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सामान्य अध्ययन–2 : सांविधिक, नियामक एवं विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय।

संदर्भ: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 12 अक्टूबर 2026 को अपना 33वाँ स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर मानवाधिकारों की रक्षा, उनके उल्लंघनों का समाधान करने तथा गरिमा, जवाबदेही और न्याय को बढ़ावा देने में आयोग की भूमिका पर प्रकाश डाला गया।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के बारे में

• स्थापना: यह 12 अक्टूबर 1993 को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (PHRA), 1993 के अंतर्गत स्थापित एक वैधानिक निकाय है। इस अधिनियम में वर्ष 2006 और 2019 में संशोधन किए गए। यह पेरिस सिद्धांतों (1991) के अनुरूप कार्य करता है, जिन्हें वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा का समर्थन प्राप्त हुआ था।  

• मानवाधिकारों का अर्थ: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (PHRA) के अंतर्गत, मानवाधिकारों का संबंध जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से है। ये वे अधिकार हैं, जिनकी गारंटी संविधान द्वारा दी गई है या जो अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में निहित हैं तथा भारतीय न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।

• पद से हटाना: सिद्ध कदाचार या अक्षमता के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद राष्ट्रपति किसी सदस्य को पद से हटा सकते हैं। इसके अतिरिक्त, अधिनियम में निर्धारित अन्य आधारों पर भी सदस्य को हटाया जा सकता है।

• कार्य एवं शक्तियाँ: एनएचआरसी मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोक सेवकों द्वारा ऐसे उल्लंघनों को रोकने में की गई लापरवाही की जाँच करता है। यह जेलों का निरीक्षण करता है, कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करता है, अनुसंधान एवं जागरूकता को बढ़ावा देता है तथा पीड़ितों को राहत देने की सिफारिश करता है।

  • आयोग जाँच के दौरान सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग करता है, लेकिन इसकी सिफारिशें सामान्यतः बाध्यकारी नहीं होती हैं, जिससे उन्हें लागू कराने की इसकी क्षमता सीमित हो जाती है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) का महत्त्व एवं उपलब्धियाँ

• शिकायत निवारण: 33 वर्षों में आयोग ने कुल 24,33,716 मामलों का निपटारा किया, जिनमें स्वतः संज्ञान के 3,100 मामले शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, 9,085 मामलों में 274 करोड़ रुपये से अधिक की राहत देने की सिफारिश की।

• शासन में जवाबदेही: आयोग जाँच और सिफारिशों के माध्यम से पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। इसने हिरासत में होने वाली मौतों की 24 घंटे के भीतर सूचना देने, मजिस्ट्रेटी जाँच कराने तथा पोस्टमार्टम परीक्षाओं की वीडियोग्राफी कराने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

• कमजोर वर्गों का संरक्षण: आयोग महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी), कैदियों, प्रवासी श्रमिकों और दिव्यांग व्यक्तियों के विरुद्ध होने वाले मानवाधिकार उल्लंघनों से संबंधित मामलों को जाँच, परामर्श और नीतिगत सिफारिशों के माध्यम से संबोधित करता है।

• मानवाधिकार संरक्षण में ऐतिहासिक हस्तक्षेप: आयोग ने पंजाब सामूहिक दाह-संस्कार मामले, गुजरात दंगों और चकमा शरणार्थी मामलों में पीड़ितों को राहत दिलाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा अनुच्छेद 21 के संरक्षण में योगदान दिया।

• मानवाधिकार जागरूकता एवं उभरते अधिकार: आयोग जल, स्वास्थ्य सेवा, भोजन, आश्रय और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकारों को बढ़ावा देता है। पिछले वर्ष के दौरान इसने 35 परामर्श जारी किए, छह शोध अध्ययन पूरे किए तथा सहयोगात्मक रूप से 66 सम्मेलन, कार्यशालाएँ और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के समक्ष चुनौतियाँ

• गैर-बाध्यकारी सिफारिशें: एनएचआरसी केवल कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है और सरकार को उन्हें लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इससे इसकी प्रवर्तन शक्ति सीमित हो जाती है और इसे “दंतहीन बाघ” (Toothless Tiger) कहकर आलोचना की जाती है। यह शब्द 2016 में पूर्व अध्यक्ष एच. एल. दत्तू से संबंधित बताया जाता है।

• अंतरराष्ट्रीय मान्यता संबंधी चिंताएँ: राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थानों के वैश्विक गठबंधन (जीएएनएचआरआई) की प्रत्यायन संबंधी उपसमिति ने मार्च 2025 में भारत के एनएचआरसी की मान्यता का दर्जा घटाने की सिफारिश की और अंतिम निर्णय स्थगित कर दिया। इसकी समीक्षा नवंबर 2026 के लिए निर्धारित थी।

• सीमित जाँच अधिकार: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 19 सशस्त्र बलों द्वारा कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच के लिए एनएचआरसी की प्रक्रिया को सीमित करती है, जिससे स्वतंत्र निगरानी प्रभावित होती है।

• सरकारी एजेंसियों पर निर्भरता: रिपोर्ट प्राप्त करने, सहयोग हासिल करने और सिफारिशों को लागू कराने के लिए सरकारी प्राधिकरणों पर निर्भरता आयोग की संस्थागत स्वायत्तता को सीमित कर सकती है।

• एक वर्ष की समय-सीमा: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 36(2) के अंतर्गत, कथित मानवाधिकार उल्लंघन की तारीख से एक वर्ष बीत जाने के बाद एनएचआरसी सामान्यतः उस शिकायत की जाँच नहीं कर सकता।

आगे की राह

• संवैधानिक दर्जा: एनएचआरसी की स्वायत्तता और अधिकारिता को सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) के समान इसे संवैधानिक दर्जा देने पर विचार किया जाना चाहिए।

• प्रवर्तन तंत्र को सुदृढ़ करना: एनएचआरसी की सिफारिशों पर सरकार की समयबद्ध प्रतिक्रिया और की गई कार्रवाई संबंधी रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

• संस्थागत स्वतंत्रता: समय पर नियुक्तियाँ, पर्याप्त कर्मचारी और वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

• जाँच शक्तियाँ: जाँच की प्रभावशीलता और शिकायत निवारण तक पहुँच को सुदृढ़ करने के लिए मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 19 तथा धारा 36(2) के अंतर्गत निर्धारित एक वर्ष की समय-सीमा की समीक्षा की जानी चाहिए।

• बेहतर समन्वय: प्रभावी शिकायत निवारण के लिए एनएचआरसी, राज्य मानवाधिकार आयोगों, न्यायपालिका और नागरिक समाज के बीच समन्वय को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

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