षा केवल दसवीं अनुसूची में उल्लिखित ‘विलय’ (merger) के संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त प्रावधान के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
भारत में दलबदल रणनीतियों का विकास
- टीएमसी-एनसीपीआई (TMC-NCPI) की यह घटना दलबदल विरोधी कानून और न्यायिक व्याख्याओं के विकास के परिणामस्वरूप राजनीतिक गुटों द्वारा अपनाई गई बदलती संवैधानिक रणनीतियों को दर्शाती है।
- विभाजन की राजनीति से विलय की राजनीति तक
- 91वें संविधान संशोधन (2003) से पूर्व, बागी गुट अक्सर दसवीं अनुसूची के तहत ‘विभाजन’ प्रावधान का प्रयोग करते थे। यह प्रावधान उन्हें दलबदल विरोधी कानून से सुरक्षा प्रदान करता था।
- ‘विभाजन’ के अपवाद को समाप्त कर दिए जाने के बाद, राजनीतिक दलों ने संवैधानिक रूप से सुरक्षित अन्य विकल्पों की खोज शुरू की। इसी क्रम में ‘विलय’ एक प्रमुख रणनीतिक मार्ग के रूप में उभरा।
- ‘असली दल‘ की रणनीतिक:
- शिवसेना और एनसीपी (NCP) जैसे मामलों में, जब पार्टी के भीतर विद्रोह हुआ, तो बागी गुटों ने ‘विभाजन’ या ‘विलय’ का मार्ग अपनाने के बजाय एक भिन्न दृष्टिकोण अपनाया।
- आयोग सबसे पहले उस राजनीतिक दल के संविधान (Party Constitution) की जाँच करता है। इसमें देखा जाता है कि पार्टी में निर्णय लेने की सर्वोच्च शक्ति किसके पास है और संगठनात्मक चुनाव किस प्रकार होते हैं।
- TMC-NCPI विलय रणनीति:
- शिवसेना और एनसीपी (NCP) गुटों के विपरीत, बागी टीएमसी सांसदों ने शुरुआत में मूल पार्टी के स्वामित्व का दावा नहीं किया।
- यह कदम ‘सुभाष देसाई’ मामले के बाद के कानूनी वातावरण को दर्शाता है, जहाँ वैधता स्थापित करने के लिए केवल विधायी बहुमत पर्याप्त नहीं हो सकता है।
- एनसीपीआई (NCPI) के साथ विलय करके, बागियों ने पार्टी के स्वामित्व पर तत्काल लड़ाई से बचते हुए दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत ‘विलय अपवाद’ (merger exception) का लाभ उठाने का प्रयास किया।
- विलय मॉडल का उदय:
- हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों का भाजपा में विलय और टीएमसी-एनसीपीआई की घटना विलय-आधारित रणनीतियों के प्रति बढ़ती प्राथमिकता को दर्शाती है।
- ये घटनाक्रम बताते हैं कि समकालीन राजनीतिक पुनर्गठन में ‘विलय अपवाद’ महत्वपूर्ण उपकरण बनता जा रहा है।
उभरती हुई प्रमुख चिंताएँ
- क्या विलय का अपवाद एक खामी बन रहा है? आलोचकों का तर्क है कि विलय प्रावधान का उपयोग तेजी से वास्तविक राजनीतिक विलय के बजाय दलबदल को वैध बनाने के लिए किया जा रहा है।
- अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका: निर्णयों में देरी और पक्षपातपूर्ण निर्णय लेने के आरोप दलबदल विरोधी कार्यवाही की विश्वसनीयता को प्रभावित करना जारी रखे हुए हैं।
- स्थिरता बनाम लोकतांत्रिक असहमति: जहाँ एक ओर दलबदल विरोधी कानून सरकारी स्थिरता को बढ़ावा देता है, वहीं यह विधायकों की पार्टी नेतृत्व से असहमति जताने की क्षमता को भी सीमित करता है।
आगे की राह
- समयबद्ध और निष्पक्ष न्यायनिर्णयन सुनिश्चित करना: केशव मेघचंद्र सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए जोर के अनुसार, अयोग्यता याचिकाओं का निर्णय एक निश्चित समय सीमा के भीतर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) और रोहिंटन फली नरीमन जैसे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा सुझाए गए अनुसार, ऐसे निर्णयों को एक स्वतंत्र प्राधिकरण या न्यायाधिकरण को सौंपने के प्रस्तावों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
- पैरा 4 के तहत विलय अपवाद की समीक्षा: दो-तिहाई विलय प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह सामूहिक दलबदल के लिए एक संवैधानिक ढाल बनने के बजाय वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन को सुगम बनाए।
- पार्टी के भीतर लोकतंत्र को मजबूत करना: अधिक आंतरिक परामर्श, पारदर्शी नेतृत्व संरचनाएं और असहमति के लिए संस्थागत तंत्र गुटबाजी को कम कर सकते हैं और राजनीतिक विद्रोह के प्रोत्साहन को घटा सकते हैं।
- दल के विभाजन और विलय के लिए संवैधानिक मानकों को स्पष्ट करना: विलय की मान्यता, राजनीतिक दलों के सापेक्ष विधायी दलों की भूमिका, और अस्पष्टता तथा लंबी मुकदमेबाजी को रोकने के लिए विलय के माध्यम के रूप में छोटी पार्टियों के उपयोग के संबंध में स्पष्ट कानूनी दिशानिर्देशों की आवश्यकता है।
