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सामान्य अध्ययन-1: विश्व के भौतिक भूगोल की प्रमुख विशेषताएँ।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण तथा पर्यावरण प्रभाव आकलन।

संदर्भ: अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की पारिस्थितिकी तंत्रों की रेड लिस्ट के अंतर्गत प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्रों के पहले वैश्विक आकलन में चेतावनी दी गई है कि आकलन किए गए उथले जल की प्रवाल भित्तियों वाले 96% पारिस्थितिक क्षेत्रों पर अनुमानित जलवायु परिस्थितियों के तहत वर्ष 2075 तक पारिस्थितिकी तंत्र के नष्ट होने का अत्यंत उच्च जोखिम है।

आकलन के प्रमुख निष्कर्ष

  • वैश्विक कवरेज: इस आकलन में उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के 127 पारिस्थितिक क्षेत्रों का अध्ययन किया गया। इसमें 80 से अधिक देशों और क्षेत्रों में फैली लगभग 1,88,362 वर्ग किलोमीटर प्रवाल भित्तियाँ शामिल थीं।
    • इसे जैव विविधता अभिसमय (CBD) के पक्षकारों के 17वें सम्मेलन (CBD COP17) में आर्मेनिया के येरेवान में जारी किया गया।
  • जोखिम की सीमा: अनुमानित जलवायु प्रभावों को शामिल करने पर, आकलन किए गए 96% पारिस्थितिक क्षेत्रों को ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ श्रेणी में रखा गया। यह वर्ष 2075 तक पारिस्थितिकी तंत्र के ध्वस्त होने के अत्यंत उच्च जोखिम को दर्शाता है।
  • वर्तमान में देखी गई गिरावट बनाम भविष्य का जोखिम: पिछले 50 वर्षों के दौरान देखे गए परिवर्तनों के आधार पर ही आकलन करने पर, 24% पारिस्थितिक क्षेत्रों को गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया।
    • यह अनुपात बढ़कर 96% होना जलवायु परिवर्तन के अनुमानित प्रभावों से उत्पन्न अतिरिक्त जोखिम को दर्शाता है।
    • इस आकलन में जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) के ‘मध्यम मार्ग’ परिदृश्य का उपयोग किया गया, जिसके अनुसार वर्ष 2100 तक पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में वैश्विक तापमान में लगभग 2.7°C की वृद्धि होने का अनुमान है।
  • प्रमुख खतरे के रूप में जलवायु परिवर्तन: मानवजनित महासागरीय तापवृद्धि और समुद्री हीटवेव को सबसे प्रमुख एवं निरंतर बने रहने वाले खतरे के रूप में पहचाना गया।
  • अन्य प्रमुख दबाव: पैरटफिश (Parrotfish) और ग्रूपर (Grouper) सहित प्रमुख मछली समूहों का अत्यधिक दोहन 63% प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए खतरा है। प्रदूषण, तटीय एवं औद्योगिक विकास, अत्यधिक पर्यटन, जलीय कृषि तथा अन्य दबाव भी प्रवाल भित्तियों के क्षरण में योगदान देते हैं।

प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में

  • प्रवाल भित्तियाँ क्या हैं?
    • प्रवाल भित्तियाँ समुद्र के भीतर पाई जाने वाली ऐसी संरचनाएँ हैं, जिनका निर्माण मुख्यतः भित्ति-निर्माण करने वाले प्रवालों द्वारा स्रावित कैल्शियम कार्बोनेट के कंकालों से होता है। प्रवाल, निडेरिया (Cnidaria) संघ से संबंधित समुद्री जीव हैं।
    • समय के साथ, प्रवालों की क्रमिक पीढ़ियाँ जटिल भित्ति संरचनाओं का निर्माण करती हैं, जो विविध समुद्री जीवों को आश्रय प्रदान करती हैं।
  • प्रवाल–शैवाल सहजीविता: भित्ति-निर्माण करने वाले प्रवालों में जूजैन्थैली नामक सूक्ष्म शैवाल पाए जाते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से प्रवालों की अधिकांश ऊर्जा की पूर्ति करते हैं। तापीय तनाव के कारण प्रवाल इन शैवालों को अपने शरीर से बाहर निकाल सकते हैं, जिससे प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) होता है। लंबे समय तक तनाव बने रहने पर प्रवालों की मृत्यु हो सकती है।
  • विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ: अधिकांश उथले जल में पाए जाने वाले भित्ति-निर्माण करने वाले प्रवाल गर्म, स्वच्छ और सूर्य के प्रकाश से युक्त जल में पनपते हैं, जहाँ जल की गुणवत्ता उपयुक्त हो। अत्यधिक अवसादन और प्रदूषण उनके विकास एवं अस्तित्व को प्रभावित कर सकते हैं।
  • प्रवाल भित्तियों के प्रकार:
    • फ्रिंजिंग रीफ्स  (Fringing Reefs) तटरेखाओं के निकट विकसित होती हैं।
    • बैरियर रीफ्स (Barrier Reefs) तट से दूर स्थित होती हैं तथा लैगून द्वारा भूमि से अलग होती हैं।
    • एटोल (Atolls)  वलयाकार प्रवाल संरचनाएँ होती हैं, जिनके भीतर सामान्यतः लैगून स्थित होते हैं।

प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र का महत्त्व

  • समुद्री जैव विविधता: प्रवाल भित्तियाँ समुद्र तल के 1% से भी कम क्षेत्र में फैली हैं, लेकिन इनमें कम-से-कम 25% समुद्री प्रजातियों को आश्रय मिलता है। इस कारण ये पृथ्वी के सर्वाधिक जैव विविधता वाले पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल हैं।
  • खाद्य सुरक्षा एवं आजीविका: प्रवाल भित्तियों से जुड़ी मत्स्य गतिविधियाँ तटीय आबादी को भोजन और आय प्रदान करती हैं, जबकि प्रवाल भित्तियों पर आधारित पर्यटन रोजगार तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है। 50 करोड़ से अधिक लोग भोजन, आय और संरक्षण के लिए प्रवाल भित्तियों पर निर्भर हैं।
  • तटीय संरक्षण: प्रवाल भित्तियों की संरचनाएँ लहरों की ऊर्जा को कम करती हैं, जिससे तटरेखाओं को कटाव, तूफानों के प्रभाव और बाढ़ से बचाने में सहायता मिलती है। यह विशेष रूप से निचले तटीय क्षेत्रों और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • आर्थिक एवं औषधीय महत्त्व: प्रवाल भित्तियाँ मत्स्य पालन, पर्यटन, तटीय संरक्षण तथा औषधीय यौगिकों की खोज में योगदान देती हैं।
    • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, इनसे प्राप्त वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य प्रतिवर्ष लगभग 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है।

प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख खतरे

  • जलवायु परिवर्तन: समुद्र के बढ़ते तापमान और अधिक तीव्र समुद्री ऊष्मा तरंगों के कारण बड़े पैमाने पर प्रवाल विरंजन तथा प्रवालों की मृत्यु होती है। प्रवाल भित्तियों के पुनः स्वस्थ होने से पहले ही विरंजन की घटनाएँ बार-बार हो सकती हैं, जिससे प्रवाल आवरण कम हो जाता है और उनकी पुनर्जनन क्षमता कमजोर पड़ती है।
  • अत्यधिक मत्स्य दोहन एवं पारिस्थितिक असंतुलन: पैरटफिश जैसी शाकाहारी मछलियों के अत्यधिक दोहन से शैवाल की वृद्धि को नियंत्रित करने वाली उनकी चराई गतिविधि कम हो जाती है। प्रमुख मछली आबादियों में कमी से समुद्री खाद्य जाल बाधित होते हैं और प्रवाल भित्तियों की पुनर्बहाली क्षमता कमजोर पड़ती है।
  • प्रदूषण एवं अवसादन: सीवेज, कृषि अपवाह, प्लास्टिक और अन्य प्रदूषक जल की गुणवत्ता को खराब करते हैं। वहीं, भूमि की सफाई और निर्माण कार्यों से उत्पन्न अवसाद सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता कम कर सकते हैं तथा प्रवालों को ढक सकते हैं। वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड के समुद्र द्वारा अवशोषण से होने वाला महासागरीय अम्लीकरण भी प्रवाल कंकालों के निर्माण के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
  • तटीय विकास एवं अन्य दबाव: ड्रेजिंग (जल निकायों से तलछट निकालना), विनाशकारी मत्स्यन, अनियंत्रित पर्यटन, जलीय कृषि और औद्योगिक विकास प्रवाल भित्तियों के आवासों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। तूफान, रोगों का प्रकोप तथा क्राउन-ऑफ-थॉर्न्स स्टारफिश का प्रकोप भी जलवायु संबंधी तनाव के प्रभावों को और बढ़ा सकते हैं।

आगे की राह

  • जलवायु संबंधी कार्रवाई: समुद्र के तापमान में वृद्धि को सीमित करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कमी लाना आवश्यक है, क्योंकि यह वैश्विक स्तर पर प्रवाल भित्तियों के क्षरण का प्रमुख कारक है। लगातार बढ़ती वैश्विक गर्मी की भरपाई केवल स्थानीय संरक्षण उपायों से पूरी तरह नहीं की जा सकती।
  • लक्षित पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण: समुद्री संरक्षित क्षेत्रों, सतत मत्स्य प्रबंधन तथा तटीय प्रदूषण और विनाशकारी विकास पर नियंत्रण को सुदृढ़ करना चाहिए। शाकाहारी मछलियों की आबादी का संरक्षण भी पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
  • विज्ञान-आधारित संरक्षण: प्रवाल भित्तियों की दीर्घकालिक निगरानी को सुदृढ़ करना, प्रतिरोधी प्रवाल आबादियों का संरक्षण करना तथा वैज्ञानिक आकलन पर आधारित पुनर्बहाली को बढ़ावा देना चाहिए। पुनर्बहाली के उपाय उत्सर्जन में कमी और स्थानीय दबावों पर नियंत्रण के पूरक होने चाहिए, न कि उनके विकल्प।
  • समुदाय की भागीदारी: स्वस्थ प्रवाल भित्तियों पर निर्भर आजीविकाओं की रक्षा करते हुए तटीय समुदायों को प्रवाल भित्ति प्रबंधन, सतत मत्स्य पालन और जिम्मेदार पर्यटन में शामिल करना चाहिए।
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