संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन 3: बुनियादी ढाँचा -ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि; संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

संदर्भ: हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए लघु जल विद्युत (Small Hydro Power – SHP) विकास योजना को स्वीकृति दी है, जो स्वच्छ ऊर्जा पहल और दूरस्थ एवं ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देगी।

योजना की मुख्य विशेषताएँ

  • इस योजना के तहत देश भर में लगभग 1,500 मेगावाट (MW) की कुल अनुमानित क्षमता वाली लघु जल विद्युत परियोजनाओं की स्थापना के लिए ₹2,584 करोड़ का परिव्यय प्रदान किया गया है।
  • यह योजना 1 मेगावाट से 25 मेगावाट के बीच की क्षमता वाली लघु जल विद्युत परियोजनाओं के विकास का समर्थन करेगी, विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में।
  • इन परियोजनाओं को बिना बांध बनाए और लोगों को विस्थापित किए बिना ‘रन-ऑफ-रिवर’ परियोजनाओं के रूप में विकसित किया जाएगा।
  • पूर्वोत्तर राज्यों और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के साथ लगे जिलों को ₹3.6 करोड़ प्रति मेगावाट या परियोजना लागत का 30% (जो भी कम हो) तक उच्च केंद्रीय वित्तीय सहायता मिलेगी, जिसकी अधिकतम सीमा ₹30 करोड़ प्रति परियोजना है।
  • अन्य राज्यों के लिए सहायता ₹2.4 करोड़ प्रति मेगावाट या परियोजना लागत का 20% (जो भी कम हो) पर सीमित होगी, जिसकी अधिकतम सीमा ₹20 करोड़ प्रति परियोजना है।
  • यह योजना विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPRs) तैयार करने में सहायता प्रदान करके भविष्य की जल विद्युत परियोजनाओं की एक पाइपलाइन बनाने पर भी ध्यान केंद्रित करती है।

लघु जल विद्युत परियोजनाएं

  • ये ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ या नहर-आधारित प्रणालियाँ हैं जो बड़े जलाशयों के बिना प्राकृतिक जल प्रवाह का उपयोग करके बिजली उत्पन्न करती हैं।
  • क्षमता: 25 मेगावाट (MW) तक।
  • प्रकार: इन्हें मुख्य रूप से सूक्ष्म, अति-सूक्ष्म और लघु जल विद्युत परियोजनाओं में वर्गीकृत किया जाता है।
  • क्षमता:
    • भारत में 7,133 स्थलों पर लघु जल विद्युत परियोजनाओं की कुल अनुमानित क्षमता 21,000 मेगावाट है।
    • वर्तमान में, देश के 1,196 स्थलों पर 5,100 मेगावाट की लघु जल विद्युत परियोजनाएं क्रियाशील हैं।
  • रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं: ये परियोजनाएं नदी के प्राकृतिक प्रवाह और ऊंचाई में गिरावट का उपयोग करके बिजली उत्पन्न करती हैं। इनमें आमतौर पर जल संचयन या बड़े जलाशयों का उपयोग बहुत कम या बिल्कुल नहीं किया जाता है।

लघु जल विद्युत परियोजनाओं का महत्व

  • नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत: ये परियोजनाएं थर्मल पावर (तापीय विद्युत) की तुलना में न्यूनतम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के साथ भारत के गैर-जीवाश्म ईंधन लक्ष्यों और जलवायु प्रतिबद्धताओं में योगदान देती हैं।
  • विकेंद्रीकृत ऊर्जा उत्पादन: ये दूरस्थ और ऑफ ग्रिड क्षेत्रों के लिए अत्यधिक उपयुक्त हैं। चूंकि बिजली का उपभोग स्थानीय स्तर पर किया जाता है, इसलिए इससे पारेषण हानि कम होती है।
  • ग्रामीण विकास और आजीविका: ये परियोजनाएं सिंचाई, कृषि-प्रसंस्करण और लघु उद्योगों को सहायता प्रदान करती हैं। साथ ही, परियोजना निर्माण के दौरान रोजगार सृजन में भी सहायक होती हैं।
  • न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव: इनके लिए कम भूमि की आवश्यकता होती है और इस प्रकार ये बड़े पैमाने पर विस्थापन, वनों की कटाई और पुनर्वास जैसी समस्याओं से बचाती हैं।

लघु जल विद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा देने हेतु अन्य पहल

  • लघु जल विद्युत कार्यक्रम: यह नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) का एक कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य राज्य सरकार की संस्थाओं और स्वतंत्र विद्युत उत्पादकों (IPPs) को नई लघु जल विद्युत परियोजनाएं स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि 21,000 मेगावाट की पूर्ण क्षमता को चरणबद्ध तरीके से प्राप्त किया जा सके।
  • राज्य-स्तरीय नवीकरणीय ऊर्जा पहलें: कुछ राज्यों ने स्थलों की पहचान, लघु जल विद्युत परियोजनाओं (SHPs) के कार्यान्वयन और स्थानीय क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने के लिए विशिष्ट एजेंसियां स्थापित की हैं, जैसे एजेंसी फॉर न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी (ANERT), केरल।
  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC): यह निम्न-कार्बन विकास और संधारणीय ऊर्जा मिश्रण आदि के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से लघु जल विद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा देती है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य: भविष्य के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, जिनमें 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से 500 गीगावाट (GW) प्राप्त करने और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य शामिल है।

लघु जल विद्युत (SHP) विकास में चुनौतियां

  • वित्तीय और आर्थिक बाधाएं: इसमें अत्यधिक प्रारंभिक निवेश और लंबी परियोजना अवधि शामिल हैं। साथ ही, बिजली खरीद समझौतों (PPAs) को सुरक्षित करने में कठिनाइयां आती हैं।
  • अवसंरचनात्मक बाधाएं: पारेषण नेटवर्क की कमी, सड़क पहुंच का अभाव और दूरदराज के स्थानों के कारण परियोजना निष्पादन में होने वाली देरी प्रमुख बाधाएं हैं।
  • पर्यावरणीय चिंताएं: हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में संचयी पारिस्थितिक प्रभाव जैसी चिंताएं बनी रहती हैं।
  • स्थानीय विरोध: पारंपरिक जल प्रणालियों में व्यवधान और लाभ-साझाकरण तंत्र की कमी के कारण स्थानीय स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ता है।
Shares: